प्राध्यापक के विरुद्ध की गई आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने से छत्तीसगढ उच्च न्यायालय ने मना किया ।

  • ‘एन्.एस्.एस्.’ शिविर में हिन्दू छात्रों को नमाज पढने के लिए बाध्य किए जाने का प्रकरण ।

  • अभियोग की प्रत्यक्ष सुनवाई के समय प्राध्यापक अपना पक्ष रख सकेगा - उच्च न्यायालय

(‘‘एन्.एस्.एस्.’ अर्थात नैशनल सर्विस स्कीम अर्थात राष्ट्रीय सेवा योजना)

रायपुर (छत्तीसगढ) – छत्तीसगड उच्च न्यायालय ने बिलासपुर में संपन्न राष्ट्रीय सेवा योजना के शिविर में हिन्दू छात्रों को नमाज पढने के लिए बाध्य करने के आरोप पर प्रविष्ट प्राथमिकी (एफ्.आई.आर्.) तथा आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने से मना किया । मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायाधीश रवींद्रकुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कनिष्ठ न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से मना किया । ‘घटनास्थल पर उपस्थित न होना अथवा प्रशासनिक भूमिका से संबंध में तर्कवाद एवं प्रमाण प्रस्तुत कर उसे अभियोग की सुनवाई के रूप में न्यायालय के सामने रखा जा सकता है । अब याचिका के इस चरण में हस्तक्षेप करना तथ्यों एवं प्रमाणों के विषय में अग्रिम मत व्यक्त करना होगा’, ऐसा न्यायालय ने कहा ।

क्या है यह प्रकरण ?

गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित ७ दिवसीय ‘एन्.एस्.एस्.’ शिविर में ‘ईद-उल-फित्र’ (रमजान ईद) के उपलक्ष्य में मुसलमान छात्रों को नमाज पढने के लिए कहा गया था । इसमें हिन्दू छात्रों को भी उनकी सहमति के बिना नमाज पढने के लिए बाध्य किया गया था । प्राथमिक पूछताछ के उपरांत पुलिस ने अपराध पंजीकृत कर आगे जाकर आरोपपत्र प्रविष्ट किया । इस आरोपपत्र में पुलिस ने परियोजना समन्वयक के रूप में कार्यरत दिलीप झा का भी नाम अंतर्भूत किया । झा ने इसे न्यायालय में चुनौती दी थी । उसमें उन्होंने यह दावा किया था कि घटनास्थल पर मेरी कोई भी कार्यकारी भूमिका नहीं थी तथा उस समय मैं घटनास्थल पर उपस्थित नहीं था ।