प्रशासनिक उदासीनता के कारण राजमार्ग घातक मार्ग न बनें ! – Supreme Court

राजमार्गों पर होने वाली दुर्घटनाओं में मृत्यु का प्रतिशत ३०% !

नई दिल्ली – सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ समय पूर्व घटित दुर्घटना के कारण, सडक सुरक्षा के लिए देशव्यापी दिशानिर्देश निर्गमित किए हैं । इस प्रकरण में न्यायालय ने सडक परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण तथा राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश निर्गमित किए हैं । न्यायालय ने कहा कि प्रशासनिक उदासीनता या मूलभूत ढांचे की न्युनताओऺ के कारण एक्सप्रेस मार्ग, घातकमार्ग नहीं बनने चाहिए । राजस्थान के फलोदी में गत वर्ष २ नवंबर को एवं तेलंगाना के रंगारेड्डी जिले में ३ नवंबर को हुई दुर्घटनाओं में ३४ लोगों की मृत्यु हुई थी । इस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए याचिका प्रविष्ट की है एवं उस पर सुनवाई हो रही है ।

१. न्यायालय ने आगे कहा कि देश की कुल सडकों की लंबाई में राष्ट्रीय राजमार्गों का अनुपात केवल २ प्रतिशत है, किन्तु सडक दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु में उनका योगदान लगभग ३० प्रतिशत है ।

२. न्यायालय ने निर्देशों में परामर्श दिया कि किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके पक्के सहायक मार्गों पर कोई भी भारी या वाणिज्यिक वाहन खडा नहीं किया जाना चाहिए । ऐसे वाहन केवल निर्धारित वाहनतलों, विश्राम स्थलों या मार्ग सुविधाओं पर ही खडे किए जाएं । साथ ही उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली, राज्य पुलिस को तत्काल सतर्कता चेतावनी, जी.पी.एस., समय-चिह्नित छाया चित्रित साक्ष्य एवं एकीकृत ई-चालान प्रणाली के माध्यम से इन निर्देशों को लागू किया जाए ।

सरकारी संस्थाओं की सामूहिक विफलता !

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अवैध वाहनतल या पुन:-पुन: दुर्घटनाएं होने वाले स्थानों पर, टाले जा सकने वाले कारणों से किसी व्यक्ति की मृत्यु होना, सरकारी संस्थाओं की सामूहिक विफलता है । संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत जीवन का अधिकार केवल जीवन के लिए घातक अपराधों से सुरक्षा तक सीमित नहीं है, अपितु मानव जीवन की रक्षा करने एवं उसे महत्व देने वाला सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना भी सरकार का उत्तरदायित्व है ।

संपादकीय भूमिका

जनता का मानना है कि प्रशासनिक उदासीनता के लिए उत्तरदायी लोगों को राजमार्ग पर ही मृत्यु दंड दिया जाए, तभी यह समस्या दूर होगी !