प्रतिभूति (जमानत) के आदेश उसी दिन या आगामी दिन दिए जाएं एवं उन्हें त्वरित रूप से जालस्थल पर प्रकाशित करने का निर्देश l

नई दिल्ली — किसी भी प्रकरण का निर्णय प्रलंबित रखा गया हो तो उसे तीन मास के अंदर सुनाया जाना चाहिए । यदि ऐसा नहीं होता, तो ‘अभिलेखपाल वह प्रकरण उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिशों के समक्ष रखेंगे, ऐसा निर्देश सर्वोच्च न्यायालय ने देशभर के उच्च न्यायालयों को दिया है ।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रतिभूति प्रकरणों में आदेश उसी दिन दिए जाने चाहिए। यदि निर्णय प्रलंबित रखा गया है तो उसे आगामी दिन अनिवार्य रूप से सुनाया जाना चाहिए । युक्तिवाद के समापन के उपरांत निर्णय लंबित रखने की तिथि सभी उच्च न्यायालयों द्वारा उनके जालस्थलों पर भी प्रकाशित की जानी चाहिए ।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उच्च न्यायालयों को दिये गये कुछ निर्देश
१. प्रतिभूति या दंड के स्थगन की सूचना मिलते ही उसे त्वरित कारागृह प्रशासन को भेजा जाना चाहिए, जिससे आरोपी को सम्भव हो तो उसी दिन या अधिकतम आगामी दिन मुक्त किया जा सके, यदि वह किसी अन्य प्रकरण में वांछित न हो या प्रतिभूति के नियमों का उल्लंघन न हुआ हो ।
२. यदि किसी दण्डात्मक न्याय याचना या मृत्यु दंड संबंधी प्रकरण में निर्णय लंबित रखा गया हो एवं याचनाकर्ता कारावास में हो, तो खण्डपीठ निर्णय लंबित रखने की तिथि से सात दिन के भीतर पक्षकारों से स्पष्टीकरण माँग सकता है । अन्य प्रकरणों में यह समय सीमा अधिकतम एक मास होगी ।
३. प्रत्येक मास के अन्त में उच्च न्यायालयों के जालस्थलों से मुख्य न्यायाधिशों को एक स्वचालित ई-मेल भेजा जाना चाहिए, जिसमें प्रलंबित रखे गये सभी प्रकरणों का विवरण हो । इसकी प्रति सम्बन्धित खण्डपीठ को भी भेजी जानी चाहिए ।
४. यदि केवल निर्णय का भाग सुनाया गया हो एवं पंद्रह दिन तक विस्तृत निर्णय प्रकाशित न किया गया हो, तो ‘अभिलेखपाल मुख्य न्यायाधिशों को सूचित करेंगे । इसके पश्चात् आगामी दो दिनों के अंदर सम्बन्धित खण्डपीठ को सूचित किया जाएगा ।
५. यदि निर्णय लंबित रखने के तीन मास के उपरांत भी सुनाया न गया हो, तो कोई भी पक्षकार निर्णय सुनाने हेतु आवेदन कर सकता है । ऐसे आवेदन को दो दिनों के अंदर सूचीबद्ध किया जाएगा ।
६. यदि निर्णय ३ मास + १ मास (कुल चार मास) तक भी प्रकाशित न हो, तो कोई भी पक्षकार मुख्य न्यायाधिशों से अनुरोध कर सकता है कि प्रकरण उस खण्डपीठ से वापस लेकर किसी अन्य खण्डपीठ को पुनः सुनवाई के लिये सौंप दिया जाए ।
७. यदि आगामी एक मास में भी विस्तृत निर्णय नहीं आता, तो पक्षकार मुख्य न्यायाधिशों से अनुरोध कर सकते हैं कि प्रकरण दूसरी पीठ को स्थानांतरित कर दिया जाए ।
सर्वोच्च न्यायालय में अधिकतर प्रकरणों की समीक्षा
सर्वोच्च न्यायालय में वर्तमान में ९२,३८५ से अधिक प्रकरण लंबित हैं। केंद्र सरकार ने ११ ग्यारह दिसंबर २०२५ को राज्यसभा में बताया था कि देशभर के न्यायलयों में कुल ५,४९,००,००० से अधिक प्रकरण लंबित हैं । इसमें देश के पच्चीस उच्च न्यायालयों में ६३,३३,४०६ प्रकरण लंबित हैं ।
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