अक्षय तृतीया विशेष

अक्षय तृतीया तिथि का महत्त्व !

१. भारतीय पंचांग की तिथि का विलोप होना अथवा उसका बढना एक सामान्य बात है; परंतु यह तिथि स्थिर है । उसका कभी भी विलोप नहीं होता । यह तिथि सभी प्रकार के मंगल एवं पुण्यकारक कार्याें के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है ।

२. यह तिथि विवाह के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है; इसलिए इस दिन सामूहिक विवाहों का आयोजन किया जाता है ।

३. इस दिन की जानेवाली कृतियों का क्षय न होकर वे बढती हैं; इसलिए इस दिन सोना, चांदी इत्यादि मूल्यवान वस्तुएं खरीदी जाती हैं, साथ ही इस दिन नया व्यवसाय आरंभ करना अथवा दान देना श्रेष्ठ माना जाता है ।

(संदर्भ : श्री विश्वशांति टेकडीवाल परिवार, मुंबई)


अक्षय तृतीया के दिन देवता एवं पूर्वजों के लिए किए जानेवाले ‘उदककुंभ दान अनुष्ठान’ के समय लिया जानेवाला संकल्प !

‘श्रीपरमेश्वरप्रीतिद्वाराउदकुम्भदानकल्पोक्तफलावाप्त्यर्थं ब्राह्मणाय उदकुम्भदानं करिष्ये ।

अर्थ : कल्पसूत्रादि धर्मशास्त्रों में श्रीपरमेश्वर के प्रीतिरूप कृपाप्रसाद के लिए उदककुंभदान का जो फल बताया गया है, उस फल की प्राप्ति हेतु मैं ब्राह्मण को उदककुंभ का दान दे रहा हूं ।

इस प्रकार संकल्प लेकर सूत्र से वेष्टित गंध, फूल, यव (जौ) इत्यादि से युक्त कलश की तथा उसी प्रकार से ब्राह्मण की पंचोपचार पूजा-अर्चना करें तथा निम्नांकित मंत्रों का उच्चारण कर ब्राह्मण को कलश का दान दें ।

‘एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ।

अस्य प्रदानात् तृप्यन्तु पितरोऽपि पितामहाः ॥

गन्धोदकतिलैर्मिश्रं स्नानं कुम्भफलान्वितम् ।

पितृभ्यः संप्रदास्यामि अक्षय्यमुपतिष्ठतु ॥

अर्थ : यह धर्मकलश (उदककुंभ) जो मैंने पूर्वजों को दिया है, वह साक्षात ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का स्वरूप है । इसके दान से मेरे (जीवित अथवा मृतक) माता-पिता, साथ ही दादा इत्यादि पूर्वज भी तृप्त हों । तीलमिश्रित गंधोदक के (चंदनादि सुगंधित द्रव्य से युक्त जल के) कुंभदान के फल से युक्त ऐसा स्नान मैं पूर्वजों को समर्पित कर रहा हूं । वे सदैव अक्षय (क्षयविरहित) रहें, यह ईश्वर के चरणों में प्रार्थना !’

(साभार : ‘धर्मसिंधु’ पृष्ठ क्र. ७२)


१. अक्षय तृतीया शुभ मुहूर्त कैसे है ?

अक्षय तृतीया को साढे तीन मुहूर्तों में से एक शुभ मुहूर्त माना जाता है । हिन्दू दिनदर्शिका के अनुसार पूरे वर्ष में साढे तीन शुभ मुहूर्त होते हैं । दशहरा, नव संवत्सरारंभ एवं अक्षय तृतीया ये तीन पूर्ण मुहूर्त हैं, जबकि दीपावली के उपरांत आनेवाली प्रतिपदा अर्थात कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा अर्ध मुहूर्त है । किसी भी मंगलकार्य का अथवा नए कार्य का आरंभ इस दिन किया जाता है । ये मुहुर्त संपूर्ण रूप से शुद्ध होने के कारण इस दिन अन्य दिन की भांति मंगलकार्य का आरंभ करने के लिए मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती । अक्षय तृतीया के दिन हिन्दू दिनदर्शिका के अनुसार वैशाख शुक्ल तृतीया मनाई जाती है, जो इस वर्ष १९ अप्रैल को है ।  अक्षय तृतीया के दिन नर-नारायण, इन जुडवा देवताओं की जयंती, परशुराम जयंती, बसबेश्वर जयंती तथा हयग्रीव जयंती होती है । अक्षय तृतीया श्रीविष्णु के अवतार भगवान परशुरामजी की भी जन्मतिथि है ।

२. शुभकार्य का ‘अक्षय’ फल मिलता है !

‘इस दिन आरंभ किए गए किसी भी शुभ कार्य का फल ‘अक्षय’ (कभी न समाप्त होनेवाला) होता है, ऐसी मान्यता है । अक्षय तृतीया के दिन उच्च लोकों से अथवा सगुण लोकों से ब्रह्माजी एवं श्रीविष्णु की तरंगें पृथ्वी पर आती हैं तथा उसके कारण पृथ्वी की सात्त्विकता १० प्रतिशत बढती है, ऐसा माना जाता है ।

अक्षय तृतीया के दिन निरंतर सुख एवं समृद्धि प्रदान करनेवाले देवता के प्रति कृतज्ञता का भाव रखकर उपासना की जाती है, जिसके कारण हम पर होनेवाली उस देवता की कृपा का कभी भी क्षय नहीं होता, ऐसी मान्यता है ।

३. अक्षय तृतीया के दिन क्या करना चाहिए ?

अ. निकट की नदी में अथवा संभव हो तो समुद्र में स्नान करें ।

आ. सवेरे पंखा, चावल, नमक, घी, चीनी, इमली, फल एवं वस्त्र का दान देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा दें तथा ब्राह्मणभोज का आयोजन करें ।

इ. इस दिन सत्तू का महत्त्व होता है; इसलिए उसे अवश्य खाएं ।

ई. नए वस्त्र, शस्त्र अथवा आभूषण खरीदें ।

उ. इस दिन नए घर में गृहप्रवेश करना, नई वस्तुएं खरीदना, बडे आर्थिक लेन-देन करना जैसे मंगलकार्य भी किए जाते हैं ।

– ज्योतिषी राहुल नारायणराव पुराणिक एवं ज्योतिषी आकाश नारायणराव पुराणिक, जालना

साधक की दृष्टि से सच्चा अक्षय दान !

‘अक्षय तृतीया के दिन दान देने की धर्मपरंपरा है । वास्तव में देखा जाए तो साधक गुरु को दान नहीं दे सकता; क्योंकि साधक को सबकुछ तो गुरु ने ही दिया होता है अर्थात गुरुकृपा से ही उसे सबकुछ प्राप्त होता है ! यही भाव मन में निरंतर जागृत रखने का संकल्प लेना ही साधक की दृष्टि से सच्चा अक्षय दान सिद्ध होगा !’

– (पू.) श्री. संदीप आळशी (२७.४.२०१७)