‘आश्रम में रहकर पूर्णकालीन साधना करनेवाली एक वृद्ध साधिका के मन में विचार आया, ‘‘अब मेरी आयु हो चुकी है । अतः बढती आयु के अनुसार मुझे कुछ रोग भी हैं । रोगों के कारण मुझे पथ्य एवं औषधियां लेना आदि सभी देखना पडता है । मेरे पति एवं बेटा, दोनों सेवा के कारण अधिकतर बाहर रहते हैं । उनमें से कोई तो मेरे साथ होना चाहिए । मेरा बेटा विवाह करता, तो बहू मेरी सहायता के लिए उपलब्ध होती तथा आवश्यकता के अनुसार मुझे पथ्य एवं औषधियां लेना सुचारू रूप से करना संभव हो पाता ।’ इस विचार से उस साधिका को निराशा आई । इस विषय में साधकों को निम्नांकित दृष्टिकोण ध्यान में रखना चाहिए ।

१. प्रत्येक साधक को आश्रम में मिलनेवाली सभी सुविधाओं का भान रखना चाहिए !
अ. ‘जब कोई साधक पूर्णसमय सेवा करने हेतु आश्रमजीवन स्वीकार करता है, तब उस साधक को अनेक बातों का त्याग करना पडता है । त्याग करने से साधना होती है और उससे तीव्र गति से ईश्वरप्राप्ति होने में सहायता मिलती है ।
आ. आश्रम में इतने बडे स्तर पर नियोजन देखते समय अनेक बार कुछ मर्यादाएं आना स्वाभाविक है; परंतु ऐसा होते हुए भी ‘आश्रम में साधकों की साधना हो तथा उन्हें नित्य जीवन में आवश्यक सुविधाएं मिलें’, इसके लिए आश्रम व्यवस्थापन के स्तर पर पूरा प्रयास किया जाता है ।
इ. भारत के अन्य अनेक संप्रदायों के आश्रमों की बहुत ही दयनीय स्थिति देखने को मिलती है । वहां के साधकों को समय पर भोजन भी नहीं मिलता तथा ‘जो भोजन मिलेगा, वह स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा ही होगा’, ऐसा नहीं है । वहां अन्न, वस्त्र एवं आश्रय, इन नित्य मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव होता है; परंतु ऐसी परिस्थिति में भी वे साधक एवं शिष्य साधना करते रहते हैं ।
ई. इन सभी की तुलना में ‘प.पू. डॉक्टरजी की कृपा से साधना में आगे बढने के लिए सनातन के साधकों को आश्रम में किसी बात का अभाव नहीं है’, इसके लिए हम सभी साधक प.पू. डॉक्टरजी के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञ हैं । प्रत्येक साधक को आश्रम में मिलनेवाली सभी सुविधाओं का भान रखना चाहिए ।
उ. प्रत्येक साधक अपने स्तर पर शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों से लड रहा है । मन में विचार आना तो स्वाभाविक है; परंतु उसके लिए हम ‘अन्य साधकों से सीखकर उस पर कैसे विजय प्राप्त कर सकते हैं ?’, यह देखना अधिक उचित है ।
२. आश्रम में रहते समय सभी के साथ निकटता बनाना महत्त्वपूर्ण होता है तथा ‘किसी प्रसंग में कभी साधकों की मां भी बनना पडता है’, इस बात को प्रत्येक साधक को ध्यान में रखना चाहिए !
साधिका के मन में ऐसे विचार आने का अर्थ यह है कि साधिका की उसके परिजनों से जिस प्रकार की निकटता है, वैसी आश्रम के अन्य सहसाधकों के साथ नहीं है । इस प्रसंग में एक संत ने उन्हें इसका भान कराते हुए कहा, ‘‘जब हम आश्रम में रहने के लिए जाते हैं, तब हम एक बडे परिवार में रहने के लिए आते हैं । हमें सभी से निकटता बनाना महत्त्वपूर्ण होता है । ‘कभी-कभी हमें साधकों की मां बनना पडता है’, यह प्रत्येक साधक को ध्यान में रखना चाहिए ।’
३. आश्रम के साधकों से वास्तव में ‘कुटुंब भावना’ रखकर उनके साथ निकटता बनाकर हमने व्यवहार किया, तो परिजनों की भांति साधक भी हमें हमारे अपने लगेंगे !
हमने स्वयं में प्रेमभाव बढाया, तो हम आगे जाकर साधकों का आधार बन सकते हैं तथा हमें भी अनेक साधकों की मां बनने का सौभाग्य मिल सकता है । सभी लोग हमारे साथ प्रेम से जुड जाते हैं तथा हमारी संकीर्णता न्यून होने में सहायता मिलती है व हम ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, इस संकल्पना की ओर अग्रसर होते हैं । हम आश्रम के साधकों के प्रति वास्तव में ‘कुटुंबभावना’ रखकर व्यवहार करेंगे, तो जिस प्रकार हमारे परिजन हमारी सहायता करते हैं तथा वे हमें अपने लगते हैं, वैसे ही साधक भी हमें अपने लगेंगे ।
४. ‘हम सभी साधक किसी कार्य के लिए एकत्र नहीं हुए हैं, अपितु गुरुदेवजी ने हमें साधना के लिए एकत्रित किया है’, इसका भान हमें निरंतर जागृत रखना होगा !
इस साधिका के मन में ऐसा विचार आना अर्थात उस साधिका के संपर्क में आनेवाले साधक तथा उसके साथ सेवा करनेवाले साधकों के लिए भी यह विचारणीय है; क्योंकि हमारे साथ सेवा करनेवाली साधिका के साथ हम निकटता नहीं बना पाए, तो ईश्वर हमें कैसे अपना बनाएंगे ? हमारे साथ सेवा करनेवाले प्रत्येक साधक का दायित्व एक-दूसरे पर ही है । ‘हम साधक किसी कार्य के लिए एकत्र नहीं हुए हैं, अपितु गुरुदेवजी ने साधना के लिए हमें एकत्र किया है, इसका हमें निरंतर भान रखना चाहिए ।
न्यूनतम हमें अपने साथ के साधकों का ध्यान रखना तो संभव होना चाहिए । उसके लिए किसी को बताना पडे, यह हममें प्रेमभाव अल्प होने का लक्षण है । ‘गुरुदेवजी द्वारा दिए गए यही साधक हमारे लिए कठिन प्रसंगों में दौडे चले आते हैं’, ऐसा अनेक साधकों ने अनुभव किया है ।
‘गुरुदेवजी का आश्रम ही अब मेरा एकमात्र घर है ।’, इस विचार से हमें एकरूप होना संभव हुआ, तो उससे साधकों से निकटता बनाना भी सुलभ होता है । उसके कारण ‘मैं एवं मेरा परिवार’ यह विचार नष्ट होकर साधना में प्रगति होने लगती है ।’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी (१३.७.२०२०)
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