Jodhpur Court : बहुओं के साथ दुर्व्यवहार करने वाले पुत्र के विरुद्ध मां ने न्यायालय में लगाई गुहार !

न्यायाधीश ने निर्णय देते समय ‘रामचरितमानस’ की चौपाई का उल्लेख किया

जोधपुर (राजस्थान) – सास तथा बहू का संबंध प्रायः मतभेदों से जुडा हुआ माना जाता है । ‘सास-बहू में विवाद होना स्वाभाविक है’, यह समाज में सामान्य धारणा बन चुकी है । इस धारणा को तोडने वाली एक घटना जोधपुर में सामने आई है । अपनी बहुओं को प्रताडित करने वाले तथा उनके साथ दुर्व्यवहार करने वाले अपने ही पुत्र को दंड दिलाने हेतु एक मां ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया । मां ने अपने पुत्र के विरुद्ध साक्ष्य प्रस्तुत कर बहुओं को न्याय दिलाया । इस प्रकरण में न्यायालय के न्यायाधीश ने निर्णय सुनाते समय ‘रामचरितमानस’ की चौपाई का भी उल्लेख किया ।

१. जोधपुर के एक गांव के परिवार ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी । इस शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपी ने परिवार की छोटी तथा बडी बहू के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया । अपने पुत्र द्वारा की गई इस हरकत से क्रोधित मां स्वयं छोटी बहू के साथ पुलिस थाने पहुंची तथा उसके विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई ।

२. इस प्रकरण में आरोपी की मां, अर्थात दोनों बहुओं की सास की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही । उन्होंने पुलिस थाने में अपना वक्तव्य दर्ज कराया तथा न्यायालय में भी पुत्र के विरुद्ध साक्ष्य दिया ।

३. “मेरे पुत्र ने जो कृत्य किया है, वह क्षमायोग्य नहीं है । उसे कठोर से कठोर दंड दिया जाए”, ऐसा आग्रह भी उस महिला ने न्यायालय से किया ।

४. प्रकरण की सुनवाई पूर्ण होने के पश्चात विभिन्न धाराओं के अंतर्गत आरोपी को दोषी ठहराया गया तथा उसे १० वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई ।

न्यायाधीश ने किस चौपाई का उल्लेख किया ? 

इस प्रकरण में मां द्वारा पुत्र के विरुद्ध साक्ष्य देकर बहुओं को न्याय दिलाने की बात को रेखांकित करते हुए जोधपुर के विशेष न्यायालय के न्यायाधीश ने ‘रामचरितमानस’ की निम्नलिखित चौपाई का उल्लेख किया –

अनुजवधू, भगिनी, सुतनारी, कन्या सम एति चारि ।
एहि को देख कुदृष्टि से, ताहि बधे कछु पाप न होई ।।”

अर्थ : बडे भाई के लिए छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्रवधू (बहू) तथा अपनी कन्या – ये चारों ही पुत्री के समान हैं । जो व्यक्ति इन पर कुदृष्टि डालता है, उसे दंडित करना पाप नहीं माना जाता ।

संपादकीय भूमिका

इस प्रसंग में मां द्वारा निभाई गई भूमिका धर्माचरण का उत्कृष्ट उदाहरण है, जबकि पुत्र का आचरण अधर्म का प्रतीक है । ऐसी माताओं के कारण ही भारतीय समाज में नैतिक मूल्य सुरक्षित है !