अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान के मध्य संघर्ष की अनेक परतें

दक्षिण एशिया की राजनीति में अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान के संबंध सदैव ही जटिल रहे हैं । भौगोलिक निकटता, ऐतिहासिक धरोहर, धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध एवं सीमा विवाद, इन सभी घटकों के कारण इन दो देशों में परस्पर विश्वास की अपेक्षा संदेह का वातावरण अधिक दिखाई देता है । हाल के कुछ वर्षाें में इस तनाव ने पुनः उग्र स्वरूप धारण किया है, जिससे सीमारेखा पर मुठभेड की घटनाएं, आरोप-प्रत्यारोप तथा एक-दूसरे पर आतंकवाद के आरोप लगाए जाना, इसके कारण युद्धसदृश स्थिति बन गई है । इस संघर्ष के कारण, पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति, अफगानिस्तान के सत्ता समीकरण तथा भविष्य में उसके होनेवाले परिणामों का गहनता से विचार करना आवश्यक है ।

१. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं ‘ड्युरंड’ रेखा का विवाद

अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंध तथा संघर्ष का मूल ‘ड्युरंड’ रेखा में है । (ब्रिटिश अधिकारी सर मॉर्टिमर ड्युरंड एवं अफगान के अमीर अब्दुर रहमान खान के मध्य हुए समझौते के अनुसार तत्कालिन ब्रिटिश भारत एवं अफगानिस्तान के प्रभाव की मर्यादाएं सुनिश्चित करने हेतु यह रेखा बनाई गई ।) ब्रिटिश काल में बनाई गई यह रेखा अफगानिस्तान ने कभी भी आधिकारिकरूप से मान्य नहीं की है ; परंतु पाकिस्तान ने इस रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार किया है । इस सीमारेखा की दोनों बाजूओं में पश्तून समाज बडे स्तर पर बसा है । उसके कारण ‘पश्तूनिस्तान’ की संकल्पना के इर्द-गिर्द अनेक बार राजनीतिक भावनाएं प्रज्वलित होती हैं । अफगानिस्तान के सत्ताधारियों ने समय-समय पर पाकिस्तान पर पश्चून प्रदेशों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया है, जबकि पाकिस्तान यह आरोप लगाता रहता है कि अफगानिस्तान उसके सीमावर्ती प्रदेशों में अस्थिरता फैलाता है ।

डॉ. (प्रा.) शांभवी थिटे

२. पाकिस्तान का आर्थिक पतन एवं बाहरी तनाव

वर्तमान में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है । गिरी हुई मुद्रास्फिती, प्रचंड बढती महंगाई, विदेशी मुद्रा का अभाव एवं बढे हुए ऋण के कारण पाकिस्तान की सरकार प्रचंड दबाव में है । ऐसे समय में उत्तरदायी नेतृत्व को आर्थिक सुधारों पर बल देना आवश्यक है; परंतु पाकिस्तान के सत्ताधारियों ने बार-बार बाहरी शत्रु का भय दिखाकर देश की आंतरिक समस्या से जनता का ध्यान भटकाने की नीति अपनाई है ।

पहलगाम आक्रमण के उपरांत भारत के विरुद्ध तनाव उत्पन्न करने का प्रयास विफल होने पर अब पाकिस्तान ने अपना ध्यान अफगानिस्तान पर लगाया है । ‘अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता एवं आर्थिक संकट होने से वहां तनाव बढाकर अंतररराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा जा सकेगा तथा ‘हम भी संकट में हैं’, ऐसा बोलकर आर्थिक सहायता के लिए दरवाजा खटखटाना संभव होगा’, यह पाकिस्तान की रणनीति हो सकती है; परंतु यह योजना संकटकारी है; क्योंकि युद्ध अथवा तनाव आर्थिक पुनरुत्थान का मार्ग नहीं होता, अपितु वह संकट को और अधिक गहरा बनानेवाला सिद्ध हो सकता है ।

३. तालिबान सत्ता की पुनर्स्थापना एवं बदले हुए समीकरण

तालिबान द्वारा वर्ष २०२१ में अफगानिस्तान में पुनः एक बार सत्ता हथियाने के उपरांत स्थिति संपूर्ण रूप से बदल गई । पाकिस्तान पर पहले तालिबान का समर्थन किए जाने का आरोप भले ही लगता रहा हो, पर सत्ता में आने के उपरांत तालिबान ने पाकिस्तान की सभी अपेक्षाएं पूरी नहीं की । विशेषकर ‘तहरिक-ए-तालिबान पाकिस्तान’, इस संगठन की गतिविधियों के विषय में पाकिस्तान त्रस्त है । पाकिस्तान ने यह आरोप लगाया है कि आतंकवादी गुट अफगानिस्तान की भूमि से पाकिस्तान पर आक्रमण करते हैं ।

दूसरी ओर अफगान तालिबान का मत यह है कि पाकिस्तान ने अनेक वर्षाें से अफगानिस्तान की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप किया तथा अस्थिरता बढाई । इसके कारण इन दोनों देशों में एक-दूसरे के प्रति संदेह और बढ गया है ।

४. ‘इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविनेंस’ (आई.एस.के.पी.) की भूमिका एवं पाकिस्तान की रणनीति

इस संपूर्ण समीकरण में ‘इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविनेंस’ (आई.एस.के.पी.) संगठन महत्त्वपूर्ण है । यह संगठन इस्लामिक स्टेट की विचारधारा पर चलता है तथा वह अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान, दोनों देशों में सक्रिय है । तालिबान एवं आई.एस.के.पी. में वैचारिक एवं सत्ता की स्पर्धा है । तालिबान पश्तूनबहुल नेतृत्व में काम करता है, जबकि आई.एस.के.पी. अफगानिस्तान के विभिन्न जनजातीय गुटों में अपना प्रभाव उत्पन्न करने का प्रयास करता है ।

पाकिस्तान में यह संभावना व्यक्त की जाती है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार में पश्तुनों का वर्चस्व होने से हजारा, ताजिक, उजबेक जैसे अन्य जातीय गुट असंतुष्ट हैं । पाकिस्तान को ऐसा लगता है कि इस असंतोष का लाभ उठाकर तालिबान सरकार को दुर्बल बनाया जा सकेगा । ‘आई.एस.के.पी.’ को अप्रत्यक्ष रूप से बल देकर अथवा अल्पसंख्यक गुटों को प्रोत्साहन देकर तालिबान के विरुद्ध आंतरिक विद्रोह खडा रहेगा; परंतु यह रणनीति अत्यंत संकटकारी सिद्ध हो सकती है; क्योंकि रणनीतिक साधन के रूप में आतंकी संगठनों का उपयोग करने की रणनीति अंततः अपनी ही सुरक्षा पर पलट जाती है । इससे पूर्व पाकिस्तान ने इसका अनुभव किया है; परंतु उससे कोई सीख नहीं ली है । इसके कारण ऐसे संगठनों को बल देने का अर्थ स्वयं के घर में आग लगाने जैसा है ।

५. जातीय राजनीति एवं अस्थिरता की संभावना

अफगानिस्तान बहुजातीय देश है । पश्तून, ताजिक, हजारा, उजबेक एवं अन्य गुटों में ऐतिहासिक मतभेद तो हैं; परंतु जब कोई बाहरी हस्तक्षेप होता है, तो ये गुट अनेक बार एकत्रित होते हैं । पाकिस्तान ने यदि अल्पसंख्यक गुटों को तालिबान के विरुद्ध खडा करने का प्रयास किया, तो उलटे अफगान समाज में सामूहिक शत्रुत्व की भावना उत्पन्न हो सकती है । इसके साथ ही पाकिस्तान में भी पश्तूनों की बडी जनसंख्या है । अफगानिस्तान के संघर्ष का परिणाम पाकिस्तान के पश्तून क्षेत्रों पर पड सकता है ।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को बंदी बनाए जाने के उपरांत पठान समुदाय में असंतोष बढा हुआ दिखाई देता है । पाकिस्तान के पठान एवं अफगानिस्तान के पश्तूनों के मध्य गहन वांशिक संबंध होने से यह अप्रसन्नता केवल राजनीतिक न रहकर सामाजिक स्वरूप धारण कर सकती है । उसके कारण पाकिस्तान का आंतरिक सत्तासंतुलन एवं प्रादेशिक स्थिरता प्रभावित होने की संभावना है ।

६. अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका

 वर्तमान का अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले जैसा निष्क्रिय नहीं है । आतंकवाद को प्रोत्साहन देनेवाले देशों पर आर्थिक प्रतिबंध, राजनीतिक दबाव तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आलोचना का उपयोग किया जाता है । पाकिस्तान ने यदि तनाव बढाकर आर्थिक सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया, तो उल्टे उस पर और कठोर शर्तें लगाई जा सकती हैं ।

अफगानिस्तान पर भी मानवाधिकार, महिला शिक्षा नीति एवं सर्वसमावेशी सरकार के विषय में अंतरराष्ट्रीय दबाव है । ऐसे में बाह्य युद्धसदृश स्थिति उत्पन्न हुई, तो उससे अफगानिस्तान की सामान्य जनता के कष्ट और बढेंगे ।

अफगानिस्तान-पाकिस्तान संघर्ष केवल सीमाविवाद नहीं है, अपितु वह आर्थिक, जातीय, धार्मिक एवं राजनीतिक घटकों द्वारा पिरोई गई जटिल समस्या है । पाकिस्तान ने अपना आर्थिक संकट छिपाने के लिए अथवा रणनीतिक लाभ के लिए तनाव बढाया, तो दीर्घकालीन दृष्टि से वह आत्मघाती सिद्ध हो सकता है । ‘आई.एस.के.पी.’ जैसे संगठनों का उपयोग कर तालिबान सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया गया, तो उससे संपूर्ण प्रदेश में अराजकता फैल सकती है । वर्तमान में दक्षिण एशिया को युद्ध नहीं अपितु स्थिरता, सहयोग एवं विकास की आवश्कयता है । संवाद, परस्पर सम्मान एवं आतंकवाद विरोधी ठोस भूमिका; इन सिद्धांतों पर ही इस प्रदेश का भविष्य सुरक्षित रह सकता है । अन्यथा इतिहास की पुनरावृत्ति होकर वहां के सामान्य नागरिकों को ही उसका सबसे अधिक मूल्य चुकाना पडेगा ।

– डॉ. (प्रा.) शांभवी थिटे, विदेश नीति अध्येता एवं सहायक प्राध्यापिका, ‘कुमारागुरु ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन’, कोईंबटूर, तमिलनाडु. (५.३.२०२६) (साभार : साप्ताहिक ‘विवेक’, मराठी)