हनुमान जयंती (२ अप्रैल) के निमित्त..
१. ११वां रुद्र
हनुमानजी ११वें रुद्र हैं तथा वे शिवस्वरूप हैं । त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम के अवतारी कार्य में सहभागी होकर श्रीराम की सहायता करने हेतु शिवजी ने हनुमानजी का अवतार धारण किया था ।
२. सप्तचिरंजीवियों में से एक
राजा बलि, परशुराम, हनुमान, महर्षि व्यास, कृपाचार्य एवं अश्वत्थामा, ये सप्तचिरंजीवी हैं ।
३. पवनसुत हनुमान
हनुमानजी में वायुतत्त्व प्रबल है । वायुदेव ने शिवजी का तेजांश अंजनी माता तक पहुंचाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया था; उसके कारण हनुमानजी को ‘पवनसुत’ एवं ‘पवनपुत्र’ भी कहा जाता है । वायुदेव की कृपा के कारण हनुमानजी अंतरिक्ष में उडान भरकर मुक्त संचार कर सकते हैं । हनुमानजी का कार्य वायुतत्त्व से संबंधित है । संस्कृत में ‘मरुत्’ शब्द का अर्थ है ‘वायु’ । हनुमानजी का संबंध वायु के साथ होने के कारण उन्हें ‘मारुति’ कहा जाता है ।

४. तेजतत्त्व पर नियंत्रण होने के कारण सूर्य एवं अग्नि से संरक्षण प्राप्त होना
हनुमानजी वायुतत्त्व के बल पर कार्य करते हैं तथा वायुतत्त्व तेजतत्त्व से भी सूक्ष्म होने से हनुमानजी का तेजतत्त्व पर भी नियंत्रण है । इसके कारण हनुमानजी को सूर्य एवं अग्नि से संरक्षण प्राप्त हुआ । हनुमानजी बचपन में उदित होते सूर्य को आकाश में स्थित लाल रंग का फल समझकर उसे निगलने के लिए निकले थे । लंकादहन के समय हनुमानजी की पूंछ को आग लगाई गई, तब भी उन्हें चोट नहीं आई, उल्टे पूंछ की शिखा को लगी आग का उपयोग कर हनुमानजी ने संपूर्ण लंका का दहन किया । इससे सिद्ध होता है कि तेजतत्त्व अर्थात अग्नितत्त्व हनुमानजी के वश में है ।
५. शिवजी की भांति अखंड साधनारत रामभक्त हनुमानजी
हनुमानजी शिवजी की भांति अखंड साधना करते हैं । वे युद्ध के समय, साथ ही नींद में भी रामनाम का अखंड जाप करते हैं । उसी प्रकार जागृत अवस्था में अपना कार्य पूरा होते ही वे श्रीराम का ध्यान करते हैं । अखंड रामनाम का जाप करनेवाले वे एकमात्र रामभक्त हैं ।
६. दास्यभक्ति के सर्वाेत्तम उदाहरण हनुमानजी
भक्तियोग के अंतर्गत श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य एवं आत्मनिवेदन, ये सभी नवविधा भक्तियां हैं । हनुमानजी इनमें से दास्यभक्ति के सर्वाेत्तम उदाहरण हैं ।
७. काल एवं काम पर विजय प्राप्त करना
हनुमान सप्तचिरंजीवियों में से एक हैं तथा वे कल्पांत तक जीवित रहनेवाले हैं, उसके कारण काल उनके वश में है । हनुमान बालब्रह्मचारी हैं तथा वे ब्रह्मचर्य व्रत का कठोरता से पालन करते हैं । हनुमानजी ने षड्रिपुओं में से सबसे बलवान कामवासना पर विजय प्राप्त की है ।
८. संन्यास आश्रम का पालन करना तथा विरक्त जीवन व्यतीत करना
हनुमानजी चाहे कल्पांत तक जीवित रहनेवाले हैं, तब भी उनका मन माया में बिल्कुल भी संलिप्त नहीं होता । वे मोहमाया से अलिप्त होकर विरक्त जीवन व्यतीत करते हैं । वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं तथा संन्यास आश्रम का पालन करते हैं । वे शिवजी की भांति परम बैरागी हैं ।
९. धर्म एवं मोक्ष, इन पुरुषार्थाें के दाता
हनुमानजी दास्यभक्ति करते हुए सेवकधर्म का आचरण करते हैं । वे जीवनमुक्त हैं तथा उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया है । उनकी उपासना के कारण भक्तों को धर्मशक्ति प्राप्त होकर मोक्ष मिलता है; क्योंकि वे धर्म एवं मोक्ष, इन पुरुषार्थाें के दाता हैं ।
– सुश्री मधुरा भोसले (आध्यात्मिक स्तर ६५ प्रतिशत), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा

Raichur Public Muharram Banned : कर्नाटक के रायचूर जिले के २९ गांवों में मोहर्रम सार्वजनिक रूप से मनाने पर प्रतिबंध !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
मुंबापुरी में सहस्रों के समष्टि संकल्प से राष्ट्ररक्षा हेतु प्राप्त हुआ आध्यात्मिक बल !
Bangladesh Hindus : पिछले ४ महीनों में १०० हत्याएं, २८ बलात्कार एवं ९५ मंदिरों में तोडफोड
संपादकीय : राष्ट्र के लिए त्याग करें !
मथुरा (उत्तर प्रदेश) में रामराज्य की स्थापना हेतु की गई सामूहिक प्रार्थना !