युद्धकाल में नागरिकों का आचरण कैसे होना चाहिए ?

वर्तमान में पाकिस्तान-अफगानिस्तान, ईरान-अमेरिका एवं इजरायल तथा रूस-यूक्रेन के मध्य युद्ध भडका है । अन्य छोटे-बडे देशों में भी युद्ध चल ही रहे हैं । कुल मिलाकर स्थिति को देखा जाए, तो भारत को भी कभी भी इस युद्ध में कूदना पड सकता है अथवा न्यूनतम स्वरक्षा के लिए तो हथियार उठाना पड सकता है । संक्षेप में कहा जाए, तो तीसरा विश्वयुद्ध कब आरंभ होगा, यह कहा नहीं जा सकता, अपितु ‘आरंभ हुआ है’, ऐसा कहने में भी कोई आपत्ति नहीं है । इस युद्धजन्य स्थिति में भारतीय सरकार एवं सेना उनके कर्तव्यों का उचित निर्वहन करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है । इस परिस्थिति में राष्ट्र के नागरिक के रूप में हमें कुछ महत्त्वपूर्ण बातों का पालन कर सरकार के साथ दृढता के साथ खडे रहना तथा सेना पर अधिक तनाव न आए; इस दृष्टि से प्रयास करना आवश्यक होता है । तो वास्तव में क्या प्रयास करने चाहिए, आपने इसे कहीं पढा अथवा सुना होगा । इस लेख में हम ऐसे ही कुछ सूत्रों की पुनरावृत्ति कर रहे हैं ।

परस्परों के मध्य के विवाद भूलकर संगठित रूप से शत्रु का सामना करना आवश्यक !

जब देश संकट में हो, तो उस स्थिति में नागरिकों का आचरण कैसे होना चाहिए, इस विषय में हिन्दू धर्मशास्त्र में बताया गया है । पांडव जब वनवास में थे, तो उन्हें नीचा दिखाने के लिए कौरव वन में आए थे । एक स्थान पर जब गंधर्व विहार कर रहे थे, तब कौरवों ने उनके साथ विवाद किया । तब चित्रसेन गंधर्व ने कौरवों को बांधकर रखा । इस विकट प्रसंग में कौरव सेना ने पांडवों से सहायता मांगी, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने भीम एवं अर्जुन को गंधर्वाें से लडने के लिए भेजा तथा कौरवों को छुडवाया । तब युधिष्ठिर ने भीम एवं अर्जुन को दृष्टिकोण देते हुए कहा, ‘वयम् पंचाधिकम् शतम् ।’ अर्थात ‘आपसी विवाद के संदर्भ में ५ पांडव एवं १०० कौरव भिन्न-भिन्न हैं; परंतु जब कोई बाहरी शत्रु हमारे राज्य पर आक्रमण करता है, तब हम १०५ लोग एक हैं ।’, इस सिद्धांत के अनुसार आज भले ही हममें न जाने कितने भी आंतरिक विवाद हों; परंतु इन विवादों का लाभ शत्रु को उठाने न देना श्रेयस्कर होता है । इस दृष्टि से नागरिकों को स्वयं के घरेलु विवादों को एक ओर रखकर देश की रक्षा के लिए संगठित होना चाहिए । जब शत्रु आक्रमण करता है, तब संपूर्ण समाज को अपने आंतरिक विवाद भूलकर एक होकर खडे रहें । युद्धकाल में नागरिक ‘समाज में फूट पडे’ ऐसा कोई भी कृत्य न करें । इसके विपरीत, सभी के कल्याण के लिए एकत्रित योगदान दें । ‘सभी साथ मिलकर चलें, एक सुर में बोलें तथा सभी के विचार एक हों’, इस प्रकार का आचरण अपेक्षित होता है । इस दृष्टि से युद्धकाल में हमें जाति-धर्म भूलकर एक ‘भारतीय’ के रूप में एकत्रित होना आवश्यक है ।

राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा करें !

आर्य चाणक्यजी ने राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी है । उनके अनुसार ‘राष्ट्र पर संकट आने से पूर्व ही नागरिकों को उसकी आहट लगनी चाहिए तथा उन्हें उसके प्रति सतर्क रहना चाहिए । किसी भी स्थिति में देश की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं करना चाहिए’; परंतु वर्तमान समय में भारत में तो गली-गली में राष्ट्रघातक दुष्प्रवृत्तियां हैं । ये दुष्प्रवृत्तियां युद्धकाल में गृहयुद्ध आरंभ कर सकती हैं । ऐसी स्थिति में भारतीय सैनिकों पर दोहरा तनाव आ सकता है । तो इस दृष्टि से नागरि कों को भी देश की संपत्ति एवं जनता की रक्षा का यथाशक्ति दायित्व उठाना चाहिए ।

व्यक्तिगत हित की अपेक्षा राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें !

श्री. योगेश जलतारे

जब राष्ट्र पर संकट आता है, तब व्यक्तिगत हित की अपेक्षा ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ माना जाता है । अतः स्वयं की सामान्य मांगें तात्कालिक रूप से एक ओर रख देनी चाहिए; क्योंकि इन मांगों का अतिरिक्त तनाव सरकार पर आ सकता है । हिन्दू दर्शन के अनुसार ‘व्यक्ति समाज का एक छोटा अंग है । यदि समाज अथवा राष्ट्र ही सुरक्षित नहीं होगा, तो व्यक्ति का स्वार्थ कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता, उदाहरणार्थ किसी नौका में छेद हुआ हो, तो उसमें यात्रा कर रहे यात्री को अपनी वस्तुएं बचाने की अपेक्षा सर्वप्रथम उस छेद को बंद करने में सहायता करना आवश्यक है । यदि नौका ही डूब गई, तो उसकी वस्तुएं भी नहीं बचेंगी । उसी प्रकार यदि राष्ट्र संकट में हो, तो नागरिक की संपत्ति एवं सुख सुरक्षित नहीं रह पाएंगे । इस परिप्रेक्ष्य में ‘राष्ट्र कैसे टिका रहेगा ?’, इसका विचार सबसे पहले होना चाहिए । हमारी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की अपेक्षा देश की रक्षा करना महत्त्वपूर्ण होता है; क्योंकि राष्ट्र टिका रहा, तो हम अपने लिए कभी भी संपत्ति अर्जित कर सकते हैं अथवा संकट समाप्त होने पर हम अपनी मांगों के लिए सरकार से कभी भी आग्रही रह सकते हैं ।

‘मैं देश के लिए क्या कर सकता हूं ?’, इसका प्रत्येक व्यक्ति चिंतन करे !

किसी को ऐसा लगेगा, ‘मेरी आयु अधिक है अथवा मैं बीमार हूं, मेरी शारीरिक क्षमता नहीं है; तो मैं देश के लिए क्या कर सकता हूं ?; परंतु ऐसी चिंता करना व्यर्थ है । हम अपने देश की सेना, अपना देश, देश के नागरिक, देश की संपत्ति सुरक्षित रहे तथा युद्ध के लिए सैनिकों को बल मिले; इसके लिए ईश्वर के चरणों में अखंड प्रार्थना करना तथा नामजप कर सकते हैं तथा यह सबसे बडा योगदान है ।

हमारी उपासना के कारण ही देश एवं सेना को आध्यात्मिक बल प्राप्त होकर ईश्वर की कृपा से उनकी रक्षा होगी । अर्थात इसके लिए हमें युद्ध आरंभ होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए । यह योगदान देना हम आज से नहीं, अपितु अभी से आरंभ कर सकते हैं । हमने चाहे कितने भी उपाय किए अथवा कर्तव्यों का निर्वहन करना सुनिश्चित किया, तब भी मानवीय प्रयासों की मर्यादाएं हैं । केवल ईश्वर की कृपा से ही हमारी रक्षा हो सकती है ।


युद्धकाल में क्या करें ? →

  • ‘भारतीय’ के रूप में एकत्र आना आवश्यक!

  • पानी, बिजली एवं अन्न का मितव्ययिता (संयम) से उपयोग करें !

  • रक्तदान करें, साथ ही भोजन, औषधियां और अन्य सहायता उपलब्ध कराएं !

  • शासन के आदेशों का कठोरता से पालन करें !

  • राष्ट्रहित हेतु व्यक्तिगत स्वार्थों कात्याग करें !

युद्धकाल में क्या न करें ? →

  • ‘कोई भी ऐसा कार्य न करे, जिससे ‘समाज में फूट’ पडे !

  • अफवाहें न फैलाएं !

  • आवश्यकता से अधिक वस्तुएं इकट्ठा न करें !

  • आपातकालीन स्थिति में अनावश्यक भीड न बढाएं !

  • कानून का उल्लंघन कर समाजद्रोह न करें !

 

समाज का मनोबल बनाए रखना आवश्यक !

युद्धकाल में जब देश संकट में होता है, तब प्रत्येक नागरिक उसे जो दायित्व दिया गया है, उदा. डॉक्टर, सैनिक, किसान या सामान्य नागरिक के रूप में इन दायित्वों का उचित निर्वहन करना ही प्रत्येक नागरिक का धर्म है । संकटकाल में भ्रम में न रहकर ‘राष्ट्रसेवा’ को ही स्वयं का मुख्य ध्येय मानकर कार्य करना आवश्यक है । हम जिस समाज में रहते हैं, उस समाज का हम पर विभिन्न प्रकार का ऋण होता है । समाज हमारा एक बडा परिवार ही होता है । संकटकाल में मनोबल गिर जाने से समाज धैर्य खो जाता है तथा डगमगा जाता है, तो ऐसी स्थिति में हमें स्थिर रहकर समाज को धीरज देना होगा । प्रत्येक व्यक्ति के पास कुछ न कुछ कौशल होता ही है । युद्धकाल में इस कौशल का उपयोग निरपेक्ष पद्धति से देशहित के लिए करना चाहिए, उदाहरणार्थ किसी के पास रोगियों पर उपचार करने का कौशल है, तो उसे घायल नागरिकों की सहायता करनी चाहिए । कुछ लोग वाहन चलाते हैं, उन्हें अन्य नागरिकों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने-ले जाने के लिए स्वयंप्रेरणा से पहल करनी चाहिए ।

‘वसुधैव कुटुम्बकम् । (अर्थ : संपूर्ण पृथ्वी ही मेरा परिवार है ।)’ भारतीय संस्कृति की विशेषता है, साथ ही ‘एक-दूसरे की सहायता करें और सभी सन्मार्ग पर चलें ।।’, ऐसा भी कहा गया है । इन दोनों वचनों के अनुसार समाज के सभी घटकों को एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए । वैद्य, किसान, अनाज के व्यापारी आदि लोगों का उनके क्षेत्र के विषयों का अच्छा अध्ययन होता है । ऐसे लोग अपने ज्ञान का उपयोग जरूरतमंदों की सहायता के लिए कर सकते हैं, उदा. वैद्य औषधीय वनस्पतियों के रोपण के विषय में, किसान फल-सब्जियां आदि के रोपण के विषय में; जबकि अनाज के व्यापारी अनाज के संचयन के विषय में अन्य लोगों का मार्गदर्शन कर सकते हैं ।

अधर्म का त्याग करें !

युद्धकाल में आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संचय न करना, अन्यों के हिस्से का अन्न अथवा संसाधन न छीनना सामान्य मानवधर्म है । युद्धकाल में नागरिकों को केवल आवश्यक वस्तुओं का ही संग्रह करना चाहिए । संकटकाल में स्वार्थ के लिए आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संचय करना अथवा महंगाई बढाना ‘अधर्म’ के लक्षण माने गए हैं । इसलिए ऐसे काल में नागरिकों का इन बातों को टालकर नीतिमान बने रहना अत्यंत आवश्यक है । युद्धकाल में बडे स्तर पर अफवाएं फैलाई जाती हैं, उससे नागरिकों में बिना किसी कारण असुरक्षितता फैलती है । युद्ध के विषय में अथवा अन्य घटनाओं के विषय में उचित जानकारी न होते हुए उसे अन्यों को बताना हम स्वयं टालें तथा लोगों को भी वैसा करने से परावृत्त करें ।

निश्चित रूप से धर्मपालन क्या है, इसे समझ लें !

एक बार सुल्तानी आक्रमण के समय नानासाहेब पेशवा पूजा-अर्चना कर रहे थे; तब उनके सेनापति मल्हारराव होळकर ने उन्हें समय की मांग के अनुरूप पूजा-अर्चना के स्थान पर तलवार उठाने का अनुरोध किया था । उस समय मराठा साम्राज्य की रक्षा के लिए पेशवाओं को आगे आकर अभियान का नेतृत्व करना आवश्यक था । उसी प्रकार ‘जब काल सामान्य नहीं होता तथा युद्ध जैसा कोई बडा संकट आता है, तब अपने प्रतिदिन के नित्य नियमों के स्थान पर देश एवं समाज की रक्षा करना’ ही सर्वोच्च कर्तव्य होता है । ‘अपने अथवा अन्यों के प्राण बचाने के लिए आवश्यकता पडने पर कठोर निर्णय लेना धर्म माना जाता है । ‘जब मातृभूमि संकट में होती है, तब उसकी रक्षा करना’ ही प्रत्येक नागरिक का सबसे बडा धर्ममार्ग होता है । ‘भगवद्गीता’ में भी यही बताया गया है । जब अर्जुन के मन में अपने ही परिजनों के विरुद्ध लडने के विषय में भ्रम उत्पन्प हुआ, तब भगवान ने अर्जुन को युद्ध करने का ही मार्गदर्शन किया तथा यही क्षत्रिय धर्म है, यह स्पष्टता से बताया ।

नागरिकों को प्रशासन का पूर्ण सहयोग करना अपेक्षित !

महाभारत में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को संकटकाल में नागरिकों के विभिन्न कर्तव्यों के विषय में बताया है । देश जब संकट में हो, तब नागरिकों को अपने नेतृत्व पर अर्थात राजा अथवा सरकार पर विश्वास कर उन्हें संपूर्ण सहयोग देना चाहिए । ऐसे में समाज में अराजकता न बढे, इसके लिए नागरिकों को स्वयं ही अनुशासन का पालन करना चाहिए । पिछली बार जब श्रीलंका एवं पाकिस्तान जैसे देशों में प्राकृतिक आपदा के समय आपातकालीन सहायता पहुंची, तब वह लेने के लिए लोगों की भीड उमड पडी । कुछ लोगों का आचरण अनुशासनहीन था । ऐसा हमारे देश में नहीं होना चाहिए । इसके विपरीत जब हमारी सरकार युद्धजन्य स्थिति में निर्णय लेने में व्यस्त हो, तब जरूरतमंद नागरिकों एवं सैनिकों के लिए रक्तदान करना; अन्न, औषधियां तथा अन्य सहायता करना आदि प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है ।

सरकार के आदेशों का पालन करने के लिए अभी से अभ्यस्थ हों !

युद्धकाल में सरकार समय-समय पर कुछ नियम अथवा आदेश प्रसारित करती रहती है । ‘उनका कठोरता से पालन हो’, यह देखें । ऐसा न करने पर जनहानि हो सकती है । कश्मीर के पहलगाम में हुए आक्रमण के उपरांत भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ आरंभ किया, तब पाकिस्तान द्वारा किए गए आक्रमण में एक भारतीय डॉक्टर मारा गया था । उस समय वहां घर से बाहर न निकलने का निर्देश होते हुए भी उसने घर के आंगन में आकर चल-दूरभाष पर किसी से संपर्क किया; शत्रु ने इसी समय का लाभ उठाकर उसे मार दिया । युद्धकाल में ऐसी लापरवाही प्राणघातक सिद्ध हो सकती है, यह बात इस उदाहरण से ध्यान में आती है । अतः प्रशासन द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों का पालन करने से अप्रिय घटनाएं नहीं होंगी ।

हिन्दू धर्मशास्त्र के अनुसार ‘राष्ट्र’ केवल भूखंड नहीं है, अपितु एक देवता है । इस परिप्रेक्ष्य में देश पर युद्धसदृश संकट आना हमारे देवता पर संकट आने जैसा है । ऐसे में स्वार्थ त्यागकर पूरी शक्ति के साथ राष्ट्र के साथ खडे रहना नागरिकों का आद्यकर्तव्य है । ‘धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।’, ऐसा शास्त्रवचन है । इसका अर्थ है, ‘जो अधर्मतापूर्ण आचरण करता है, उसका नाश होता है; जबकि जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म (ईश्वर) करता है ।’

समाजव्यवस्था सुचारू रहे, इसके लिए सरकार द्वारा बताए गए नियमों का धर्मपालन के रूप में आचरण किया, तो वह अनुशासन ही युद्धकाल में देश की तथा अपनी निश्चित ही रक्षा करेगा ।

सामाजिक अनुशासन का पालन करना अति आवश्यक !

सार्वजनिक अनुशासन का अभाव भारत के नागरिकों की बडी असफलता है । नागरिकों से छोटी-छोटी बातों में भी अनुशासन के लिए सरकार को दंडनीति अपनानी पडती है । कुछ ही वर्ष पूर्व अर्थात कोरोना महामारी के काल में सरकार ने लोगों को घर से बाहर न निकलने का निर्देश दिया था, तब भी बिना कारण बाहर घूमनेवालों की संख्या बहुत थी । अंततः पुलिस को बलप्रयोग करना पडा । जब कहीं आग लगती है, तो वहां लोगों की अनावश्यक भीड के कारण अग्निशमन दल को घटनास्थल पर पहुंचने के लिए मार्ग ही नहीं मिलता । यातायात के नियमों का पालन न करने से यातायात ठप्प हो जाता है तथा उससे एंब्युलेंस को मार्ग नहीं मिलता । ऐसी अनियमितताएं युद्धकाल में अनेक लोगों के लिए प्राणघातक सिद्ध हो सकती हैं ।

भारतीय परंपरा में अनुशासन का अर्थ केवल कानून का पालन नहीं है, अपितु धर्मशास्त्र में इसे ‘सामान्य धर्म’ कहा गया है । सामाजिक अनुशासन का पहला नियम है स्व-अनुशासन ! युद्धकाल में सरकार जब संचारबंदी लागू करती है, तब उन नियमों का पालन करना होगा । इन नियमों को तोडने का अर्थ केवल कानून तोडना नहीं है, अपितु वह समाज की सुरक्षा के साथ किया जानेवाला द्रोह होता है । पानी, बिजली जैसी सार्वजनिक संपत्ति का मितव्ययिता (किफायत) से उपयोग करना, उन्हें हानि न पहुंचाना अथवा हानि पहुंचने न देना भी नागरिकों का कर्तव्य है । सरकार जब लोगों को किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरण करती है, तब उन्हें अन्न अथवा वस्त्रों की आपूर्ति करती है, वह कतार में खडे रहकर लेना; वृद्ध, रोगी इत्यादि को पहले प्राथमिकता देना’, इस मानवधर्म का पालन करना भी नागरिकों का कर्तव्य है ।

राष्ट्रहित के लिए अपनी सुख-सुविधाओं अथवा संपत्ति का त्याग !

देश पर जब बाह्य आक्रमण होता है अथवा प्राकृतिक आपदा आती है, उस स्थिति में नागरिकों को प्रसन्नता के साथ त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए । इसमें आर्थिक सहायता अथवा शारीरिक परिश्रम का समावेश होता है । इस विषय में एक प्रसिद्ध श्लोक है …

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।

ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।।

– महाभारत, पर्व १, अध्याय १०७, श्लोक ३२

अर्थ : संपूर्ण कुल की रक्षा के लिए एक पुत्र का त्याग करना पडा, तो वह करना चाहिए । किसी गांव को बचाने के लिए गांव में रहनेवाले किसी एक कुल को त्याग करने की स्थिति आई, तो वैसा करना चाहिए । राष्ट्र की आवश्कयता के अनुसार गांव भी त्यागना चाहिए तथा आत्मकल्याण हेतु पृथ्वी का भी (अपने प्राणों का भी) त्याग करना पडे, तो वह अवश्य करना चाहिए ।

अत: इससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग करना पडता है, यह धर्म की सीख हैै ।

अ. महाराणा प्रताप जब हल्दी घाटी के युद्ध के उपरांत वन में रह रहे थे, तब उनके पास सेना को वेतन देने हेतु धन नहीं था तथा अन्न का भी अभाव था एवं मेवाड का अस्तित्व संकट में था । उस समय उनके मंत्री ‘भामाशाह’ ने अपनी पीढियों से अर्जित संपूर्ण संपत्ति महाराणा प्रताप को समर्पित कर दी थी ।

आ. छत्रपति शिवाजी महाराजजी के काल में जब ‘कोंढाणा’ किला जीतना स्वराज के लिए अनिवार्य था, तब तानाजी मालुसरे के घर पर उनके पुत्र रायबा का विवाह था; परंतु जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि छत्रपति शिवाजी महाराजजी को कोंढाणा किले पर आक्रमण करना है, तब उन्होंने पारिवारिक सुख एक ओर रख दिया । उन्होंने कहा, ‘पहले विवाह कोंढाना का तथा उसके उपरांत मेरे रायबा का !’ तानाजी मालुसरे ने राष्ट्र-धर्म को प्राथमिकता दी ।

इ. पावनखिंड में लडे गए युद्ध में बाजीप्रभु देशपांडे ने तो छत्रपति शिवाजी महाराजजी की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया ।  इतिहास में हमें न जाने ऐसे अनेक उदाहरण पढने को मिलेंगे । अतः युद्धकाल में प्रत्येक नागरिक को तन-मन-धन का त्याग करने की तैयारी रखनी चाहिए । (५.३.२०२६)

– श्री. योगेश जलतारे, संपादक, ‘सनातन प्रभात’ प्रसारमाध्यम समूह