कांग्रेस के राहुल गांधी द्वारा संसद में हंगामा : एक व्यापक षड्यंत्र का भाग !

कांग्रेस के राहुल गांधी द्वारा संसद संसद के बजट सत्र में लोकसभा में भयंकर हंगामा किया गया तथा संसद में अभूतपूर्व घटनाएं हुईं । इस बार संसद में योजनाबद्ध पद्धति से हंगामा किया गया । पूर्व सेनादल प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक एवं भारत-अमेरिका व्यापार समझौता, इन विषयों पर क्यों हंगामा किया गया ? इस पर भाष्य करनेवाला यह लेख…में हंगामा : एक  व्यापक षड्यंत्र का भाग !

१. देश में विश्वसनीय एवं उत्तरदायी विरोधी दल शेष ही नहीं है !

वास्तव में सुदृढ लोकतंत्र के लिए देश को सक्षम एवं उत्तरदायी विरोधी दल की अत्यंत आवश्यकता है; परंतु सीमित क्षमतावाले लोगों की महत्त्वाकांक्षा जब बडी होती है तथा ‘देश के सर्वाेच्च पद पर हमारा ही जन्मजात अधिकार है’, यह राजशाही विचार हो, तो ऐसे व्यक्ति उन्हें जो चाहिए, उसे छीन लेने के लिए सभी विधिनिषेध त्याग सकते हैं । इसलिए गांधी-वाड्रा भाई-बहन ऐसा बचकाना; परंतु घातक खेल खेल रहे हैं । उसमें अन्य विरोधी दल उनके हाथ का खिलौना बने हुए हैं; इसलिए  देश में विश्वसनीय एवं उत्तरदायी विरोधी दल शेष रह ही नहीं गया है । वास्तव में कांग्रेसवालों को इस राजवंश के वैचारिक दिवालियापन का बोझ ठुकरा देना चाहिए; परंतु किसी घराने की गुलामी करना ही यदि कांग्रेस के ‘डी.एन.ए.’ का (अनुवंशिकता का) अंग बन गया हो, तो कम से कम अन्य विरोधी दलों को तो घिसटते हुए उनके पीछे-पीछे चलना बंद करना होगा ।

२. संसद को बंद रखने के पीछे कांग्रेस का योजनाबद्ध षड्यंत्र तथा ‘डीप स्टेट’ की वैकल्पिक राजनीति

श्री. अभिजीत जोग,

किसी भी देश में उनकी आंखों में चुभनेवाली सरकार का तख्तापलट कर वहां ‘रेजीम चेंज’ करवाने के लिए बनाई गई योजना है ‘अल्टर्नेटिव पॉलिटिक्स’ ! (‘डीप स्टेट’ अर्थात अधिकारियों एवं निजी संगठनों का संदर्भ देता है, जो किसी के लिए भी उत्तरदायी रहे बिना सरकारी नीतियों पर अपना प्रभाव डालता है ।) इसमें ‘सत्ता में स्थापित राजनीतिक दलों को तथा प्रक्रिया को अपकीर्त (बदनाम) किया जाता है । न्यायव्यवस्था, चुनाव आयोग एवं संसद जैसी संवैधानिक संस्थाओं को बडे स्तर पर अपकीर्त किया जाता है । लोकतंत्र संकट में होने का प्रचार चरम पर ले जाया जाता है । स्थापित राजतंत्र असफल हुआ है; इसलिए वह न्याय नहीं दिला सकता’, ऐसा परिदृश्य खडा किया जाता है । इसके विपरीत, कुछ गैरसरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) एवं ‘एक्टिविस्ट्स’ (कार्यकर्ता) छाप लोगों को देश के तारनहार एवं भाग्यविधाता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है । उसके लिए बडे स्तर पर प्रतिमा-निर्मिति की जाती है । उन्हें ‘मैगसेसे’ अथवा ‘नोबेल’ जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किए जाते हैं । हमारे देश में केजरीवाल अथवा सोनम वांगचूक को किस प्रकार आदर्शवाद एवं सद्गुणों की मूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया, यह हमने देखा । मोहम्मद युनूस भी इसी प्रकार एक नोबेल पुरस्कार विजेता बांग्लादेश के तारनहार हैं ! राजनीति चाहे कितनी भी भ्रष्ट क्यों न हो, तब भी न्यूनतम ५ वर्ष में एक बार उन्हें जनता के सामने खडा होना ही पडता है । सरकार का काम पसंद न आए, तो जनता उन्हें घर बिठा सकती है । इन लोगों की प्रतिबद्धता देश अथवा जनता के साथ नहीं है, अपितु उन्हें सत्ता पर बिठानेवाली वैश्विक शक्तियों के साथ होती है ।

‘मुझे सत्ता में आना हो, तो यही मार्ग अपनाना होगा’, राहुल गांधी ने इसे अच्छी तरह पहचान लिया है । इसीलिए ‘एन.जी.ओ. लॉबी’ ने राहुल गांधी की ‘भारत जोडो’ यात्रा की योजना बनाई थी । उसमें कांग्रेसवालों से अधिक योगेंद्र यादव छाप झोलीवाले ही आगे थे । इसीलिए वे बार-बार विदेश जाकर ‘डीप स्टेट’ के सोरोस गिरोह से मिलते रहते हैं तथा उसके लिए उनके परामर्शदाता सैम पित्रोदा यूरोप-अमेरिका में रहकर इस रणनीति पर काम करते हैं । इसीलिए राहुल गांधी स्वयं तथा उनकी गुलाम बनी ‘वोक लिबरल लॉबी’, ये लोग न्यायव्यवस्था, चुनाव आयोग एवं संसद जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर निरंतर आक्रमण कर उनकी विश्वसनीयता समाप्त करने का परिश्रमपूर्वक प्रयास करते रहते हैं । इसीलिए संसद में चर्चा करने की अपेक्षा हंगामा कर संसद बंद रखी जाती है !

कांग्रेस ने संसद में हंगामा करने के लिए पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की पुस्तक का ही विषय क्यों चुना ?, यह भी एक अहम एवं विचारणीय प्रश्न है । राहुल गांधी ने यह प्रश्न उठाकर इस प्रश्न के माध्यम से मोदी सरकार को अपकीर्त (बदनाम) करने के साथ ही किसी न किसी पद्धति से षड्यंत्र कर देश में ‘पुनः अपना राज लाया जा सके’, इसका यथासंभव प्रयास किया था; परंतु सौभाग्यवश ये सभी प्रयास असफल रहे ! – संपादक

कांग्रेस सत्ता में नहीं आ सकती;इसलिए उसके द्वारा अराजक जैसा वैकल्पिक मार्ग अपनाया जाना

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास यह बताता है कि किसी राज्य में कांग्रेस निरंतर ३ चुनाव हार जाती है, तब वह उस राज्य में कभी खडी नहीं हो सकती । बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, तमिलनाडु, एवं गुजरात राज्य में यह हो चुका है । अब केंद्र में भी कांग्रेस लगातार ३ चुनाव हार गई है । उसके कारण हम चुनाव के संवैधानिक मार्ग से सत्ता में वापसी नहीं कर सकते हैं, इसका उसे भान हो चुका है । इसलिए ऐसा दिखाई पडता है कि कांग्रेस ने देश में अराजकता फैलाकर वैश्विक निरंकुशतावादी शक्तियों की सहायता से धीरे से सत्ता की कुर्सी पर बैठने की ‘अल्टर्नेटिव पॉलिटिक्स’ की (वैकल्पिक राजनीति) नीति अपनाने का मन बना लिया है । बांग्लादेश में मोहम्मद युनूस बिना कोई चुनाव लडे तथा बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के सत्ता में बैठ गए, इसका अध्ययन करने पर यह कार्यपद्धति क्या है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है ।

– श्री. अभिजीत जोग

 

३. संसद में योजनाबद्ध पद्धति से किया गया हंगामा तथा उससे किया गया आक्रोश

इस बार संसद में योजनाबद्ध पद्धति से तथा व्यवस्थित नेपथ्य रचना कर कैसे हंगामा किया गया, अब यह देखेंगे ।

अ. संसदीय चर्चा की अवधि में सदस्य निर्धारित किए गए विषय पर ही बोलें, यह अपेक्षा होती है । वहां मुख्य विषय को छोडकर अन्य विषय नहीं रखे जा सकते । इस बार चर्चा का विषय था, ‘राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव !’ इसमें राष्ट्रपति के भाषण में उल्लेखित सूत्रों पर चर्चा होना अपेक्षित था; परंतु राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की पुस्तक के कुछ अंश पढने का हठ किया ।

केंद्रीय मंत्री रवनीत बिट्टू से बात करते राहुल गांधी

राहुल गांधी का कहना था कि ‘यह पुस्तक अभी भले ही प्रकाशित नहीं हुई है; परंतु उसके कुछ अंश ‘कैरावान’ मासिक में प्रकाशित हुए हैं तथा मैं उसे पढ रहा हूं ।’ पहली बात तो यह है कि साम्यवादी विचारों का यह मासिक प्रचारित पद्धति से मोदी सरकार विरोधी ‘एजेंडा’ (कार्यपद्धति) चलाता रहता है । इसके लिए वह कोई भी झूठा लेखन छापता रहता है । इस मासिक के व्यवस्थापन ने न्यायाधीश लोया प्रकरण, विवेक डोवाल प्रकरण जैसे अनेक प्रकरणों में छापे गए झूठे समाचारों के विषय में क्षमा मांगकर स्वयं को छुडा लिया है; इसलिए उनकी विश्वसनीयता बहुत ही संदेहजनक रही है ।

दूसरे दिन राहुल गांधी इस पुस्तक की एक प्रति लेकर आए तथा कहने लगे, ‘मैं यह प्रति मोदी को भेंट करनेवाला हूं ।’ इस पुस्तक के प्रकाशक ‘पेंग्विन रैंडम हाउस’ ने घोषित किया कि ‘अभी इस पुस्तक की एक भी प्रत्यक्ष अथवा डिजिटल प्रति प्रकाशित नहीं हुई है’ तथा कोई व्यक्ति ऐसी प्रति दिखाता हो, तो वह प्रकाशकों की ‘कॉपीराइट’ का (प्रकाशन के अधिकार का) उल्लंघन है ।’ अर्थात इसके लिए अब राहुल गांधी पर अभियोग प्रविष्ट हो सकता है । यदि ऐसा होता है, तो वे यह आक्रोश न करें कि ‘अब लोकतंत्र संकट में है ।’

आ. संवेदनशील एवं गुप्त जानकारी सार्वजनिक करना राहुल गांधी का दायित्वशून्य कृत्य ! : दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से जिस पुस्तक में संवेदनशील लेखन होता है,  वह पुस्तक रक्षा मंत्रालय की अनुमति के बिना प्रकाशित नहीं की जा सकती । रक्षा मंत्रालय के अनुसार यदि उसमें समाहित लेखन आपत्तिजनक है, तो उसे हटाकर ही पुस्तक प्रकाशित किया जा सकता है । जनरल नरवणे की इस पुस्तक के संदर्भ में अब यही प्रक्रिया चल रही है तथा जब तक वह पूरी नहीं होती, तब तक इस पुस्तक में समाहित किसी भी लेखन को सार्वजनिक करना ‘ऑफिशियल सिक्रेट्स एक्ट’ (आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम) के अंतर्गत अनिवार्य होता है; परंतु ऐसा होते हुए भी नेता विपक्ष के रूप में तथा भारतीय नागरिक के रूप में भी राहुल गांधी द्वारा इस पुस्तक में समाहित लेखन को सार्वजनिक किया जाना अत्यंत दायित्वशून्य कृत्य है । इसके लिए उन पर अभियोग प्रविष्ट हो सकता है तथा उन पर अवश्य ही अभियोग प्रविष्ट किया जाना चाहिए, देश का कोई भी सुज्ञ नागरिक ऐसा कहेगा ।

४. कैलाश रेंज में उस समय उत्पन्न स्थिति, उस पर मोदी द्वारा दिया गया निर्णय तथा राहुल गांधी द्वारा निकाला गया अनुचित अर्थ

अब देखेंगे कि इस पुस्तक में समाहित किस कथित लेखन के आधार पर प्रधानमंत्री मोदी को लक्ष्य बनाया जा रहा था । उनके कथन के अनुसार चीन के टैंक कैलाश रेंज की ओर अग्रसर थे । भारत एवं चीन के मध्य पिछले अनेक वर्षाें से यह समझौता है कि सीमा पर चाहे कुछ भी मतभेद हों, तब भी दोनों पक्ष किसी भी स्थिति में गोलीबारी न करें । इसलिए स्थिति नियंत्रण के बाहर नहीं जाएगी, इसका ध्यान रखना संभव हो जाता है । जब गलवान का संघर्ष हुआ, उस समय दोनों पक्षों के सैनिकों में इसी कारण मारपीट हुई थी ! उस समय कैलाश रेंज का ऊंचाईवाला क्षेत्र भारतीय सेना के नियंत्रण में था । इसका अर्थ यदि इस भारतीय पोस्ट पर नियंत्रण करने का चीनी सेना का विचार होता, तो उन्हें यह समझौता तोडकर गोलीबारी करनी पडती तथा उन्होंने ऐसा किया, तो भी ऊंचाई से उनकी गोलीबारी का उत्तर देना भारतीय सेना के लिए संभव हो पाता । इसका अर्थ रणनीतिक दृष्टि से भारतीय सेना अधिक अच्छी स्थिति में थी । ऐसी स्थिति में सीमा पर कार्यरत अधिकारियों ने प्रश्न उठाया कि ‘चीनी टैंकों की हलचल को देखते हुए उसका क्या उत्तर देना चाहिए ?’; जो जनरल नरवणे तक पहुंचा । उन्होंने रक्षामंत्री राजनाथ सिंह से पूछा तथा अंततः ‘बक स्टॉप्स हियर’ (अंतिम दायित्व मेरा है), इस वचन के अनुसार यह संदेश मोदी तक पहुंचा । इस पर मोदी ने संदेश भेजा, ‘आपको जो उचित लगे, वह आप कीजिए’ । इसका अर्थ ‘सामरिक दृष्टि से जो उचित है, वह निर्णय सेना ही ले’; क्योंकि वह उनकी कार्यकक्षा में आनेवाली समस्या है । यह निर्णय लेने के लिए आवश्यक ज्ञान, प्रशिक्षण एवं अनुभव उनके पास है, साथ ही उनके द्वारा लिए गए निर्णय के जो भी राजनीतिक एवं भूराजनीतिक परिणाम होंगे, उसका भी पूरा दायित्व मोदी ने लिया । इसका अर्थ उन्होंने सेना को पूरी स्वतंत्रता दे दी; परंतु राहुल गांधी ने इसका अर्थ लगाया, ‘मोदी निर्णय लेने से बचे ।’

५. मोदी की राजनीतिक नीति तथा उनके द्वारा सेना को सामरिक निर्णय लेने का दिया गया संपूर्ण अधिकार !

ऐसा अनुचित अर्थ निकालने के पीछे एक तो इस संबंध में राहुल गांधी की अज्ञानता चरम सीमा की है अथवा देश में इस विषय में दिशाभ्रम करने की उनकी योजना है; क्योंकि सामान्य प्रशासन एवं सेना के मध्य आदर्श निर्णय प्रक्रिया इस प्रकार चलती है । सरकार अपने राजनीतिक उद्देश्य सुनिश्चित करे तथा उसके अनुसार सामरिक निर्णय लेने का संपूर्ण अधिकार सेना को प्रदान किया जाए, यह अपेक्षित होता है । प्रभावी कार्य के लिए राजनीतिक दिशादर्शन एवं उत्तदायित्व का वितरण आवश्यक होता है । मोदी ने सेना के हाथ बांधकर रखे बिना उसे स्वतंत्रता देने की नीति अपनाई तथा उसके राजनीतिक परिणामों का उत्तरदायित्व लेने का धैर्य दिखाया । इसीलिए भारतीय सेना ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ (तात्कालिक रूप से की गई सैन्य कार्रवाई), ‘एयर स्ट्राइक’ (तात्कालिक रूप से की गई हवाई कार्रवाई) एवं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी सफल कार्रवाईयां कर पाई । मोदी की इस नीति के लिए अनेक वरिष्ठ सेनाधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से मोदी की प्रशंसा की तथा उन्हें धन्यवाद भी दिए हैं । स्वयं जनरल नरवणे ने भी ‘सेना को निर्णय लेने की स्वतंत्रता होने के कारण भारत की एक इंच भूमि भी चीन के नियंत्रण में नहीं गई’, इसे अनेक बार निःसंदिग्धता से बताया है ।


कांग्रेस के द्वारा संसद में हंगामा तथा उसकी कारणमीमांसा

२ से ४ फरवरी २०२६ की अवधि में लोकसभा में बहुत बडा हंगामा किया गया । इससे लोकसभा में कोई भी काम नहीं हो सका । इस हंगामे का कारण क्या था ? उसमें कितनी सच्चाई थी ?, इसका विचार करने से पूर्व इसे ध्यान में लेना आवश्यक है कि कांग्रेस ने भयंकर हंगामा कर लोकसभा पहली बार ठप्प नहीं की है । लोकसभा के पिछले अनेक अधिवेशनों में कभी ‘राफेल’ लडाकू विमान, कभी ‘पेगासस’, कभी ‘अग्निवीर’ योजना, कभी ‘हिंडेनबर्ग’, कभी ‘इवीएम’ (मतदान यंत्र), तो कभी ‘वोटचोरी’ (मतों की चोरी) … जैसा कोई न कोई सूत्र उठाकर संसद का कामकाज ठप्प करने की घटनाएं होती आई हैं । किसी सूत्र को उठाना, स्वयं के दरबारी ‘इकोसिस्टम’ (व्यवस्था) की सहायता से उसे सुलगाना, वैश्विक साम्यवादी माध्यमों से उसे भडकाना, अपने पास के वेतनधारी अधिवक्ताओं की फौज को काम पर लगाकर जनहित याचिकाएं प्रविष्ट करना, ‘अब इससे सरकार बच नहीं सकती’, ऐसा वातावरण तैयार करने तथा जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘आधारहीन आरोप’ कहकर फटकार लगाई जाती है, तो पुनः दूसरे सूत्र की ओर बढने की घटनाएं बार-बार होती आई हैं ।

इसमें प्रत्येक बार यह प्रश्न उठता है कि कांग्रेस यदि इसके प्रति आश्वस्त हो कि उसके द्वारा उठाया गया सूत्र गंभीर है तथा इसमें सरकार की चूक है; तो वे संसद को चलने क्यों नहीं देते ? सरकार का पक्ष दुर्बल होने की बात पूरे विश्व को दिखाने का सबसे बडा अवसर होता है संसद में होनेवाली  चर्चा ! वह न कर संसद को ठप्प कर क्या साध्य होता है ? इसका उत्तर यह है कि हमारे द्वारा लगाए गए आरोप आधारहीन हैं, यह बात उन्हें पहले से ज्ञात होती है; इसलिए उस पर चर्चा की गई, तो हमारी पोल खुल जाएगी’, उन्हें यह भी ज्ञात रहता है । इसके लिए संसदीय संरक्षण का लाभ उठाकर आधारहीन आरोप लगाना, चर्चा टालकर वॉकआउट करना तथा गांधी की मूर्ति के सामने इकट्ठे होकर ‘देश में लोकतंत्र समाप्त हो गया’ की नौटंकी करना, उन्होंने यह ‘टूलकिट’ ही तैयार कर रखा है । ‘संसद में हमें न्याय नहीं मिलता; क्योंकि संसदीय लोकतंत्र ही निरुपयोगी हो गया है’, यह परिदृश्य उन्हें खडा करना होता है ।

– श्री. अभिजीत जोग

 

६. कांग्रेस द्वारा पुराने विवाद को हवा देने का कारण

संसद में तमाशा करने के लिए कांग्रेस ने यही विषय क्यों चुना ?, यह भी विचारणीय प्रश्न है । अमेरिका द्वारा भारत एवं चीन पर ‘टैरिफ’ (आयात शुल्क) लगाए जाने के उपरांत भारत, रूस एवं चीन एक-दूसरे के निकट आने लगे । भारत-चीन सीमा पर गतिविधियां चल रही थीं, तब तक चीन द्वारा राजनीतिक भूमि हडप लेने के आरोप लगाना संभव हो रहा था । ‘मोदी चीन को लाल आंखें क्यों नहीं दिखाते ?’, ऐसे बचकाने प्रश्न पूछे जा रहे थे । ‘टैरिफ’ युद्ध के उपरांत चीन ने सीमा पर उत्पन्न तनाव समाप्त करने की दृष्टि से तीव्र गति से कदम उठाए । इस वर्ष २६ जनवरी को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत के राष्ट्रपति को जो संदेश भेजा था, वह सामान्य की भांति औपचारिक नहीं था, अपितु उसमें सुस्पष्ट रूप से मित्रता की भावना झलक रही थी । ‘डांस बिट्वीन ड्रैगन एंड एलिफंट’ (चीन [ड्रैगन – आर्थिक एवं सैन्य शक्ति] एवं भारत [हाथी – बढती हुई वैश्विक शक्ति] के मध्य सहयोग अथवा परस्परसंबंध), इस शब्द का प्रयोग कर भारत-चीन सहयोग पर बल दिया गया ।

‘चीन के साथ तनाव समाप्त हुआ, तो उससे मोदी सरकार के समक्ष खडी एक बडी समस्या समाप्त होगी’, यह बात मोदीविरोध से देशविरोध तक पहुंची, जो कांग्रेस को अच्छी लगती, यह संभव ही नहीं था । इसके साथ ही भारत, चीन एवं रूस के निकट जाकर ‘ब्रिक्स’ (‘ब्रिक्स’ अर्थात ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, इरान, इजिप्त, इथियोपिया एवं संयुक्त अरब अमिरात के समावेश से युक्त एक आंतरिक सरकारी संगठन) इस संगठन का प्रभावी बनना अमेरिका के लिए असुविधाजनक था । इससे भारत-चीन के मध्य पुनः तनाव बढे; इसके लिए सर्वाेत्तम मार्ग है पुराने विवादों को हवा देना तथा यह विषय राष्ट्रीय चर्चा का मुख्य विषय बना रहे; इसके लिए सर्वाेत्तम मंच है संसद ! उसके कारण ही संसद में अभूतपूर्व हंगामा किया गया । चीन की ओर से मित्रता के संकेत आना आरंभ होते ही ऐसा होना निश्चित ही कोई संयोग नहीं है ।

६. लोकसभा अध्यक्ष ने राहुल गांधी को बोलने की अनुमति क्यों नहीं दी ?

अब अंतिम एवं सबसे महत्त्वपूर्ण सूत्र यह कि संसदीय परंपरा के अनुसार चर्चा का उत्तर देने के लिए मोदी लोकसभा में क्यों नहीं आए, लोकसभा अध्यक्ष ने यह सुझाव क्यों नहीं दिया ? उस दिन मोदी को नहीं बोलने देना है, कांग्रेस ने यह सुनिश्चित किया था । प्रियंका गांधी ने घोषित किया था, ‘लोकसभा में नेता विपक्ष को बोलने नहीं दिया गया; इसलिए हम सरकार के पक्ष के किसी को भी बोलने नहीं देंगे ।’ राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया गया, मूलतः यही चूक थी । उन्हें पूरा ४० मिनट का समय दिया गया था; परंतु उन्होंने निर्धारित विषय पर एक शब्द भी न बोलते हुए जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के विषय में बोलने का हठ किया । संसदीय कामकाज के किसी भी नियम के अनुसार इसे स्वीकार करना संभव न होने से लोकसभा अध्यक्ष ने इसकी अनुमति नहीं दी ।

– श्री. अभिजीत जोग, प्रसिद्ध लेखक, पुणे. (१३.२.२०२६)

(साभार : साप्ताहिक ‘विवेक’, मराठी)