लेखक एवं वैज्ञानिक डॉ. आनंद रंगनाथन् ने न्यायाधीशों से किया प्रश्न !

नई देहली – एन्.सी.ई.आर्.टी. की पुस्तक में न्यायालयों में चल रहे भ्रष्टाचार के विषय में लेखन प्रकाशित करने पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया । इस संदर्भ में प्रखर राष्ट्रवादी लेखक, हिन्दुत्वनिष्ठ एवं वैज्ञानिक डॉ. आनंद रंगनाथन् ने उनके ‘एक्स’ खाते से उनका स्वयं का एक वीडियो प्रसारित किया है । इस वीडियो में उन्होंने ‘न्याय अंधा होता है, न्यायाधीश नहीं । क्या उन्हें भारतीय न्यायपालिका में चल रहा प्रचंड भ्रष्टाचार दिखाई नहीं देता ?’, यह प्रश्न पूछकर वास्तविकता पर आवाज उठाई है ।
Umr bhar judge yahi bhool karta raha, dhool chehre par thi, aaina saaf karta raha.
Judicial corruption in India is not only real, it is rampant. The Supreme court may have extracted a grovelling apology from a spineless NCERT but it forgets – you can run milords, you can't hide. pic.twitter.com/AXM9x57YDH
— Anand Ranganathan (@ARanganathan72) February 26, 2026
डॉ. आनंद रंगनाथन् द्वारा उठाए गए महत्त्वपूर्ण सूत्र !
१. न्यायाधिश के घर में नकदी की थैलियां मिलने के उपरांत उस पर कौनसे कदम उठाए जाते हैं ? केवल उनका दूसरे शहर में स्थानांतरण होता है ।
२. भारतीय न्यायालयों में ५ करोड ४० लाख से अधिक अभियोग लंबित हैं । न्यायदान की वर्तमान गति को देखा जाए, तो लंबित अभियोगों के निपटारे के लिए ३२३ वर्ष लग सकते हैं । उनमें से १ लाख ८२ सहस्र अभियोग ३० वर्ष पुराने हैं । इनमें बलात्कार एवं यौन शोषण के अधिक अभियोग हैं । इसके साथ ही कारागृह में बंद सभी कैदियों में से ७६ प्रतिशत कैदियों के अभियोग ‘अंडर ट्रायल’ हैं (सुनवाई चल रही है), जिसके कारण वे कारागृह में सड रहे हैं ।
३. भारत में प्रति १० लाख जनसंख्या के लिए केवल २० न्यायाधीश हैं । उच्च न्यायालयों में लगभग ३२ प्रतिशत, जबकि कुल २१ प्रतिशत न्यायालयीन पद खाली हैं ।
४. ‘न्यायाधीश ही न्यायाधिशों की नियुक्ति करते हैं’, इस व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने की तथा उसमें सुधार लाने की आवश्यकता है । उच्च न्यायालय के अनुमानित ५० प्रतिशत न्यायाधीश तथा सर्वोच्च न्यायालय के ३३ प्रतिशत न्यायाधीश वरिष्ठ वरिष्ठ न्यायिक सदस्यों से संबंधित हैं ।
५. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने कहा है कि उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है; परंतु तब भी अनुच्छेद २३५ एवं वर्ष १९९७ की घोषणा के अनुसार न्यायपालिका के बाहर का कोई भी व्यक्ति न्यायालयीन भ्रष्टाचार की जांच नहीं कर सकता । वर्ष २०१७ से २०२१ की अवधि में न्यायालयीन भ्रष्टाचार से संबंधित १ सहस्र ६३१ शिकायतें प्राप्त हुईं । ये शिकायतें भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को भेजी गईं ।
६. भारत के केवल १२ प्रतिशत न्यायाधिशों ने उनकी संपत्ति घोषित की है ।
७. वर्ष १९९३ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश व्ही. रामास्वामी पर आर्थिक अनियमिता एवं सार्वजनिक कोष के दुरूपयोग का आरोप लगा था । संसदीय जांच समिति ने उन्हें दोषी ठहराया; परंतु अंततः बहुमत के अधुरे समर्थन के कारण यह महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में असफल सिद्ध हुआ ।
डॉ. रंगनाथन् ने भ्रष्टाचारी न्यायाधीशों की सूची ही पढकर सुनाई !डॉ. रंगनाथन् ने इस वीडियो में पिछले कुछ दशकों में भ्रष्टाचारी न्यायाधिशों की सूची ही पढकर सुनाई । वह निम्न प्रकार से हैं – १. वर्ष २००३ : दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शमित मुखर्जी २. वर्ष २०११ : कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन ३. वर्ष २०११ : सिक्कीम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, साथ ही कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश पी.डी. दिनाकरन् ४. वर्ष २०१४ : न्यायाधीश पी.पी. इनामदार ५. वर्ष २०१५ : न्यायाधीश ए.डी. आचार्य ६. वर्ष २०१६ : न्यायाधीश रचना तिवारी लखनपाल ७. वर्ष २०२५ : न्यायाधीश यशवंत वर्मा इन सभी न्यायाधिशों पर भ्रष्टाचार, साथ ही अनुकूल निर्णय देने के लिए ‘आर्थिक’ समझौता करने के आरोप हैं । उन पर कार्रवाई भी हुई है । |
अब तक अनेक न्यायाधीशों ने न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर प्रकाश डाला ! – डॉ. रंगनाथन्उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिशों ने भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार होने की बात कही है । पूर्व मुख्य न्यायाधीश वेंकटरमन ने उच्च न्यायालय के ९० प्रतिशत न्यायाधिशों के भ्रष्टाचारी होने की बात कही है । न्यायाधीश एस्.पी. भरूचा, न्यायाधीश माइकल सल्ढाणा, न्यायाधीश जे. चेलामेश्वर, न्यायाधीशबी.आर्. कृष्णा अय्यर, न्यायाधीश गांगुली, न्यायाधीश उमा पॉल आदि ने समय-समय पर न्यायालयों में होनेवाले भ्रष्टाचार का स्तर तथा उसके कारण न्यायपालिका के खोखले बनने की बात कही है । पूर्व मुख्य न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने ‘अब तक ३ मुख्य न्यायाधिशों ने राजनीतिक दबाव के कारण अभियोगों को आगे खींचा । न्यायपालिका ने उसके भ्रष्ट न्यायाधिशों को बचाया’, ऐसा वक्तव्य दिया था । पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एस्. वर्मा ने ‘सर्वोच्च न्यायालय का एक भी न्यायाधीश भ्रष्ट नहीं है’, यह वक्तव्य झूठा है’, ऐसा कहा था । पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इस भ्रष्टाचार में न्यायपालिका के भी संलिप्त होने की बात कही है । |
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