स्वतंत्रता के ७८ वर्ष उपरांत केंद्र सरकार ने विद्यालयों-महाविद्यालयों एवं सरकारी कार्यक्रमों में ‘वन्दे मातरम्’ गाना अनिवार्य किया, वह भी ‘जन गण मन’ के गान से पूर्व ! मोदी सरकार से पूर्व देश में कांग्रेस तथा अन्य विरोधी दलों की सरकारें भी आईं; पर उनमें से किसी ने भी वन्दे मातरम् अनिवार्य नहीं किया तथा मोदी सरकार आने के ११ वर्ष उपरांत उसे अनिवार्य किया गया । कुछ वर्ष पूर्व इसे राष्ट्रगीत की श्रेणी प्रदान की गई; परंतु वर्तमान में दिए निर्णय से वन्दे मातरम्, जो भारतीय स्वतंत्रता के लिए लडनेवाले सेनानियों एवं क्रांतिकारियों का मंत्रघोष था, उसका कार्य वास्तव में पूर्ण हुआ; ऐसा कहना पडेगा । वर्तमान वर्ष इस गीत के १५०वें वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है । इसलिए यह एक बहुत अच्छा निर्णय हुआ है । वस्तुत: वन्दे मातरम् भारत का राष्ट्रगान होना आवश्यक था; परंतु तत्कालीन कांग्रेस की सरकार एवं नेहरू ने मुसलमानों के तुष्टीकरण के लिए तथा क्रांतिकारियों के प्रति के द्वेष के कारण इस गीत को राष्ट्रगान की श्रेणी नहीं दी । ‘वन्दे मातरम् को ठीक से गाया नहीं जा सकता तथा उसकी धुन बनाई नहीं जा सकती’, ऐसा बोलकर नेहरू ने उस समय उसका विरोध किया था । पंडित पलुस्कर ने इस चुनौती को स्वीकार कर उसकी बहुत अच्छी धुन बनाई तथा उसे देश के सामने रखा; परंतु हिन्दूद्वेषी नेहरू अपने हठ पर अडे रहे । उस समय ‘जन गण मन’ गीत ब्रिटेन के राजा के स्वागत में लिखा गया है, यह आरोप लगाते हुए उसे राष्ट्रगान बनाने का विरोध किया गया था । उस स्थिति में वन्दे मातरम् को राष्ट्रगान बनाया जा सकता था; परंतु वैसे नहीं हुआ । ‘इतने वर्षाें के उपरांत ‘जन गण मन’ को बदलकर क्या वन्दे मातरम् को राष्ट्रगान घोषित किया जा सकता था ?’, यह प्रश्न किसी के भी मन में आ सकता है; परंतु देश में उस प्रकार की चर्चा होनी चाहिए । दूसरी ओर इतने वर्षाें में सरकारी स्तर पर वन्दे मातरम् को उचित सम्मान नहीं दिया गया; परंतु तब भी प्रत्येक भारतीय के (मुसलमान तथा अन्य कुछ धर्मियों को छोडकर) मन में वन्दे मातरम् अंकित होने से यह गीत उनके होंठों पर सदैव आता रहा तथा उसे जीवित रखा गया ।
श्री दुर्गादेवी का विरोध
स्वतंत्रतापूर्व कांग्रेस के अधिवेशन व अन्य सभाओं में वन्दे मातरम् गाया जाता था; परंतु उसके एक पद में श्री दुर्गादेवी का उल्लेख होने से पहले दो ही पद गाए जाने लगे । ‘संपूर्ण वन्दे मातरम् गाने से मुसलमानों की भावनाएं आहत होंगी’, यह कहकर कांग्रेस ने इसके अन्य पद न गाने का निर्णय लिया । कुछ लोगों ने विरोध किया; परंतु उसका कुछ परिणाम नहीं हुआ । इस गीत में श्री दुर्गादेवी के उल्लेख के कारण ही वन्दे मातरम् को राष्ट्रगान न बनाने का कारण बताया जाता है ।
मुसलमानों का विरोध
मुसलमान वन्दे मातरम् का सदैव विरोध करते आए हैं तथा आज भी कर रहे हैं । मुसलमान ‘वन्दे मातरम्’ गाने से मना करते हैं । अब सरकार के इस निर्णय के उपरांत भी ओवैसी जैसे नेताओं ने इसका विरोध किया ही है; परंतु उसके साथ मुसलमानों के तलुवे चाटनेवाले समाजवादी दल जैसे राजनीतिक दलों ने भी इसका विरोध किया है । इससे यह ध्यान में आता है कि इन राजनीतिक दलों में देश के गौरव की अपेक्षा राजनीतिक स्वार्थ कितने अंदर तक पहुंच गया है ! क्या ऐसे राजनीतिक दल कभी भारतमाता के साथ एकनिष्ठ रह पाएंगे ?’, यह प्रश्न उठता है । अब अगला प्रश्न यह है कि वन्दे मातरम् गाना अनिवार्य करने से अब मुसलमानों का व्यवहार कैसा रहेगा, इसे देखना होगा तथा उन्होंने उसे गाया नहीं या उसे सम्मान नहीं दिया, तो देश में क्या घटनाएं होंगी, यह भी देखना होगा । इस सूत्र पर कानून-व्यवस्था को बिगाडने का प्रयास किया जा सकता है । अतः हिन्दुओं सहित पुलिस को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है ।
अनिवार्यता के लाभ !
भारतीय राजनीति में तथा समाजमानस में ‘वन्दे मातरम्’ शब्दों को मात्र अक्षरों का संकलन न मानते हुए जीवंत ऊर्जा का स्रोत माना गया है । वन्दे मातरम् को अनिवार्य करने का निर्णय मात्र एक प्रशासनिक आदेश नहीं, वरन भारत के सांस्कृतिक सारगर्भ को स्पर्श करने का साहसिक प्रयास है । क्रांतिकारियों के लिए ‘वन्दे मातरम्’ फांसी पर लटकाए जाते समय गाने का मंत्र था । यह मंत्र केवल उनके होंठों पर नहीं, अपितु रक्त में दौड रहा था । वह उनके जीने-मरने का आधार था । चाहे वे भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु हों या मदनलाल ढींगरा; फांसी के लिए जाते समय उनके होेंठों पर ‘वन्दे मातरम्’ का जयघोष होता था । बंगाल के विभाजन के समय अंग्रेजों ने ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगाने पर प्रतिबंध लगाया था, तब भी क्रांतिकारियों के शरीर पर पडनेवाली प्रत्येक लाठी के साथ ही क्रांतिकारियों की आवाज और बुलंद होती थी । विद्यालय अथवा कार्यालय में वन्दे मातरम् गाते समय उसमें भाव लाना भी आवश्यक होगा । वह भाव इस गीत के शब्दों से ही उत्पन्न होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है । राष्ट्रभक्ति किसी बीज की भांति होती है, जो अंतःकरण की मिट्टी में अपनेआप बोई जानी चाहिए । किसी बात को अनिवार्य बनाया, तो जनता उसका स्वीकार नहीं करता तथा व्यक्ति उसका स्वीकार नहीं करता; परंतु इस संदर्भ में पिछले अनेक दशकों से ‘वन्दे मातरम्’ को अनिवार्य किए जाने की करोडों हिन्दुओं की मांग थी । विश्व के इतिहास में ऐसा कोई अन्य गीत नहीं होगा, जो इतने वर्षाें से जनता के मन में तथा होेंठों पर देश के प्रति उत्कट भाव उत्पन्न कर रहा है तथा उसे अनिवार्य बनाने के लिए प्रयासरत है । ‘वन्दे मातरम्’ गीत संस्कृतप्रचुर बंगाली भाषा में है, तब भी देश की जनता को उसमें भिन्नता प्रतीत नहीं होती; क्योंकि इस देश का प्रत्येक व्यक्ति (मुसलमानों को छोडकर) इस मिट्टी के साथ जुडा हुआ है तथा इस मिट्टी के प्रति कृतज्ञता किसी गीत से व्यक्त होती हो, तो प्रत्येक व्यक्ति (मुसलमानों को छोडकर) नतमस्तक होता ही है । यहां भाषा का कोई प्रश्न नहीं उठता । ‘वन्दे मातरम्’ केवल शब्दों का संकलन नहीं, अपितु हमारे पूर्वजों के बलिदान का इतिहास है ।
गीत के भाव सिखाएं !
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय वर्ष १८८२ में ‘आनंदमठ’ उपन्यास द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ गीत को सबके सामने लाए । उस समय समाज निराश, आर्थिक दृष्टि से पीडित व मानसिक गुलामी के बोझ से दबा हुआ था । उस समय ‘वन्दे मातरम्’ गीत ने भारतीयों के अंतःकरण में सुप्त राष्ट्रभक्ति जगाई । आज इस गीत को अनिवार्य करने के साथ ही, इस गीत का अर्थ भी विद्यालयों में सिखाना चाहिए । इसके प्रत्येक पद में भारतमाता के प्रति जो भाव व्यक्त है, यह सिखाना चाहिए । इससे भारत की अगली पीढी में देशभक्ति की ज्योति अखंड प्रज्वलित रहेगी ! ‘वन्दे मातरम् !’
| ‘वन्दे मातरम्’ के अनिवार्य होने का हर्ष मनाते हुए, हमें भविष्य में इसे राष्ट्रगान बनाने हेतु सार्थक प्रयास करने चाहिए ! |


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