
वर्तमान ‘डिजिटल’ युग में छोटे बच्चों के जीवन में चल-दूरभाष (मोबाइल), दूरदर्शन (टी.वी.), ‘टैबलेट’, संगणक जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधनों का उपयोग भयंकर रूप में बढ गया है । भोजन करते समय, बच्चों को शांत रखने के लिए, उनका ध्यान भटकाने के लिए, उपाहारगृह अथवा किसी कार्यक्रम आदि में बच्चे तंग न करें इसके लिए, यात्रा में, सोते समय, इन जैसी भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में अभिभावक बच्चों के हाथ में डिजिटल उपकरण दे देते हैं । पूरे विश्व में छोटे बच्चों में ‘स्क्रीन टाइम’ (चल-दूरभाष, दूरदर्शन, ‘टैबलेट’, संगणक आदि देखने की अवधि) बढना, उनके मानसिक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास पर प्रतिकूल परिणाम करनेवाला सिद्ध हो रहा है । एक अध्ययन से इसकी चौंकानेवाली वास्तविकता सामने आई है । वर्तमान में केवल शहर में रहनेवाले बच्चों का ही स्क्रीन टाइम अधिक है, ऐसा नहीं है; अपितु ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों का भी ‘स्क्रीन टाइम’ बढा है, यह विशेष बात है !
इस अध्ययन में ७ दिन बच्चों का निरीक्षण कर उनके ‘स्क्रीन टाइम’ तथा बच्चों के विकास पर उसके होनेवाले परिणामों का अध्ययन किया गया । इस अध्ययन के अनुसार बच्चों का औसतन ‘स्क्रीन टाइम’ प्रतिदिन २.३९ घंटे था, जबकि ७३ प्रतिशत बच्चों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मार्गदर्शक सिद्धांतों से अधिक ‘स्क्रीन टाइम’ पाया गया ।
१. अधिक स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में बोलने की समस्या, संवाद करने की क्षमता कम होना, छोटी-छोटी गतिविधियां करने में भी समस्या लगना, सामाजिक संवाद में सहभाग अल्प रहना, नित्य कृतियां करने में समस्याएं आना आदि परिणाम दिखाई दिए ।
२. इस अध्ययन के अनुसार २ वर्ष से कम आयु के बच्चों में भाषा विकास के साथ ग्रहणक्षमता एवं संवाद कुशलता का अभाव दिखाई दिया, जबकि २ वर्ष से अधिक आयु के बच्चों में विशेषरूप से भाषिक एवं संवाद क्षमता में अभाव के साथ अन्य क्षेत्रों में भी विकसित होने में समस्या दिखाई दी ।
३. मां का स्वयं का स्क्रीन टाइम अधिक होने तथा सोने से पूर्व स्क्रीन के उपयोग के कारण भी बच्चों का ‘स्क्रीन टाइम’ बढता है, यह ध्यान में आया ।
४. ८९ प्रतिशत बच्चे २ वर्ष की आयु से पहले ही स्क्रीन से परिचित थे, केवल ५ प्रतिशत अभिभावकों ने बच्चों के स्क्रीन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए थे; परंतु उनमें से भी अनेक अभिभावक इन प्रतिबंधों को स्थायी नहीं रख पाए ।
अतः अभिभावक २ वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी डिजिटल उपकरण का उपयोग न करने दें ।
संदर्भ : ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ का जालस्थल
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