
वर्ष १९९१ में भारत की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी । उस समय भारत के कोष में थोडा ही धन शेष था । तब भारत ने नेहरू के समय की नीतियां त्यागकर निजीकरण के क्षेत्र में कदम रखा । इसके उपरांत भारत की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया । अनेक विदेशी संस्थानों ने भारत आकर अपने व्यवसाय आरंभ किए । इसी बात को लेकर इससे पहले निजीकरण का विरोध किया जाता था; परंतु वर्तमान में अर्थात ३५ वर्ष उपरांत की स्थिति देखी जाए, तो भारत को बडी मात्रा में निजीकरण से लाभ हुआ है । उसके उपरांत वर्ष २०१४ में प्रधानमंत्री मोदी की सरकार आने पर आज भारत विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आ गया है । किसी भी देश के केवल रक्षा क्षेत्र में अथवा केवल आर्थिक क्षेत्र में बडा होने से कुछ नहीं होता, अपितु उसे इन दोनों क्षेत्रों में शक्तिशाली होना आवश्यक है । वर्तमान में अमेरिका इन्हीं दो उपलब्धियों के कारण विश्व में अपना वर्चस्व दिखा रहा है । चीन ने भी यही नीति अपनाई है । अब भारत को भी महासत्ता बनना है अथवा विश्व के मानचित्र पर अपना वर्चस्व बनाना है, तो भारत को भी आर्थिक एवं रक्षा, इन दोनों क्षेत्रों में शक्तिशाली होना होगा । गांधीवादी भारत पहले हथियार नहीं बनाता था । इंदिरा गांधी के कार्यकाल में, अपनी रक्षा के लिए भारत के पास आधुनिक हथियार होने आवश्यक हैं, इसका महत्त्व समझते हुए नए-नए हथियार बनाने के लिए अनेक संस्थानों की स्थापना की गई । आज हम अग्नि, पृथ्वी, आकाश, ब्राह्मोस आदि क्षेपणास्त्र तथा परमाणु बम आदि हथियार बनाने में आत्मनिर्भर बन चुके हैं । मोदी के कार्यकाल में हमने हथियार बेचने की भी नीति अपनाई, जिसके कारण आज भारत स्वयं हथियार बेच रहा है । इससे भारत को बडी मात्रा में आर्थिक लाभ हो रहा है, जिसका उपयोग भारत के विकास के लिए किया जा रहा है । चूंकि विश्व के लिए भारत एक बडा बाजार है, इसलिए वैश्विक प्रतिष्ठानों का ध्येय इस बाजार पर नियंत्रण प्राप्त करना है । भारत ने भले ही निजीकरण की नीति अपनाई हो; परंतु स्वदेशी संस्थानों पर उसका परिणाम अधिक न हो, इसलिए भारत ने यह नीति भी अपनाई । इसी कारण अमेरिका के साथ भारत के संबंधों में कडवाहट आगई है । अत: अभी तक अमेरिका के साथ व्यापार समझौता नहीं हो पाया है । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रधानमंत्री मोदी एवं भारत के संदर्भ में अनेक बार कहा है कि भारत उसके उत्पाद यहां सस्ते में बेचता है तथा हमारे द्वारा निर्मित वस्तुओं को भारत में बेचते समय उस पर अधिक कर (टैक्स) लगाता है । ट्रम्प के मन में भारत के प्रति पहले से ही यह क्षोभ था; परंतु उसका प्रतिशोध लेने के लिए उन्हें रूस का एक कारण मिला । भारत रूस से तेल खरीदता है तथा रूस को यूक्रेन के साथ युद्ध में खर्च करने के लिए उसका लाभ होता है, ऐसा कहते हुए ट्रम्प ने भारत को रूस से तेल न खरीदने की धमकी दी । भारत ने इस मांग को ठुकराकर रूस से तेल खरीदना जारी रखा है । यही कारण बताकर ट्रम्प ने भारत पर ५० प्रतिशत आयात शुल्क लगा दिया है । इसमें विशेष बात यह है कि भारत ने जब रूस से तेल खरीदना आरंभ किया, उस समय अमेरिका में ट्रम्प की नहीं, अपितु बाइडेन की सरकार थी तथा उन्होंने कभी भी भारत का विरोध नहीं किया । उसके विपरीत, उन्होंने भारत एवं रूस के पहले से चले आ रहे संबंधों के कारण उनमें व्यापार चल रहा है, ऐसा बताकर उसकी अनदेखी की; परंतु सत्ता में आने पर ट्रम्प ने इसी कारण से भारत पर आयात शुल्क लगा दिया । ट्रम्प को ऐसा लगा कि भारत पर आयात शुल्क लगाने से भारत की आर्थिक स्थिति विकट हो जाएगी; परंतु प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व एवं नीतियों के कारण ट्रम्प का यह उद्देश्य सफल नहीं हो पाया । इसके परिणामस्वरूप वर्तमान में भारत पहले की तुलना में अधिक मात्रा में विदेशों के साथ व्यापार करने लगा है तथा उससे भारत के सभी घरेलु उत्पादों में वृद्धि हुई है ।

ट्रम्प की उलटी गिनती आरंभ हो गई है !

भारत के सभी घरेलु उत्पादों में हुई वृद्धि ट्रम्प के लिए एक तमाचा था, ऐसे में ट्रम्प के सहयोगी देशों ने भी अर्थात यूरोपियन देशों ने भी उन्हें एक और तमाचा मारा । यूरोपियन यूनियन ने भारत के साथ सबसे बडा ‘मुक्त व्यापार समझौता’ किया है । इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (सभी समझौतों की जननी) कहा जा रहा है । २७ विकसित देशों के इस महासंघ के साथ हो रहा यह समझौता भारत के वैश्विक व्यापार की दिशा परिवर्तित करनेवाला सिद्ध हो सकता है । जो समझौता विगत १९ वर्षाें से लंबित था, वह अब पूर्ण हो चुका है । इस समझौते का सबसे बडा लाभ भारत के निर्यात क्षेत्र को होगा । यूरोप विश्व का २१ ट्रिलियन डॉलर्सवाला एक विशाल बाजार है । वर्तमान में यूरोपियन यूनियन के आयात में भारत का योगदान केवल २.९ प्रतिशत ही है, जो इस समझौते के उपरांत बडी मात्रा में बढ सकता है । विशेषकर कपडा, रत्न, आभूषण, चमडा उद्योग एवं कृषि उत्पाद जैसे श्रमप्रधान क्षेत्रों को यूरोप में ‘शून्य शुल्क’ प्रवेश मिलता है, तो उससे लाखों नई नौकरियों का सृजन होगा । औषधि-निर्माण क्षेत्र के लिए यूरोप के नियम सौम्य होते हैं, तो उससे भारतीय जेनेरिक औषधियों को बडा बाजार उपलब्ध होगा, साथ ही सेवा क्षेत्र के विशेषज्ञों को यूरोप में काम करने के लिए वीजा के नियमों में छूट मिलती है, तो सेवा निर्यात में भारत बडी उडान भरेगा । इस समझौते के कारण चीन पर भारत की निर्भरता घटने में सहायता मिलेगी, यह इस समझौते की रणनीतिक सफलता होगी । यह समझौता भारत को ५ ट्रिलियन डॉलर्स की अर्थव्यवस्था बनने की यात्रा में मील का पत्थर सिद्ध होगा । ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में यूरोपियन लक्जरी चारपहिया वाहनों पर भारत में लगनेवाला आयात शुल्क (जो वर्तमान में ७० से ११० प्रतिशत है) अल्प हुआ, तो मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू, ऑडी जैसी लक्जरी गाडियां भारत में सस्ती होंगी । इससे भारतीय ग्राहकों को लाभ मिलेगा; परंतु स्वदेशी चारपहिया वाहन उत्पादकों के सामने बडी चुनौती निर्माण होगी । ट्रम्प ने यूरोप को यह समझौता न करने की धमकी देकर उस पर बडा दबाव भी बनाया था; परंतु वैश्विक राजनीति की वर्तमान स्थिति को देखते हुए तथा यूरोप के साथ ट्रम्प जिस प्रकार का व्यवहार कर रहे हैं, इसे देखते हुए यूरोपियन यूनियन ने ट्रम्प के दबाव को ठुकराकर भारत से समझौता किया । यह भारत की सबसे बडी विजय है तथा ट्रम्प के लिए यह एक बडा झटका है ! भारत से शत्रुता करने का यह पासा ट्रम्प पर ही भारी पड गया है । अब अमेरिका पर ट्रम्प की अहंकारी नीति का परिणाम होने से वहां की जनता ट्रम्प के विरुद्ध सडक पर उतर आई है । अनेक स्थानों पर सहस्रों लोग सडक पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं । इन विरोध प्रदर्शनों को कुचलते हुए अमेरिकी सेना ने गोलियां मारकर अब तक ३ लोगों को मार डाला है । इसके कारण अमेरिकी नागरिक और अधिक क्षुब्ध हैं । ट्रम्प को यह प्रकरण भारी पडनेवाला है । यूरोप के साथ व्यापार समझौता कर, भारत ने पूरे विश्व को यह दिखा दिया है कि राजनीतिक कूटनीति कैसी होनी चाहिए तथा किसी भी दबाव में आए बिना स्वयं की क्षमता पर विश्वास कर कैसे कार्य करना चाहिए !
| रक्षा एवं आर्थिक क्षेत्र में शक्तिशाली होने पर भारत महासत्ता बन सकता है, यह ध्यान में रखते हुए प्रयास करना आवश्यक ! |
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