संत रविदासजी : अलौकिक कार्य करनेवाले संतऋषि !

आज लुधियाना (पंजाब) के संत रविदासजीजी की ६४७ वीं जयंती है । उस उपलक्ष्य में …(उपशीर्षक)

प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में विशेष कार्यक्रम (उपशीर्षक)

जिस काल में इस्लाम के आक्रमणों के कारण उत्तर भारत में सनातन धर्म पर संकट आया, उस काल में जिन-जिन संतों के प्रयासों के कारण समाज में भक्ति में वृद्धि होकर धर्म की रक्षा हुई, उनमें से एक अग्रणी नाम है संत रविदासजीजी !

उनकी एक रचना देखिए –

रविदासजी सोई सुरा भला, जो लर धरम के हेत ।
अंग अंग कटि भुई गिरे, तउ न छाड़े खेत ।।

धरम हेत संग्राम महं, जौ कटाए काटे सीस ।
सो जीवन सफला भया ‘ रविदासजी’ मिलंहि जगदीस ॥

भावार्थ : जो धर्म एवं सत्य के लिए लडता है, वह सच्चा योद्धा होता है । शरीर के टुकडे होकर भूमि पर गिरे, तब भी वह रणभूमि नहीं छोडता । धर्म के लिए स्वयं का मस्तक काटकर देनेवाले का जीवन सफल बन जाता है तथा उसे ईश्वर की प्राप्ति होती है ।

१. संत रविदासजी रविदासजी के विषय में …

माघ पूर्णिमा विक्रम संवत् १४३३ (वर्ष १३७७) को वाराणसी के निकट के गांव गोवर्धनपुर में जन्में चम्हार समुदाय में जन्में संत रविदासजी की महानता जितनी बताई जाए, अल्प ही है । उनके नाम पर अनेक विलक्षण चमत्कार तो हैं ही; परंतु उसके साथ अन्य भी कई ऐसी बाते हैं, जिन्हें समझ लिया; तो इस महापुरुष का कार्य देखकर हमारा मन अचंभित हो जाता है । उन्होंने ‘गुरुमुखी’ भाषा के ३४ अक्षरों की रचना की । वे अनेक राजपूत राजाओं एवं रानियों के गुरु थे । वे संत मीराबाई के भी गुरु थे । सिकंदर लोधी एवं बाबर भी उनका आध्यात्मिक सामर्थ्य देखकर उनके सामने नतमस्तक हुए थष । संत रविदासजी के विषय में संत कबीर कहते हैं, ‘संतों में रविदासजी ‘संतऋषि’ हैं । हिन्दू एंव मुसलमान ये दोनों भी उनके सामने नतमस्तक हुए हैं । संत कबीर, संत रविदासजी, संत नामदेव, संत गोरक्षनाथ एवं गुरुनानक, ये सभी समकालीन थे । वे एक-दूसरे से मिले भी थे । स्वाभाविक ही ‘गुरुग्रंथसाहिब’में संत रविदासजी की भी रचनाएं हैं ।

डॉ. दुर्गेश सामंत

२. संत रविदासजी को संगीत विद्या अच्छी अवगत होना !

संत रविदासजी ने सैंकडो भजनों की रचना की है । उनकी एक विशेषता यह थी कि उन्हें संगीतविद्या अच्छी ज्ञात होने से उन्होंने अपने भजनों की रचना १६ रागों के आधार पर कर उनका वर्गीकरण किया । उनके भजनों के आरंभ में वह कौनसे राग में है ?, इसका उल्लेख देखने को मिलता है ।

‘प्रभुजी तुम चंदन हम पानी, तुम मोती हम धागा, प्रभुजी तुम दीपक हम बाती तो जलै दिनराती, तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा । कनक कटिल जल तरंग जैसा ॥

(भावार्थ : प्रभु, आप में एवं मुझ में अंतर नहीं है । जो कुभ है वे केवल स्वर्ण एवं उससे बने आभूषण, पानी की लहर एवं पानी में जितना अंतर है उतना ही अंतर है । संक्षेप में कहा जाए, तो हे प्रभु, बाह्य भेद के कारण मैं आपसे भिन्न हूं ।)’ जैसे उनके वचनों से हमें उनकी अनन्यभक्ति की थोडीबहुत कल्पना हो सकती है ।

३. संत रविदासजी द्वारा सिखाई गई निर्गुण भक्ति

उन्होंने सभी को निर्गुण भक्ति सिखाई ।

सतिजुगि सतु तेता जगी दुआपरी पूजाचार । तीनों जग तीनौ दिडे कलि केवल नाम अधार ॥

(भावार्थ : सत्ययुग में सत्य बोलना, त्रेतायुग में यज्ञ करना, द्वापारयुग में कर्मकांड करने को प्रधानता थी; परंतु कलियुग में केवल भगवान का नाम ही मनुष्य का आधार है ।), ऐसा बताते हुए उन्होंने ‘कर्मकांड एवं तीर्थयात्रा करने की अपेक्षा प्रभु का नाम लेना’ सबसे महत्त्वपूर्ण है, ऐसा बताया । उनकी एक सीख यह थी कि मनरूपी बैल पर अनावश्यक व्यावहारिक बोझ न डालें !

४. भजन में आध्यात्मिकदृष्टि से समाजरचना कैसी होनी चाहिए ?, यह दर्शानेवाले संत रविदासजी !

उन्होंने समाज के उद्बोधन हेतु बहुत भ्रमण किया । उनकी इन यात्राओं को ‘उदासी’भी कहते हैं । इन उदासियों के विषय में थोडासा … रानीपुर, मालपी, भागलपुर, कालपी, नारायणगढ, नागपुर, गोरखपुर, भोपाल, हैदराबाद, झांसी, जोधपुर, बुंदी, अजमेर, उदयपुर, सिंध, कश्मीर, काशीपुर, हिमालय इत्यादि स्थानों का अर्थात ही भारतभ्रमण किया । उसके साथ ही उन्होंने अरब देश, अफगानिस्तान इत्यादि स्थानों का भी भ्रमण कर लोगों का उद्बोधन किया ।

उनके द्वारा रचित एक ‘शब्द’ के अर्थात सरल भाषा में भजन की आरंभ की पंक्तियां

बेगमपुरा सहर को नाउ । दुखु अंदोहु नही तिही ठाउ ॥

(भावार्थ : मैं जिस नगर में रहता हूं, वह बेगमपुरा नगर सभी दुखों से मुक्त है तथा वहां चिंता का कोई स्थान नहीं है ।)’ जैसी हैं । इस ‘शब्द’ में अर्थात ही भजन में उन्होंने आध्यात्मिकदृष्टि से समाजरचना कैसी होनी चाहिए ?, वहां कर नहीं होना चा हिए इत्यादि सूत्र लिखे हैं । उन्होंने आषाढ विक्रम संवत् १५८४ (वर्ष १५२८) को वाराणसी में महामाधि ली ।

‘संत रविदासजी के अलौकिक कार्य का स्मरण करते हुए उनकी सीख के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के चित्त पर नाम का महत्त्व अंकित हो’, यह उनके चरणों में प्रार्थना एवं उन्हें शत शत नमन !

श्री गुरुचरणार्पणमस्तु ।

– आधुनिक वैद्य (डॉ.) दुर्गेश सामंत, एम्.डी. (मेडिसीन), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (३०.१.२०२६)