१. ‘वक्फ कानून १९९५’ में किए गए संशोधन के विरोध में तमिलनाडु उच्च न्यायालय में प्रविष्ट की गई याचिका
वर्ष २०२५ में ‘वक्फ कानून १९९५’ में संसद में कुछ संशोधन पारित किए गए । उस संदर्भ में कुछ दिन पूर्व शौकत मोहम्मद अली ने तमिलनाडु उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका (रिट याचिका अर्थात मूलभूत संवैधानिक अधिकारों का हनन किए जाने के प्रकरणों में उच्च अथवा सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा तुरंत संज्ञान लेने का अनुरोध करनेवाली) प्रविष्ट की । इस याचिका में कहा गया, ‘नए संवैधानिक संशोधन के अनुसार, वक्फ बोर्ड कानून के अनुच्छेद १४ (१) (फ) के अनुसार, वक्फ बोर्ड में न्यूनतम २ गैरमुसलमान सदस्यों का तथा तमिलनाडु बार काउंसिल का प्रतिनिधि होना आवश्यक किया गया है, ऐसा न होने पर, इस बोर्ड को अवैध माना जाएगा । ऐसे संविधानविरोधी बोर्ड के काम करने पर प्रतिबंध लगाया जाए’ ।

२. तमिलनाडु उच्च न्यायालय में वक्फ बोर्ड की पराजय
इस प्रकरण में वक्फ बोर्ड एवं तमिलनाडु के महाधिवक्ता ने तर्कवाद किया । उसके उपरांत तमिलनाडु उच्च न्यायालय की सदस्यीय पीठ ने आदेश दिया, ‘अगली तिथि तक जिस बोर्ड में यदि दो गैरमुसलमान सदस्य तथा तमिलनाडु राज्य के बार काउंसिल का प्रतिनिधि नहीं होगा, वह बोर्ड कामकाज न करे ।’ इस वक्फ कानून में हिन्दुओं को अपेक्षित ऐसे बहुत संशोधन नहीं हुए । तब भी उक्त संशोधनों को भी स्वागतयोग्य कहना होगा । कानून में किए गए संशोधन के अनुसार बोर्ड ने परिवर्तन नहीं किया; इसलिए बोर्ड के काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया । इससे ‘केंद्र सरकार ने वक्फ बोर्ड कानून में जो संशोधन किए हैं, वो संशोधन धीरे-धीरे अपना रंग दिखाएंगे’, ऐसा लगता है ।
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।
– (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी, मुंबई उच्च न्यायालय (१३.१.२०२५)

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