महादेव को त्रिपुंड क्यों लगाते हैं ?

श्री शिवशंकर ‘देवाधिदेव महादेव’ के नाम से जाने जाते हैं । शिवजी को बेलपत्र, धतूरा, श्वेत पुष्प चढाए जाते हैं, साथ ही दूध अथवा जल से अभिषेक किया जाता है । भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु एक और कृति की जाती है, वह है श्वेत चंदन का तिलक लगाना ! यह तिलक श्वेत रंग का होता है तथा उसके लिए श्वेत चंदन अथवा भस्म का उपयोग किया जाता है । माथे पर तीन आडी रेखाएं खींचकर यह तिलक लगाते हैं, इसे ‘त्रिपुंड’ कहते हैं । इस लेख में हम शिवजी को त्रिपुंड क्यों प्रिय है, साथ ही त्रिपुंड का क्या महत्त्व है, इसकी जानकारी प्राप्त करेंगे ।

त्रिपुंड भगवान शिव के शृंगार का एक महत्त्वपूर्ण भाग है । शैव परंपरा में त्रिपुंड लगाने की प्रथा है । शिवलिंग पर त्रिपुंड लगाया जाता है, साथ ही शिवपूजन करते समय भक्तगण माथे पर त्रिपुंड अवश्य लगाते हैं । इस त्रिपुंड का महत्त्व, साथ ही उसका रहस्य समझ लेते हैं ।

यशवंत नाईक

१. त्रिपुंड का अर्थ

शिवशंकर की पूजा में भक्तगण त्रिपुंड अवश्य लगाते हैं । शिवलिंग पर त्रिपुंड सदैव देखने को मिलता है । त्रिपुंड की प्रत्येक रेखा का विशिष्ट अर्थ है ।

पहली रेखा – अहंकार से दूर रहें ।

दूसरी रेखा – अज्ञान को दूर करें ।

तीसरी रेखा – बुरे कर्माें से स्वयं को दूर रखें ।

त्रिपुंड लगाने के कारण भक्तों को महादेव के साथ २७ देवी-देवताओं एवं नवग्रहों की कृपादृष्टि एवं आशीर्वाद मिलते हैं । त्रिपुंड की ३ रेखाओं में देवताओं का वास है तथा वे हमारे शरीर के सभी अंगों में स्थित हैं । त्रिपुंड की पहली रेखा में ‘अ’कार, रजोगुण, पृथ्वी, धर्म, क्रियाशक्ति, ऋग्वेद, गार्हपत्य अग्नि, प्रणव का पहला अक्षर, प्रात:हवन एवं महादेव का वास होता है । त्रिपुंड की दूसरी रेखा में ‘उ’कार, सत्त्वगुण, आकाश, अंतरात्मा, इच्छाशक्ति, यजुर्वेद, दक्षिणाग्नि, प्रणव का दूसरा अक्षर, मध्याह्न हवन एवं महेश्वर निवास करते हैं । त्रिपुंड की तीसरी रेखा में सामवेद, तीसरा हवन, प्रणव, मकर, तमोगुण, स्वर्ग, देव, ज्ञानशक्ति एवं शिव के तीसरे अक्षर अग्नि का आवाहन करना, इनका निवास रहता है ।

२. त्रिपुंड का महत्त्व

धार्मिक कार्याें में एवं उपासना में त्रिपुंड का विशेष महत्त्व है । माथे एवं बांहों पर त्रिपुंड लगाने की पद्धति है । आज्ञाचक्र जो माथे के मध्य में होता है, वहां त्रिपुंड लगाया जाता है तथा विभूति लगाई जाती है । इसके कारण मन में कोई भी बुरा विचार नहीं आता ।

इसके साथ ही उसकी नकारात्मकता भी दूर हो जाती है । मन में सात्त्विकता बनी रहती है । विभूति हमारे भीतर सकारात्मकता बढाती है तथा हमारे शरीर के ७ चक्रों को भी नियंत्रित करती है ।

३. कैसे लगाएं त्रिपुंड ?

त्रिपुंड शरीर पर ३२, १६, ८ अथवा ५ स्थानों पर लगाया जाता है । वर्तमान में ५ स्थानों पर अर्थात माथा, दोनों हाथ, हृदय एवं नाभि पर त्रिपुंड लगाया जाता है । शिवपुराण में दी गई कथा के अनुसार भगवान शिव को चंदन, लाल चंदन एवं अष्टगंध से त्रिपुंड लगाना चाहिए । ध्यान में रखें, त्रिपुंड सदैव बाएं नेत्र से लेकर दाहिने नेत्र तक लगाना चाहिए । त्रिपुंड बाईं ओर से दाहिनी ओर लगाएं ।

कुछ शिवभक्त भगवान शिव को त्रिपुंड लगाते हैं तथा माता गौरी हेतु मध्य में लाल रंग का बिंदु लगाते हैं । इसे गौरी एवं शिवजी का रूप माना जाता है । गौरी शंकर के उपासकों में भी कुछ लोग पहले बिंदु तथा उसके उपरांत त्रिपुंड लगाते हैं, जबकि कुछ लोग पहले त्रिपुंड तथा उसके पश्चात बिंदु लगाते हैं ।

– श्री. यशवंत नाईक, मलेशिया