
जबसे केंद्र की सत्ता भाजपा के हाथों में आई है, तब से सभी क्षेत्रों में कुछ मात्रा में ही क्यों न हो, शत्रुबोध होकर धर्म और राष्ट्र की रक्षा के दृष्टिकोण से अनेक सकारात्मक परिवर्तन हो रहे हैं । देश में गौरवशाली सनातन परंपरा का पुनर्जागरण हो रहा है; इतिहास, शिक्षा, कानून, न्याय, अर्थ, सुरक्षा आदि सभी क्षेत्रों में आमूलाग्र परिवर्तन करने के प्रयत्न हो रहे हैं । ऐसे में किसी के भी मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि ‘सनातन राष्ट्र की आवश्यकता क्यों है ?’ कांग्रेस के काले शासन से निकलकर राष्ट्र के सर्वोच्च स्थान की ओर बढने की ध्रुवीकरण प्रक्रिया में यह परिवर्तन का काल चल रहा है, और इसीलिए यह मंथन अत्यंत संवेदनशील है । राष्ट्र में सभी स्तरों पर हो रहे इस परिवर्तन को और अधिक सही दिशा देना आवश्यक है ।

‘यह हिन्दू राष्ट्र तो है ही; फिर अलग से कहने की क्या आवश्यकता है ?’, ऐसा प्रश्न पूछा जा रहा है । यदि यह हिन्दू राष्ट्र होता, तो ‘लव जिहादियों’ और गो-हत्यारों के हाथ-पैर काट दिए गए होते; सरकारी नियंत्रणवाले मंदिरों में भारी भ्रष्टाचार नहीं होता; हिन्दूद्वेष सिखानेवाले मदरसों को अनुदान नहीं मिलता; धर्मांधों में एक इंच भूमि भी हडपने का साहस नहीं होता और हिन्दुओं पर उनकी समझ से परे ‘हलाल’ की अनिवार्यता नहीं थोपी जाती । अस्तु । इसलिए अब एक ऐसी राष्ट्र-निर्मिति अपेक्षित है जो केवल राजनीतिक पटल पर ही नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के आध्यात्मिक आधार पर एक आदर्श व्यवस्था का निर्माण करे; जो हिन्दुओं को सभी स्तरों पर न केवल सुरक्षा दे, अपितु जीवन में आनंद की प्राप्ति भी करा सके ।
इसी उद्देश्य से देश की राजधानी में ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ आयोजित किया गया । इसके नाद से अधर्म रूपी शत्रु के बादल छंटने लगे हैं तथा सनातन संस्कृति एवं हिन्दुओेंं की सुरक्षा के लिए चल रहे सरकारी तथा हिन्दुत्ववादी प्रयासों को सही दिशा और तीव्र गति मिल रही है ! यह महोत्सव इस मांग के लिए हुआ कि ‘भारत सरकार सनातन धर्म के हित में कार्य करे ।’
सनातन राष्ट्र का पुनर्जागरण !
इस महोत्सव से ‘सनातन राष्ट्र की संकल्पना’ का वैचारिक आधार अत्यंत स्पष्ट और सुदृढ हुआ । किसी भी समाज में परिवर्तन होते समय उसका बौद्धिक, मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक स्तर पर होना आवश्यक है । हिन्दुओं द्वारा अपनी संस्कृति को भूल जाने और पश्चिमी विकृतियों को अपनाने के कारण, उनके बौद्धिक और मानसिक परिवर्तन के लिए यह शंखनाद महोत्सव हुआ ।

इसके साथ ही, शारीरिक स्तर पर की जानेवाली गतिविधियों के लिए मानसिक रूप से तैयार हो पाए इसलिए महोत्सव का आयोजन किया गया । इतना ही नहीं, चूंकि आध्यात्मिक आधार के बिना सनातन राष्ट्र का पुनर्निर्माण असंभव है, इसलिए इस महोत्सव से यह स्पष्ट हुआ कि ‘प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक शक्ति बढानी चाहिए ।’ क्षात्रतेज और ब्राह्मतेज, अर्थात शक्ति और भक्ति; श्रद्धा और शौर्य का संगम ही सनातन हिन्दू राष्ट्र की नींव है । पूरे भारतवर्ष में इन दोनों तत्त्वों का पोषण करने की बात इस महोत्सव के माध्यम से की गई । इसीलिए इसका स्थान हिन्दुस्थान की राजधानी दिल्ली, अर्थात पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ चुना गया । गोवा के सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव द्वारा बोए गए बीज को वटवृक्ष बनाने में यह महोत्सव वास्तव में सहायक सिद्ध हुआ !
शत्रुबोध कराने के लिए…

‘जीवित रहने और अपने अस्तित्व के लिए शत्रु का विनाश आवश्यक है । जब अधर्म रूपी शत्रु बढ जाता है, तब साक्षात भगवान का अवतार ही उसे नष्ट कर सकता है । धर्म की पुनर्स्थापना के लिए भगवान युगों-युगों से अवतार लेते हैं । भगवान का आवाहन करके ही राजा और प्रजा शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं । वह समय अब पुनः आ गया है’, यह संदेश इस महोत्सव से दिया गया । शत्रु की पहचान होगी, तभी उसका विनाश किया जा सकेगा । जनता को शत्रु का बोध कराने में इस महोत्सव ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । छत्रपति शिवाजी महाराज कलियुग में शत्रु को पहचानने और उसका संहार करने के भारत के सर्वोच्च उदाहरण हैं । महोत्सव में छत्रपति शिवाजी महाराजजी के काल के शस्त्रों को देखकर हिन्दुओं में क्षात्रतेज की भावना जागृत हुई ।
सीमा पार के शत्रुओं के लिए प्रधानमंत्री मोदी सेना को हर प्रकार से सक्षम बना रहे हैं । वे देश के भीतर के शत्रुओं के आर्थिक स्रोतों को रोक रहे हैं, फिर भी आक्रमण थमे नहीं हैं । ‘स्लीपर सेल’ रूपी आंतरिक शत्रुओं का सामना करने के लिए हिन्दुओं को संगठित और सक्षम होना होगा । ‘सभी प्रकार के जिहाद और धर्मांतरण को हिन्दुओं का संगठन और उनकी क्षात्रवृत्ति ही रोक सकती है’, यह बात महोत्सव के माध्यम से दृढ की गई । हिन्दुओं के स्वयं के, परिवार के, समाज के और राष्ट्र के संरक्षण के लिए इस महोत्सव का महत्त्व असाधारण सिद्ध हुआ ।
मोहम्मद जिन्ना की कूटनीति और कांग्रेस सरकार के तुष्टीकरण के कारण हिन्दुओं ने जो भारी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक आघात सहे हैं और सह रहे हैं, उनके लिए ‘बुलडोजर’ और ‘डिटेंशन सेंटर’ जैसे उपाय तो चाहिए ही; परंतु उससे भी आगे बढकर सरकार को हिन्दुओं की रक्षा के लिए नक्सलवाद की भांति ही आतंकवाद का समूल नाश करना चाहिए । पूंजीवादी व्यवस्था से उपजा ‘डीप स्टेट’, उसके माध्यम से ‘जेन जी’ (Gen Z) का उपयोग कर किया जानेवाला तख्तापलट; पिछले १०० वर्षों से धर्मांधों और साम्यवादियों के अपवित्र गठबंधन द्वारा ‘सर्वधर्मसमभाव’, ‘मानवतावाद’, ‘धर्मनिरपेक्षता’, ‘पश्चिमी आधुनिकता’, ‘प्रगतिशीलता’, ‘झूठे नैरेटिव’ और ‘टूलकिट’ के माध्यम से किया गया हिन्दुओं का वैचारिक मतिभ्रम, ये सभी आज हिन्दुओं के शत्रु हैं । इनका वैचारिक विनाश कैसे किया जाए ? यह इस महोत्सव में सिखाया गया । राष्ट्र का अर्थ है राष्ट्र की जनता । वह राष्ट्र की रक्षा करती है और राष्ट्र उसकी रक्षा करता है । इन दोनों की रक्षा (सनातन) धर्म करता है । आज धर्माचरण न्यूनतम हो गया है और उसका पालन करनेवाले हिन्दू भी कम हो रहे हैं । धर्माचरण की चेतना इस महोत्सव के माध्यम से हिन्दुओं के मन पर अंकित की गई ।
…ऐसे आएगा सनातन राष्ट्र !

‘सनातन राष्ट्र का शंखनाद तो हो गया; पर वह आएगा कैसे ?’, यह प्रश्न किसी के भी मन में आ सकता है । ‘मांगने पर ही मिलता है’, यह एक साधारण नियम है । यदि करोडों हिन्दुओं को सनातन राष्ट्र का महत्त्व समझ आ जाए, तो वे इसकी मांग करेंगे । उन्हें यह महत्त्व समझाने के लिए यह महोत्सव एक माध्यम बना । ‘लोकतंत्र और संविधान के माध्यम से ही यह सनातन राष्ट्र आ सकता है’, इसे प्रतिबिंबित करने में इस महोत्सव की सहभागिता महत्त्वपूर्ण रही । स्वदेशी का जागरण कर राष्ट्र के आर्थिक विकास के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है; परंतु राष्ट्र का वास्तविक महाशक्ति बनना तभी संभव है, जब उसका आध्यात्मिक विकास हो, यह बात जनमानस पर अंकित की गई । यदि देश को सनातन धर्म का पूर्ण आधार दिया जाए और संविधान में परिवर्तन किया जाए, तो ‘सनातन राष्ट्र’ शीघ्र ही आएगा !
दिल्ली सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव के अन्य वक्ताओं के वक्तव्य पढने हेतु सनातन प्रभात वेबसाइट देखें ! – www.sanatanprabhat.org/hindi/
| ‘लोकतंत्र और संविधान के माध्यम से ‘हिन्दू राष्ट्र’ आ सकता है’, यह प्रतिबिंबित करने के लिए ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ का आयोजन ! |

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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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