‘शीर्षासन करने से अमृतरस की रक्षा किस प्रकार होती है ?’, इस संदर्भ में श्री. राम होनप को प्राप्त सूक्ष्म ज्ञान !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले : शीर्षासन करने से अमृतरस की रक्षा कैसे कर सकते है ?

श्री. राम होनप :

१. सहस्रारचक्र की विशेषता

‘सहस्रारचक्र के स्थान पर ईश्वरीय आनंद का वास रहता है । इसी आनंद को ‘अमृत’ की उपमा दी गई है ।

२. सहस्रारचक्र में ‘अमृतरस’ कैसे उत्पन्न होता है ?

श्री. राम होनप

साधना करते समय साधक की कुंडलिनी शक्ति कुंडलिनीचक्रों द्वारा आगे बढती है और अंत में वह
सहस्रारचक्र तक पहुंचती है । इस समय कुंडलिनी शक्ति और सहस्रार में स्थित आनंद का संयोग होता है और यह आनंद सूक्ष्म रूप में द्रवीभूत होता है । इसे ‘अमृतरस’ कहते है । योगी इस अमृतरस की अनुभूति लेते हैं । इसे ‘योगी जीवों का अमृतपान’, कहा गया है ।

३. अमृतरस का र्‍हास कैसे होता है ?

योगी सतत अमृतरस की अनुभूती लेते रहते है । वे इस दैवी आनंद का अनुभव लेते हुए शीघ्र आध्यात्मिक प्रगती साध्य करना चाहते है । अमृत की कुछ द्रवीभूत ऊर्जा मस्तिष्क से संबंधित सूक्ष्म ऊर्जाप्रवाहों द्वारा शरीर में नीचे की दिशा में मार्गस्थ होती है । उस समय शरिरांतर्गत विविध कार्याें के लिए इस अमृत का व्यय होता है । यह व्यय योगी जीव टालना चाहते है ।

४. शीर्षासन द्वारा अमृत की रक्षा होने की प्रक्रिया

४ अ. शीर्षासन द्वारा शरीर के असंख्य सूक्ष्म ऊर्जाप्रवाह सिर की दिशा में प्रवाहित होना : प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में मूलाधारचक्र पर ‘जीवनीशक्ति’ होती है । जीवनीशक्ति द्वारा शरीर में ऊपर की और नीचे की दिशा में असंख्य ऊर्जाप्रवाह कार्य करते रहते हैं । योगी शीर्षासन में सिर भूमि पर टिकाकर पैर ऊपर की दिशा में करते हैं । तब शरीर के सर्व सूक्ष्म ऊर्जाप्रवाह सिर की, अर्थात मस्तिष्क की दिशा में प्रवाहित होते हैं । इसलिए सभी ऊर्जाप्रवाहों में विद्यमान सूक्ष्म शक्ति एक साथ मस्तिष्क के ऊर्जाप्रवाहों में जमा होती है ।

४ आ.  मस्तिष्क से संबंधित ऊर्जाप्रवाहों में शक्ति बढने से वहां का अमृत घनीभूत होकर उसकी रक्षा होना : ऊपर उल्लेखित प्रक्रिया के कारण मस्तिष्क से संबंधित ऊर्जाप्रवाहों में शक्ति बढती है एवं वहां अमृत की सूक्ष्म ऊर्जा घनीभूत होती है । यह ऊर्जा घनीभूत होने से अमृत नीचे आने की प्रक्रिया मंद होती है एवं अमृत का व्यय रुक जाता है । शीर्षासन नियमित करने से योगी जीवों के सहस्रारचक्र में विद्यमान अमृत की रक्षा होती है ।’

– श्री. राम होनप (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (ज्ञान मिलने का दिनांक, समय और कुल अवधि : २.९.२०२५, सवेरे १०, १० सेकेंड)

सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।