
भारत मंडपम् – सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव के पहले उद्घाटन सत्र के पश्चात ‘स्वराज्य और संस्कृति’ विषय पर उद्बोधन सत्र का प्रारंभ हुआ । इस सत्र में व्यासपीठ पर रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. वेदवीर, भाजपा के प्रवक्ता श्री. प्रदीप भंडारी, हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळे और सनातन के संत पू. प्रदीप खेमका उपस्थित थे । कार्यक्रम के आरंभ में पू. प्रदीप खेमका ने इस महोत्सव के उपलक्ष्य में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले द्वारा दिए गए संदेश का वाचन किया । तदुपरांत हिन्दू जनजागृति समिति के धर्मप्रचारक सद्गुरु नीलेश सिंगबाळ ने रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. वेदवीर्य आर्य को सम्मानित किया । सनातन संस्था के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. चेतन राजहंस ने भाजपा के प्रवक्ता श्री. प्रदीप भंडारी को सम्मानित किया । इसके पश्चात डॉ. वेदवीर आर्य द्वारा लिखित ‘क्रोनोलॉजी एंड ओरिजिन्स ऑफ इंडो-युरोपियन सिविलाइजेशन’ (इंडो-युरोपियन संस्कृति का कालक्रम और उद्गम) इस पुस्तक का व्यासपीठ पर उपस्थित मान्यवरों के हाथों लोकार्पण किया गया । डॉ. वेदवीर प्राचीन भारतीय इतिहास और वैदिक ज्ञान के विशेषज्ञ हैं । उन्होंने भारत की अस्मिता से जुडे अनेक महत्वपूर्ण तथ्य और दस्तावेजों के आधार पर भारतीय इतिहास की विकृत कहानियों का इस पुस्तक के माध्यम से खंडन किया है ।
श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श अपने विद्यार्थियों को सिखाए जाने चाहिए ! – डॉ. वेदवीर, संयुक्त सचिव, रक्षा मंत्रालय

इतिहास राष्ट्र की नींव होता है । इतिहास के कारण राष्ट्र का संरक्षण और संवर्धन हो सकता है । सनातन राष्ट्र की संकल्पना इतिहास से उत्पन्न हुई । इतिहास किसी भी राष्ट्र का व्यक्तित्व होता है । विश्व निर्माण के कार्य में सनातन के संत-महात्माओं का बहुत बडा योगदान है । सनातन धर्म का यह योगदान आज की पीढी को नहीं सिखाया जाता । इतिहास का लेखन कालक्रम के बिना अधूरा है । आज के इतिहास में वेद, रामायण, महाभारत, पुराण विद्यार्थियों को सिखाए जाने चाहिए । भारतीय इतिहास में भगवान श्रीराम का चरित्र सम्मिलित किया जाना चाहिए । श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श अपने विद्यार्थियों को सिखाए जाने चाहिए । कालक्रम पर आधारित इतिहास स्थापित करने से ही सनातन राष्ट्र का निर्माण संभव है । भारतीय परंपरा में ज्ञान, विज्ञान, दर्शन की साधना समाविष्ट है । वेद से महाभारत तक जो घटनाएं उसमें समाविष्ट हैं, वे खगोलशास्त्र पर आधारित हैं । हम अपने ग्रंथों से, संस्कृति से दूर हो गए हैं । भारत भूमि ही सर्वप्रथम संस्कृति (सभ्यता) का उद्गम स्थान है । इंडो-युरोपियन संस्कृति का उद्गम स्थान भारत है । इतिहास का कालक्रम स्थापित करके उस आधार पर विद्यार्थियों को इतिहास, अंतरिक्ष विज्ञान, गणित, विज्ञान सिखाया जाना चाहिए । खगोलशास्त्र और कृषि आधारित समाज का निर्माण सर्वप्रथम भारत में हुआ । भारत का यह बीता वैभव विद्यार्थियों को सिखाया जाना चाहिए और उसी से सनातन राष्ट्र के निर्माण का कार्य होगा ।
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