Maulana Mahmood Madani : ‘बाबरी’ एवं ‘तलाक’ पर निर्णयों के उपरांत लगता है कि न्यायालय सरकार के दबाव में काम कर रहा है !

‘जमियत उलेमा-ए-हिन्द’ के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी का बयान

‘जमियत उलेमा-ए-हिन्द’ के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी

भोपाल (मध्य प्रदेश) – ‘जमियत उलेमा-ए-हिन्द’ के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने यहां जमियत की संचालन मंडल की बैठक में बयान दिया कि बाबरी मस्जिद एवं तलाक से संबंधित दिए गए निर्णयों को देखते हुए ऐसा आभास होता है कि न्यायालय सरकार के दबाव में काम कर रहा है । उन्होंने कहा, “संविधान द्वारा अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन करने वाले अनेक निर्णय न्यायालयों द्वारा दिए गए । ‘पूजा स्थल कानून १९९१’ के प्रावधानों के उपरांत भी कुछ प्रकरणों में हुई कार्रवाई के उल्लंघन का स्पष्ट उदाहरण है ।”

मदनी द्वारा दिए गए बयान

संविधान रहने तक ही सर्वोच्च न्यायालय को ‘सर्वोच्च’ कहा जा सकता है !

उन्होंने कहा कि जब तक संविधान सुरक्षित है, तभी तक सर्वोच्च न्यायालय को ‘सुप्रीम (सर्वोच्च)’ कहा जा सकता है; अन्यथा उस नाम का अधिकार ही नहीं रहता ।

(और इनकी सुनिए…) ‘भय के कारण वन्दे मातरम् बोलना यानी मृतप्राय समाज की पहचान !

भय से आत्मसमर्पण करने वाला समाज स्वयं को खो देता है । किसी के कहने पर ‘वन्दे मातरम्’ बोलना आरंभ करना, यह मृतप्राय समाज की पहचान है । यह आत्मविश्वास खोने जैसा है । यदि समाज जीवित होगा, तो परिस्थिति का सामना करना पडता है । (देश पर बाहरी मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा किए गए आक्रमण के उपरांत अनेक हिन्दुओं ने डर के मारे इस्लाम स्वीकार कर लिया था । उन्हीं के वंशज आज ‘वन्दे मातरम्’ बोलने को डर कह रहे हैं, इसे उपहास ही कहा जा सकता है ! – संपादक) मुस्लिम समाज को निराशा से दूर रहना चाहिए । निराशा किसी भी समाज के लिए विष के समान है । (मुसलमान निराश हैं, यह खोज मदनी ने कैसे की ? – संपादक)

जहां अत्याचार, वहां जिहाद !

१. शासन एवं मीडिया एक पवित्र शब्द को अनुचित अर्थ में विश्व के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं । ‘जिहाद’ को विभिन्न लेबल जोडकर अपकीर्त (बदनाम) किया जा रहा है । (बदनाम शासन तथा मीडिया नहीं, अपितु मुसलमान ही कर रहे हैं । मदनी यह बताने की अपेक्षा दूसरों को ही दोषी ठहरा रहे हैं, इससे यही कहा जा सकता है कि वे ही बडे जिहादी हैं ! – संपादक)

२. जिहाद हमेशा ही पवित्र रहा है एवं दूसरों के हित के लिए ही बताया गया है । जहां अत्याचार होगा, वहां जिहाद होगा । (यदि ऐसा है, तो भारत सहित विश्व भर में इस्लामी आतंकवादी संगठन किन अत्याचारों के विरुद्ध जिहाद कर रहे हैं, यह मदनी को बताना चाहिए ! – संपादक)

३. धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले भारत में जिहाद की चर्चा करने का कोई कारण नहीं है । यहां मुसलमान संविधान के प्रति निष्ठावान हैं । (क्या मदनी यह कहना चाहते हैं कि कश्मीर में डॉक्टर आतंकवादी आक्रमण कर रहे हैं, वे संविधान के प्रति निष्ठावान हैं ? – संपादक)

४. जिहाद व्यक्तिगत प्रतिशोध का प्रकार नहीं है, तथा इस पर निर्णय केवल धार्मिक कानून से चलने वाली सत्ता ही ले सकती है । लव जिहाद, भूमि जिहाद एवं थूक जिहाद जैसे शब्द मुसलमानों का अपमान करने वाले हैं । (यह अपमान अन्य धर्मीय नहीं, अपितु मुसलमान इस प्रकार की कृति करके ही कर रहे हैं । उनके विरुद्ध मदनी एक शब्द भी नहीं बोलते । इससे यही स्पष्ट होता है कि उनका इसे समर्थन है ! – संपादक)

५. इस्लाम के विरोधियों ने जिहाद को हिंसा का अर्थ देकर प्रस्तुत किया है । इस्लाम में जिहाद मुसलमानों के लिए एक पवित्र कर्तव्य माना जाता है । (ऐसा जिहाद कौन सा मुसलमान कब एवं कहां करता है या किया है, इसका उदाहरण मदनी को देना चाहिए ! – संपादक)

६. नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना शासन का दायित्व है तथा यदि उसका पालन नहीं किया जाता है, तो दोष शासन का ही है ।

देश के ६० प्रतिशत लोगों तक मुसलमानों को पहुंचना चाहिए !

वर्तमान में देश में १० प्रतिशत लोग मुसलमानों के पक्ष में हैं, ३० प्रतिशत उनके विरुद्ध हैं तथा ६० प्रतिशत लोग शांत हैं । मुसलमानों को इस शांत वर्ग से संवाद साधना चाहिए, अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए; क्योंकि यही वर्ग उनके विरुद्ध हो गया, तो गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है ।

(और इनकी सुनिए…) ‘वन्दे मातरम्’ को पूरे देश पर थोपना उचित नहीं ! – ‘जमात-ए-इस्लामी हिन्द’ के अध्यक्ष मौलाना सादातुल्लाह हुसैनी

‘जमात-ए-इस्लामी हिन्द’ के अध्यक्ष मौलाना सादातुल्लाह हुसैनी ने मौलाना मदनी के बयानों पर कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ जैसे विषय पर विवाद उत्पन्न करना अविवेकपूर्ण है । प्रत्येक व्यक्ति को उसकी श्रद्धा के अनुसार जीने एवं अपने तरीके से देशभक्ति व्यक्त करने का अधिकार है । एक ही घोषणा को पूरे देश पर थोपना उचित नहीं है ।

संपादकीय भूमिका 

  • मुसलमानों के विरुद्ध न्यायालय के निर्णय आने पर वे न्यायालय पर इस प्रकार के आरोप लगाने का प्रयास कर रहे हैं, इसलिए जनता का मानना है कि न्यायालय को इसका संज्ञान लेकर कार्रवाई का आदेश देना चाहिए !
  •  ऐसे बयान भारतीय लोकतंत्र की न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास दिखाने के साथ ही उसका अपमान करने का प्रयास हैं । इसलिए ऐसे मौलानाओं (इस्लाम के विद्वान) के विरुद्ध राजद्रोह का अभियोग प्रविष्ट कर उन्हें जेल में डाल देना चाहिए !