
| ‘आश्विन शुक्ल दशमी को जब आकाश में तारे दिखाई देने लगते है, उस समय को विजय मुहूर्त कहा जाता है । उस समय आप जो भी काम हाथ में लेंगे, उसमें सफलता मिलती है’, ऐसा पुराण में बताया है ।’ – श्री. विवेक भोर (साभार : दैनिक ‘नवराष्ट्र’) |
हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार एवं शुभ दिन : दशहरा ! आश्विन शुक्ल दशमी को ‘विजयादशमी’ अथवा ‘दशहरा’ कहते हैं । आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक देवी का नवरात्रोत्सव होता है । उसका समापन दशहरे के दिन होता है । शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज एवं महिषासुर आदि राक्षसों का संहार करने के लिए दुर्गादेवी ने चंडी अवतार धारण किया तथा ९ दिनों तक इन राक्षसों के साथ युद्ध किया । दशमी के दिन महिषासुर का वध कर उन्होंने अंतिम विजय प्राप्त की; इसलिए इस दिन आनंदोत्सव मनाते हैं । इस वर्ष दशहरा २ अक्टूबर को मनाया जाएगा ।
स्कंदपुराण में यह कथा है कि कौत्स को १४ करोड स्वर्णमुद्राएं देने के लिए रघुराजा ने कुबेर पर आक्रमण किया । उससे भयग्रस्त होकर कुबेर ने इसी दिन शमी के वृक्ष पर स्वर्णवर्षा की । रघुराजा ने उसमें से आवश्यक सोना लिया तथा शेष सोना नागरिकों में बांट दिया । सामान्यतः दशहरा त्रेतायुग से मनाया जानेवाला त्योहार है, जिसका हिन्दू धर्म में महत्त्व अनन्य है ।
इसी दिन भगवान राम के पूर्वज अयोध्याधीश राजा रघु ने विश्वजीत यज्ञ किया था । उस काल से अर्थात त्रेतायुग से हिन्दू लोग विजयादशमी महोत्सव मनाते हैं । इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था । तब से यह दिवस विजयोत्सव अर्थात विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है ।
– श्री. विवेक भोर (साभार : दैनिक ‘नवराष्ट्र’)
दशहरे के दिन लकडी की पटिया (स्लेट) पर सरस्वती की प्रतिमा क्यों बनाई जाती है ?

दशहरे के विषय में कहा जाता है कि देवी ने १० दिन तक राक्षसों के साथ युद्ध कर दशहरे के दिन विजय प्राप्त की । कुछ लोग कहते हैं, ‘पांडव उनका वनवास एवं अज्ञातवास समाप्त कर दशहरे के दिन युद्ध के लिए सुसज्ज हुए थे ।’ कुछ लोग कहते हैं, ‘आज के ही दिन प्रभु श्रीरामचंद्र ने रावण को पराजित किया था; इसलिए इस दिन रावण-दहन किया जाता है । आपस में अश्मंतक के पत्ते देकर पुराने विवाद मिटाए जाते हैं ।’ कुछ लोग उनके पास के औजारों एवं विद्या का पूजन करते हैं । उसमें देवी सरस्वती की एक प्रतिमा बनाई जाती है । दशहरे के दिन देवी सरस्वती की प्रतिमा बनाकर बचपन में हम उसे विद्यालय भी ले जाते थे । सायंकाल के समय कुमकुम अथवा लेखनी से ऐसी ही प्रतिमा बनाकर परिवार के बडे लोग देवी सरस्वती की पूजा करते थे । उस त्रिकोणाकृति बीजमंत्र का उपयोग कर यह सरस्वती यंत्र बनाया गया तथा वह प्रचलित हुआ । यह सरस्वती यंत्र थोडे-बहुत अंतर के साथ देवी सरस्वती से संबंधित ग्रंथ में मिलता है । तंत्रशास्त्र का कोई भी यंत्र बीजमंत्र का प्रकटीकरण होता है । ऐसे अनेक यंत्र अधिकतर सभी देवी-देवताओं के होंगे । यह आकृति तो बीजमंत्र का छोटा रूप है ।
– रश्मी डोंगरे (साभार : दैनिक ‘नवराष्ट्र’)
शास्त्र एवं शस्त्र पूजन !

प्राचीन काल से क्षत्रिय युद्ध पर जाने के लिए दशहरे का दिन चुनते थे । ‘दशहरे के दिन किए जानेवाले युद्ध में निश्चित ही विजय मिलती है’, ऐसी उनकी मान्यता थी । क्षत्रियों की भांति ब्राह्मण भी दशहरे के दिन विद्या ग्रहण करने के लिए घर से निकलते थे । व्यापारी लोग विजयादशमी के पवित्र दिन नई दुकान, ‘शोरूम’ आदि का शुभारंभ करना शुभ मानते हैं ।
– श्री. विवेक भोर (साभार : दैनिक ‘नवराष्ट्र’)
दशहरे के दिन धन, ज्ञान एवं भक्ति की पूजा की जाती है ।
दशहरे के दिन धन, ज्ञान एवं भक्ति की पूजा की जाती है । उसके प्रतीक के रूप में सोने अर्थात अश्मंतक के पत्ते, लकडी की पटिया (स्लेट), पुस्तकें अर्थात देवी सरस्वती तथा शस्त्रों का पूजन किया जाता है । दशहरे के दिन धनसंपति (महालक्ष्मी), शक्ति (महाकाली), ज्ञानसंपदा (महासरस्वती), इन तीन शक्तिदेवियों का स्मरण किया जाता है । नवरात्रोत्सव में बिठाई गई मूर्तियों एवं कलश की शोभायात्रा निकालकर विसर्जन किया जाता है । दशहरे के दिन सोने के प्रतीक के रूप में परस्पर अश्मंतक के पत्ते देने की प्रथा आज भी है ।
‘अश्मंतक’ वृक्ष की पूजा करते समय बोला जानेवाला मंत्र
अश्मन्तक महावृक्ष महादोषनिवारण ।
इष्टानां दर्शनं देहि कुरु शत्रुविनाशनम् ।।
अर्थ : ‘हे अश्मंतक महावृक्ष, तुम महादोषों का निवारण करनेवाले वृक्ष हो । तुम मुझे मेरे मित्रों का दर्शन कराओ तथा शत्रुओं का नाश करो ।’ यह प्रार्थना कर उस वृक्ष की जड में चावल, सुपारी एवं स्वर्णमुद्रा अथवा तांबे की मुद्रा रखते हैं । उसके पश्चात वृक्ष की परिक्रमा कर उसके तने के पास थोडी-सी मिट्टी रखकर वृक्ष के पत्ते घर लाते हैं । इसके पश्चात सभी संबंधियों एवं मित्रों में अश्मंतक के पत्ते बांटे जाते हैं । – प्रियांका वाणी (साभार : दैनिक ‘महाराष्ट्र टाइम्स’)
दशहरे के मंगल दिवस पर क्या करना चाहिए ?

१. इस दिन शमी अथवा अश्मंतक के वृक्ष की पूजा की जाती है । शमी के वृक्ष के पास ही अपराजिता देवी का चित्र बनाकर उनकी भी पूजा की जाती है । रावण का वध करने हेतु श्रीराम ने इसी दिन शमी का पूजन कर प्रस्थान किया । अर्जुन ने अज्ञातवास समाप्त कर इसी दिन शमी का पूजन कर पुनः शस्त्र उठाए थे ।
२. ‘विजयोत्सव होने से राजा को इस दिन अपने घोडों को सुशोभित आभूषण पहनाने चाहिए, ‘निराजन’ नाम का अनुष्ठान करें तथा शस्त्रों का पूजन कर विजय के लिए प्रस्थान करना चाहिए’, ऐसा बताया गया है ।
३. दशहरे के दिन शमी वृक्ष के पूजन का विशेष महत्त्व है । नवरात्रि में प्रतिदिन सायंकाल शमी के वृक्ष का पूजन करने से स्वास्थ्य एवं धन प्राप्त होता है, ऐसा माना जाता है ।
४. अश्मंतक के पत्ते पित्त एवं कफ, दोषों पर गुणकारी हैं । विजयादशमी के दिन आपस में अश्मंतक के पत्ते बांटे जाते हैं, इसी को ‘सोना लूटना’ भी कहते हैं ।
५. पहले दशहरा कृषि से संबंधित एक उत्सव था । वर्षा ऋतु में बोई गई पहली फसल घर आने पर किसान यह उत्सव मनाते थे ।
६. नवरात्रि में घटस्थापना (कलश स्थापना) के दिन घट के नीचे थाली रखकर उसमें ९ अनाजों के बीज बोए जाते हैं । दशहरे के दिन उन अनाजों के फूटे अंकुर उखाडकर भगवान को समर्पित करते हैं । अनेक स्थानों पर खेत से चावल की बालियों को तोडकर उन्हें प्रवेशद्वार पर तोरण जैसे बांध देते हैं ।
– श्री. विवेक भोर (साभार : दैनिक ‘नवराष्ट्र’)
अयोध्या के रघुराजा एवं कुबेर के मध्य की विजयादशमी की कथा !
राजा कौत्स ने उनके गुरु वरतंतू से विद्या प्राप्त की । कौत्स राजा के आग्रह पर उन्होंने दक्षिणा के रूप में १४ करोड स्वर्णमुद्राएं मांगी; परंतु कौत्स राजा के पास इतनी मुद्राएं न होने के कारण वे अयोध्या के रघुराजा के पास गए; परंतु रघुराजा ने उसके कुछ ही दिन पूर्व यज्ञ संपन्न कर अपनी पूरी संपत्ति दान कर दी थी । उन्होंने कौत्स को दूसरे दिन आने के लिए कहा । तब रघुराजा ने कुबेर पर आक्रमण किया । कुबेर ने रघुराजा को उनकी इच्छा के अनुरूप संपत्ति देना स्वीकार किया तथा उसके अनुसार कुबेर ने रात में धन की वर्षा की । ये सभी स्वर्णमुद्राएं अश्मंतक के वृक्ष से भूमि पर गिरीं । वह दिन विजयादशमी का था । – श्री. नितिन गाडगे (साभार : दैनिक ‘नवराष्ट्र’)
‘वनशाक’ के रूप में अश्मंतक की सब्जी की पहचान होना
अश्मंतक के पत्ते को आयुर्वेद में भी गौरवान्वित किया गया है । इस वृक्ष का शास्त्रीय नाम है ‘बोहिनिया रेसिमोसा’ तथा यह वृक्ष सिजलपिनेसी कुल का है । इसे महाराष्ट्र के अमरावती एवं यवतमाळ क्षेत्र में भोसा एवं आपटा कहा जाता है । अश्मंतक एक छोटा वृक्ष होता है, जिसमें मार्च से जुलाई की अवधि में फूल आते हैं ।
विभिन्न क्षेत्र के लोग अश्मंतक के कोमल पत्ते तथा फूलों की सब्जी खाते हैं; इसलिए ‘वनशाक’ के रूप में भी इसकी पहचान है । मलेरिया, खांसी, युरिनेशन एवं मासिक धर्म की बीमारियों में अश्मंतक के पत्ते का उपयोग किया जाता है । इसी कारण जगद्गुरु संत तुकाराम महाराजजी का ‘वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी (अर्थात वृक्ष और लताएं हमारे मित्र हैं ।)’, यह वचन अनमोल सिद्ध हुआ है ।
– श्री. नितिन गाडगे (साभार : दैनिक ‘नवराष्ट्र’)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?