शहरी नक्सलवाद : राष्ट्र के सामने एक चुनौती !

पिछले अंक में प्रकाशित लेख में आपने ‘नक्सलवाद की संकल्पना, शहरी नक्सलवादियों के लक्षण; भारत राष्ट्र को नष्ट करना, यह नक्सलवादियों का लक्ष्य और शहरी नक्सलवादियों के उदाहरणों’ के बारे में पढा । आज हम इस लेख का अंतिम भाग प्रस्तुत कर रहे हैं ।

शहरी नक्सलवाद

५. नक्सलवादी भारत के टुकडे क्यों करना चाहते हैं ?

‘भारत एक राष्ट्र है’, इस वैचारिक नफरत के कारण शहरी नक्सलवादियों में ‘भारत के टुकडे करो’ यह विचार दृढ हो गया है । उन्हें लगता है कि भारत पूंजीवादी शोषण, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और बहुसंख्यक शासन जैसी औपनिवेशिक संरचना का प्रतिनिधित्व करता है । एक जागरूक बहुलतावादी लोकतंत्र के रूप में भारत को न देखकर वे यह मानते हैं कि ‘भारत एक साम्राज्यवादी शक्ति है और इसे नष्ट किया जाना चाहिए ।’

(सेवानिवृत्त) मेजर सरस त्रिपाठी

६. नक्सलवाद का प्रमुख उद्देश्य

अ. कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों और मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में विघटनकारी आंदोलनों को समर्थन देकर भारत की एकता को कमजोर करना ।

आ. ‘राष्ट्रीय और सनातन धर्म के प्रतीक, संस्थाएं, परंपराएं – ये सब प्रतिगामी और दमनकारी हैं’, ऐसा उपहास उडाकर भारत की सांस्कृतिक एकरूपता को चुनौती देना ।

इ. देश के भीतर अस्थिरता निर्माण करने के लिए जातियों के बीच संघर्ष और सामाजिक ध्रुवीकरण को प्रोत्साहन देना ।

ई. वैश्विक स्तर पर भारत की अपकीर्ति (बदनामी) करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, विशेष रूप से मानवाधिकार और मीडिया के क्षेत्रों में भारत-विरोधी कथानकों से मेल-जोल रखना ।

‘भारत में परिवर्तन लाने के लिए भारतीय संविधान और लोकतंत्र ये उपकरण नहीं, बल्कि बाधाएं हैं और इन्हें हटाया जाना चाहिए’ – ऐसी उनकी वैचारिक दृष्टि है । इसलिए उनकी दूरदृष्टि भारतीय गणराज्य की एकता और अखंडता के विरोध में है ।

७.  लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की रक्षा करना, यह भारत के सामने मुख्य चुनौती है !

शहरी नक्सली यह कट्टरपंथी विचारधारा का खतरनाक सम्मिलन, शहरी सभ्यता और छुपी हुई आक्रामकता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । यद्यपि वैध वैचारिक मतभेद की तुलना देशद्रोह से नहीं करनी चाहिए, फिर भी बुद्धिजीवी के मुखौटे के पीछे विध्वंसक धमकियां देनेवालों को पहचानकर उनके प्रयासों को निष्फल करना उतना ही आवश्यक है । भारत के सामने चुनौती यह है कि आंतरिक विध्वंसक गतिविधियों पर नजर रखते हुए लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की रक्षा करनी है । शहरी नक्सलियों द्वारा प्रस्तुत वैचारिक युद्ध को उजागर कर उनकी पराजय के लिए सुरक्षा, शासन, शिक्षा और जनजागरण – इन सभी को आपस में जुडकर कार्य करना होगा । कल्पनाओं के इस शीतयुद्ध में पागलपन नहीं, बल्कि जागरूकता यह मार्गदर्शक तत्त्व होना चाहिए ।

(समाप्त)

लेखक : मेजर सरस त्रिपाठी (सेवानिवृत्त), ‘प्रज्ञामठ पब्लिकेशन्स’, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश. (२८.७.२०२५)