वर्तमान समय में सवेरे जागते ही ‘गुड मॉर्निंग’ (सुप्रभात) अथवा रात को सोते समय ‘गुड नाइट’ (शुभ रात्रि) बोलना, ‘हैव ए नाइस डे’ अर्थात ‘आपका दिन शुभ हो’… जैसी भावनाएं व्यक्त करने की एक प्रथा ही बन चुकी है । विद्यालय-महाविद्यालयों से लेकर विभिन्न सरकारी कार्यालय, निजी प्रतिष्ठान इत्यादि सभी क्षेत्रों में यह प्रचलन दिखाई देता है । इस प्रकार पिछले एक-दो दशकों में भावनाओं की अभिव्यक्ति बढ गई है । अब तो लोग मानो इसमें पागल ही हो चुके हैं । इसकी अर्थहीनता, कारण तथा समाज पर हो रहे उसके दुष्परिणाम इत्यादि सूत्रों को समझना ही इस लेख का प्रयोजन है !
१. अभिव्यक्ति निश्चित रूप से क्या है ?
‘अभिव्यक्ति’ का अर्थ है स्वयं की भावनाएं, विचार, कल्पनाएं अथवा अभिमत जो अन्यों की समझ में आएं; इस प्रकार से व्यक्त करना ! इसमें बोलना, लिखना अथवा अन्य किसी भी माध्यम से स्वयं को प्रकट करना अंतर्भूत है, उदा. हम किसी को जन्मदिवस के उपलक्ष्य में अथवा विवाह के अवसर पर शुभकामनाएं व्यक्त कर आनंद व्यक्त करते हैं अथवा किसी के निधन के अवसर पर हम उनके परिजनों से दुख व्यक्त करते हैं । जब तक हम अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करते, तब तक वह सामनेवाले की समझ में नहीं आतीं । भले ही ऐसा हो; परंतु वर्तमान समय में सर्वत्र अभिव्यक्ति की अतिशयोक्ति (ओवरडोज) ही दिखाई देती है ।

२. चल-दूरभाष पर सवेरे से लेकर रात तक आनेवाले सैकडों संदेश अभिव्यक्ति की अतिशयोक्ति ही हैं !
किसी के प्रति मन में अच्छी भावनाएं रखना, उसे शुभकामनाएं देना तथा उन्हें व्यक्त करना अच्छा है, इसमें कोई दो राय नहीं; परंतु वर्तमान में आज हम सभी के दिन का आरंभ ‘गुड मॉर्निंग’, ‘शुभ सोमवार, मंगलवार’… जैसे न जाने कितने प्रकार के संदेशों के लेन-देन से होता है । अब तो कुछ लोग ‘शुभ दोपहर’ के भी संदेश भेजने लगे हैं ।
मानो यह अल्प था, इसलिए वर्तमान में विभिन्न प्रकार के ‘डे’ (विशेषतापूर्ण दिवस) मनाने का प्रचलन बढ गया है । चल-दूरभाष पर इन ‘डे’ की शुभकामनाएं भी दी जाती हैं । कभी ‘वकील डे’ होता है, कभी ‘डॉक्टर डे’ होता है, कभी ‘चॉकलेट डे’, तो कभी अन्य कोई ‘डे’ होता है । मुझे चाय प्रिय है; इसलिए कुछ दिन पूर्व किसी ने मुझे ‘चाय डे’ का संदेश भी भेजा । उस समय तो ऐसे भी ‘डे’ होते हैं, यह देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया । ऐसे ‘डे’ मनाते-मनाते हमारे जीवन के कितने ‘डे’ अर्थात दिन समाप्त हो रहे हैं, इसका भान इन ‘डे’ मनानेवालों को नहीं रहता । ठीक है, कुछ लोगों को उनके द्वारा भेजा गया संदेश संबंधित व्यक्ति ने नहीं पढा अथवा अन्यों ने प्रत्युत्तर नहीं किया, तो उसका भी बुरा लगता है । उसके कारण विवशतावश ही सही; परंतु कोई ‘हावभाव’ (इमोजी) भेजकर सामनेवाले को संतुष्ट किया जाता है ।
इन संदेशों के लेन-देन की अतिशयोक्ति की फलोत्पत्ति ऐसी हुई कि अब ऐसे संदेश लगभग सभी लोग आगे (फॉरवर्ड) भेजते हैं अर्थात स्वयं बिना पढे ही अन्यों को भेज देते हैं । सभी को यह ज्ञात होने पर भी समझ में न आने से संदेशों के लेन-देन का यह प्रकरण चल ही रहा है ।
संत तुलसीदास के प्रेम कीअति होने पर उनकी पत्नी द्वारा उनका किया गया अध्यात्मबोध !

संत तुलसीदास उनकी धर्मपत्नी रत्नावली से बहुत प्रेम करते थे तथा उसे वे निरंतर व्यक्त भी करते रहते थे । वे सदैव रत्नावली के साथ रहते थे तथा एक क्षण भी उन्हें अकेला नहीं छोडते थे । उसके कारण उनकी पत्नी को एकांत न मिलने से वे कभी-कभी ऊब जाती थीं । एक बार ऊबकर वे मायके चली गईं, तब तुलसीदासजी उनसे मिलने के लिए इतने अधीर हो गए कि एक तूफानी रात में नदी पार कर वे उनके मायके पहुंचे । अंधेरे में उन्होंने उस घर के द्वार से लटक रहे सांप को रस्सी समझकर उसे पकड लिया तथा वे खिडकी से घर में प्रवेश कर गए । जब रत्नावली ने यह देखा, तो वह बहुत लज्जित हुईं तथा उन्होंने तुलसीदासजी से कहा, ‘‘अस्थि चर्ममय देह यह, ता में ऐसी प्रीति ! वैसी जो श्रीराम में, होत न तव भवभीति !’’ (अर्थात हड्डियों तथा मांस से बनी इस देह से आप जितना प्रेम करते हैं, उससे आधा प्रेम भी आप यदि प्रभु श्रीराम से करते, तो आपका जीवन सार्थक हो जाता तथा उसके लिए भवसागर पार करने का भय भी मिट जाता !) उसी क्षण संत तुलसीदासजी को उनकी चूक का भान हुआ । उसके उपरांत उन्होंने गृहस्थी का मोह छोडकर भक्ति का मार्ग स्वीकार किया । आगे जाकर वे महान संत तुलसीदास के नाम से विख्यात हुए ।
इस कथा से हमें भी यह बोध मिलता है कि किसी भी बात की अति (ओवरडोज) अन्य के लिए कष्टकारी ही सिद्ध होती है । अध्यात्म की जानकार होने से संत तुलसीदासजी की पत्नी ने अपने पति को उचित अध्यात्मबोध किया, जिससे संत तुलसीदासजी का जीवन सार्थक हुआ । हमें इस इतिहास से बोध लेकर अध्यात्मशास्त्र का अध्ययन कर पाश्चात्यों का व्यर्थ अंधानुकरण टालना चाहिए ।
– श्री. योगेश जलतारे
३. चल-दूरभाष के संदेशों के अनावश्यक लेन-देन के दुष्परिणाम
ऐसे संदेश भेजनेवालों को इसका भान नहीं होता कि हम ऐसे सभी अनावश्यक संदेशों की अतिशयोक्ति कर स्वयं का तथा अन्यों का भी समय व्यर्थ गंवा रहे हैं । एक संदेश पढने के लिए न्यूनतम १० सेकंड लगते ही हैं तथा वह संदेश १ लाख लोगों को भेजा जाता है, तो ऐसा कर हमने लगभग १० लाख सेकंड व्यर्थ गंवाए हैं; यह सामान्य गणित हम ध्यान में नहीं लेते ।
दूसरी बात यह कि वर्तमान में कुछ लोग इन संदेशों के विभिन्न आकर्षक ‘पोस्ट’ (लेखन का चित्र) बनाते हैं तथा वीडियो बनाते हैं, जिससे इन संदेशों का आकार बढता है । यह आकार कुछ ‘एमबी’ (मेगाबाइट – संगणकीय संग्रहण का एक यूनिट) में होता है । वर्तमान में भले ही यह आकार न के बराबर लगता हो, तब भी उसके लिए थोडे ‘इंटरनेट डेटा’ का उपयोग तो किया जाता ही है न ? इससे हम स्वयं का तथा अन्यों का इंटरनेट ‘डेटा’ व्यर्थ गंवाते ही हैं; परंतु साथ ही स्वयं की आर्थिक हानि तथा चल-दूरभाष के सेवा प्रदाता को आर्थिक लाभ कराते हैं ।
४. भारत में मूलतः ही रिश्तों में प्रेम का धागा होने से क्या इस प्रकार से निरंतर अभिव्यक्ति की आवश्यकता है ?
मुझे मेरे बचपन का स्मरण होता है । उस समय ‘गुड मॉर्निग’, ‘गुड नाइट’ जैसे शब्द कभी-कभी ही सुनाई देते थे । लोग जब एक-दूसरे से मिलते थे, तब वे ‘नमस्कार’, ‘राम-राम’, ‘राधे राधे’ अथवा ‘जय श्रीकृष्ण’ बोलते थे । संबंधी एक-दूसरे के शुभचिंतक होने से उन पर इस प्रकार भावनाएं व्यक्त करने की स्थिति नहीं आती थी । मूलतः भारत में प्रेम अथवा अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करने का चलन ही नहीं था । अन्यों के हित के लिए प्रार्थना करना, ईश्वर को पुकारना जैसी पद्धतियों से ही अन्यों का शुभचिंतन होता था । इसमें ईश्वर को प्रार्थना करने से स्वाभाविक ही सामनेवाले व्यक्ति का मंगल होता था ।
मुझे मेरे माता-पिता, मेरे बडे भाई-बहन अथवा अन्य संबंधियों में से किसी ने भी ‘हम तुमसे प्रेम करते हैं’, ऐसा बोलकर नहीं दिखाया, तब भी वे मुझसे आत्यंतिक प्रेम करते थे, कर रहे हैं तथा आगे भी करते रहेंगे; इसके प्रति मैं आश्वस्त हूं । हममें से प्रत्येक का अनुभव ऐसा ही होगा ।
पाश्चात्यों में स्वकेंद्रितता, संकीर्णता तथा स्वार्थ भरा होने से वहां परिवार-व्यवस्था कभी विकसित हो ही नहीं पाई । उसके कारण उन्हें एक-दूसरे के प्रति पुनः-पुनः प्रेम व्यक्त करना पडता है, अन्यथा वह सामनेवाले की समझ में नहीं आता । कुछ दिन पूर्व नौकरी के लिए भारत से विदेश गए एक साधक ने मुझे एक अच्छा सूत्र बताते हुए कहा, ‘विदेशों में लोगों को एक-दूसरे को बार-बार ‘आइ लव यू’ (मैं तुमसे प्रेम करता हूं), ‘आई लाइक यू’ (तुम मुझे प्रिय हो); ऐसा बोलना पडता है । प्रेम व्यक्त करने के लिए आलिंगन देना पडता है अथवा कुछ लोग एक-दूसरे का चुंबन लेते हैं । इससे उन्हें वे सामनेवाले से प्रेम करते हैं, ऐसा दिखाना पडता है; परंतु भारत में मूलतः ही प्रेम होने से इस प्रकार से प्रेम अभिव्यक्त करने का प्रचलन कभी रहा ही नहीं । पाश्चात्य देशों में दिखावे की जो पद्धति है, वही अब भारत में भी प्रचालित हो रही है ।’
५. सामनेवाले व्यक्ति के प्रति मन में सचमुच हीप्रेम न हो, तो अभिव्यक्त होना औपचारिकता मात्र ही है !
मन में जहां प्रेम की नमी न होते हुए भी ऊपर से कृत्रिम पद्धति से एक-दूसरे को शुभकामनाएं देना, ‘गुड मॉर्निंग’, ‘गुड नाइट’ के संदेश भेजना… जैसी कृतियां कर क्या प्रेम विकसित होगा ?, कोई भी स्वयं से यह सामान्य प्रश्न नहीं पूछता । हमने अंतर्मुख होकर विचार किया, तो हमें हमारे प्रश्न का उत्तर मिलेगा कि जब हम अन्यों को ऐसे भावनाशील संदेश भेजते हैं, तब सचमुच हमारे मन में सामनेवाले व्यक्ति के प्रति कितना प्रेम होता है ? केवल अन्य लोग हमें अच्छा कहें अथवा हमारा अस्तित्व सामनेवाले के ध्यान में आए, क्या इसके लिए यह इतना झंझट चलता रहता है ? ठीक है; परंतु ‘अन्यों का भला हो’, इस आशय के संदेश भेजकर भले ही हम स्वयं को अभिव्यक्त करते हों, तब भी हम दिन में कितनी बार सामनेवाले व्यक्ति के भले के लिए ईश्वर के चरणों में प्रार्थना करते हैं ? अथवा उसकी भलाई का विचार हमारे मन में कितने समय तक बना रहता है ?, इन प्रश्नों के उत्तर खोजे जाएं, तो स्वयं का वास्तविक रूप स्वयं के ही ध्यान में आएगा तथा भावनाओं की अभिव्यक्ति का यह जो क्रम चल रहा है, वह अपनेआप अल्प हो जाएगा ।
६. …इसकी अपेक्षा ईश्वर के प्रति निरंतर प्रेम व्यक्त करने से आध्यात्मिक उत्थान होगा !
हमारे यहां प्राचीन काल से किसी भी व्यक्ति से मिलने पर उसका अभिवादन करने की पद्धति थी । यदि कोई बराबरी का अथवा समवयस्क एक-दूसरे से मिलता था, तब वे एक-दूसरे को ‘राम राम’, ‘हरि ॐ’, ‘राधे राधे’ ऐसा कुछ बोलकर एक-दूसरे को ईश्वर का स्मरण करा देते थे । उनके अभिवादन में एक-दूसरे में विद्यमान ईश्वरीय तत्त्व को प्रणाम करने का भाव था । वह अब विलुप्त होकर हम पाश्चात्यों का अंधानुकरण करते हुए एक-दूसरे से ‘हैंडशेक’ (हाथ मिलाना) करते हैं, ‘गुड मॉर्निंग’, ‘गुड आफ्टरनून’ (शुभ दोपहर), ‘गुड नाइट’ बोलकर संबोधित करते हैं । क्या इससे सचमुच ही उस व्यक्ति की ‘मॉर्निंग’ अथवा ‘आफ्टरनून’ ‘गुड’ होनेवाली है ?, इस पर हमें अवश्य विचार करना चाहिए । उसके स्थान पर हमने देवताओं के नाम की जयजयकार कर एक-दूसरे तक अपनी भावनाएं पहुंचाईं, तो उससे हमें ईश्वर के निकट जाने में सहायता मिलेगी । यदि हमें निरंतर प्रेम ही व्यक्त करना है, उस प्रेम को हमने ईश्वर के प्रति व्यक्त किया, तो उससे स्वयं में भाव की वृद्धि होकर आगे जाकर उसका रूपांतरण श्रद्धा बढने में होगा तथा उससे स्वयं की साधना होगी ।
अतः आज हम जो कुछ भी समय चल-दूरभाष पर अथवा प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे से मिलकर पाश्चात्यों की भांति एक-दूसरे को शुभकामनाएं देने में व्यर्थ गंवाते हैं, उस समय का उपयोग हम प्रार्थना एवं नामजप करने के लिए करने का प्रयास करेंगे । यदि किसी के प्रति हमारे मन में सचमुच ही शुभ चिंतन होता है, तो उसके जीवन की सभी समस्याएं दूर होकर उसकी आध्यात्मिक उन्नति हो; इसके लिए हम प्रार्थना करेंगे । एक-दूसरे के जन्मदिवस पर केवल खोखली शुभकामनाएं न देकर उस दिन संबंधित व्यक्ति के लौकिक एवं पारलौकिक उत्थान के लिए हम प्रार्थना करेंगे । हम सभी की प्रार्थनाओं के कारण ईश्वर निश्चित ही सामनेवाले व्यक्ति का मंगल करेंगे । अन्यों के लिए प्रार्थना करने से स्वयं की भी समष्टि साधना होकर उसी ईश्वर की कृपा हम पर भी होनेवाली है, इसे ध्यान में लेकर हमें उस प्रकार प्रयास बढाना महत्त्वपूर्ण है । तो चलिए, आज से हम इस दिशा में आचरण करने का प्रयास करेंगे !’
– श्री. योगेश जलतारे, समूह संपादक, ‘सनातन प्रभात’ प्रसारमाध्यम. (२.८.२०२५)

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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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