१. चिकित्सालय द्वारा अल्प मूल्य में परीक्षण करने का लालच दिया जाना तथा रोगियों पर दबाव बनाकर शल्य क्रिया का निर्णय तुरंत लेने के लिए बाध्य किया जाना
‘अप्रैल २०२५ में मेरी पत्नी को शारीरिक कष्ट हो रहा था; इसलिए मेरे बेटे ने वाशी, नई मुंबई में स्थित एक प्रसिद्ध चिकित्सालय में पत्नी की जांच करवाई । उसमें रक्त परीक्षण, ‘ईसीजी’ कराना (हृदयालेख बनाना), ‘२ डी-इको’ परीक्षण (ध्वनितरंगों की सहायता से हृदय का कार्य देखना) तथा ‘स्ट्रेस टेस्ट’ (पट्टे पर चलकर हृदय का कार्य देखना) जैसे परीक्षण किए तथा हृदयरोग विशेषज्ञों का मार्गदर्शन मिला । यह सब केवल १ सहस्र ६५० रुपए में हुआ । उसके उपरांत डॉक्टर ने ‘एंजियोग्राफी’ (हृदय की नसों में स्थित अवरोध ढूंढ निकालने हेतु किया जानेवाला परीक्षण) करने के लिए कहा । यह परीक्षण करते समय ‘हृदय की एक नस में ९० प्रतिशत ब्लॉकेज (अवरोध) है तथा उसके लिए तुरंत ही ‘एंजिओप्लास्टी’ (हृदय की ओर रक्त प्रवाहित करनेवाले नसों में उत्पन्न अवरोध दूर करने हेतु की जानेवाली शल्यचिकित्सा) करने की आवश्यकता है’, ऐसा बताया । उसके कारण हमने तुरंत निर्णय लेकर पत्नी के हृदय की ‘एंजिओप्लास्टी’ की । उसमें २ लाख १५ सहस्र रुपए खर्च हुए । इससे संदेह होता है कि ‘रोगियों को अल्प मूल्य में परीक्षण करने का लालच देकर उनमें से कुछ रोगियों की शल्य चिकित्सा कर उससे बडे स्तर पर पैसे कमाना’, यह इस चिकित्सालय का गोरखधंधा है ।’

२. रोगी का चिकित्सालय की सुख-सुविधाएं एवं मार्गदर्शन, तथाकथित निर्मित आपातकालीन स्थिति, साथ ही बीमा प्रतिष्ठानों द्वारा चिकित्सकीय उपचारों के खर्च का भुगतान करना इत्यादि लालच के अधीन हो जाना
अल्प खर्च में इतने परीक्षण किए जाते हैं; इसलिए मैंने भी परीक्षण कर लिए । उसमें रक्त एवं ‘२ डी-इको’ के परीक्षण सामान्य आए । मैं ‘स्ट्रेस टेस्ट’ करते समय ६ मिनट व्यवस्थित पैदल चला । मुझे सवेरे तथा सायंकाल प्रतिदिन ४० मिनट तक अर्थात लगभग ढाई कि.मी. पैदल चलने का अभ्यास है । उसके उपरांत मुझे हृदयरोग विशेषज्ञों का मार्गदर्शन मिला । उन्होंने मुझे कहा, ‘‘आपकी आयु की अपेक्षा भले ही आपके परीक्षण अच्छे रहे हों, तब भी ‘स्ट्रेस टेस्ट’ में पैदल चलते समय कुछ अवधि के उपरांत आपके हृदय को रक्त की आपूर्ति अल्प पड रही है; इसलिए आपके लिए एंजिओग्राफी कराना उचित रहेगा ! एजिओग्राफी होने तक आप सवेरे एवं सायंकाल में पैदल चलने का अभ्यास बंद कीजिए, साथ ही अकेले बाहर कहीं न जाईए तथा रक्त को पतला करने की औषधियां तथा विटामिंस लीजिए ।’’ इस कारण मुझे लगा कि अब मुझे भी एंजिओप्लास्टी करनी पडेगी ।
चिकित्सालय का वातावरण, वहां की सुख-सुविधाएं, वहां के मार्केटिंग करनेवाले विशेषज्ञ इत्यादि के कारण स्वाभाविक ही रोगी अभिभूत हो जाता है । उस समय चिकित्सालय द्वारा भयग्रस्त रोगी तथा भावनाशील संबंधियों को ‘स्वयं के प्राणों की अपेक्षा अन्य बातों का कोई मूल्य नहीं है’, इसका भान कराया जाता है । उसके कारण चिकित्सालय उसकी इच्छा के अनुसार कृति करता रहता है । उसमें भी बीमा प्रतिष्ठान तथा अन्य कुछ प्रतिष्ठानों को खुली छूट मिलती है तथा वे इन चिकित्सकीय उपचारों का खर्च उठाते हैं । इस प्रकार रोगी अनेक लालचों के अधीन हो जाता है ।
३. गुरुकृपा से नामजपादि उपाय करने के कारण मन सकारात्मक होकर गुरुकृपा से उपचारों का उचित दिशादर्शन होना
चिकित्सालय जाने पर ‘मैं अपने स्वास्थ्य के विषय में मानसिक स्तर पर अधिक विचार कर रहा हूं’, यह बात मेरे ध्यान में आई । उस समय मैं नित्य के नामजपादि आध्यात्मिक उपचार कर रहा था । गुरुकृपा से मुझे सद्गुरु डॉ. मुकुल गाडगीळजी ने मेरे हृदय की नसों में उत्पन्न अवरोध दूर हों, इसके लिए नामजपादि उपचार दिए । मैंने २ दिन नामजपादि उपचार किए, जिससे मुझपर छाया अनिष्ट शक्तियों का कष्टदायक आवरण दूर होकर मेरा मन सकारात्मक हुआ । इसके लिए मैंने हृदय की बीमारी के संबंध में अन्य डॉक्टरों तथा आयुर्वेद वैद्यों से मार्गदर्शन लिया । तब चिकित्सालय द्वारा दिए लालच के झांसे में न आकर गुरुकृपा से मुझे उपचारों के संबंध में उचित दिशादर्शन मिला ।
४. आयुर्वेद की उपचार-पद्धति के प्रति श्रद्धा से उपचार लेने के कारण शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से सक्षम होना संभव हुआ
विगत २५ वर्षों से मैं एक विख्यात आयुर्वेद चिकित्सालय में हृदय की बीमारी पर उपचार ले रहा हूं । वहां वैदिक संस्कृति के अनुसार शल्य चिकित्सा रहित आयुर्वेद के उपचार किए जाते हैं । मैं वहां स्थित वैद्य के पास गया । उन्होंने मेरा नाडी परीक्षण किया । विशेष बात यह है कि ‘मैंने जो परीक्षण किए थे, उनके निष्कर्ष तथा वैद्य का परीक्षण एक ही है’, यह मेरे ध्यान में आया । उसके उपरांत मैंने वैद्य को मेरे द्वारा मुंबई के चिकित्सालय में किया गया रक्त का परीक्षण, ‘२ डी-इको’, ‘स्ट्रेस टेस्ट’, ‘एंजिओग्राफी’ इत्यादि ब्योरे दिखाए । वैद्या ने मुझे कहा, ‘‘७० वर्ष आयु के आगे ‘स्ट्रेस टेस्ट’ करने की आवश्यकता नहीं थी, साथ ही अन्य निष्कर्ष भी सामान्य हैं । हम आपको औषधियां देंगे । आप पैदल चलने का व्यायाम, पथ्य तथा आयुर्वेदीय औषधियां जारी रखिए । ६ महिने के उपरांत हम पुनः आपकी जांच करेंगे । आपका स्वास्थ्य बहुत अच्छा है ।’’ उस आयुर्वेद चिकित्सालय ने मुझसे जांच शुल्क केवल १०० रुपए लिए तथा उन्होंने मेरे स्वास्थ्य की जो वास्तविकता है, वह बताई । उसके कारण मैं पुनः शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से सक्षम हुआ ।
५. वैदिक संस्कृति के अनुसार उपचार करना, धर्माचरण, साधना एवं गुरुकृपा ही स्वस्थ जीवन का रहस्य !
‘वर्तमान के तथाकथित आधुनिक चिकित्सालयों में रोगियों की लूट चल रही है’, ऐसा मुझे लगता है । पैकेज, प्रमोशनल स्कीम, बीमा, अल्प शुल्क में परीक्षण, कुछ सरकारी योजनाएं इत्यादि का लालच देकर असहाय रोगियों के साथ धोखाधडी की संभावना बढी है । स्वस्थ जीवन जीने के लिए आयुर्वेद तथा अन्य प्राकृतिक पद्धति से उपचार लेना उचित है । ‘अधर्म एवं मूलं सर्व रोगानाम् । (अधर्म ही रोग का मूल कारण हैे)’, ऐसा शास्त्र बताता है । इसलिए धर्माचरण करना तथा साधना कर आनंदमय जीवन जीना ही स्वस्थ जीवन का सर्वोत्तम उपाय है । धन्वंतरि देवता तथा परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने मुझे आयु के ७८वें वर्ष में भी साधना एवं सेवा करने के लिए सक्षम बनाए रखा है । उसके लिए मैं धन्वंतरि देवता एवं परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करता हूं ।’ (५.५.२०२५)
– (पू.) शिवाजी वटकर, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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