
१. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अपमानजनक लेखन प्रसारित करने के प्रकरण में अपराध पंजीकृत किया गया
‘पाकिस्तानी आतंकियों ने २२.४.२०२५ को कश्मीर के पहलगाम में हिन्दू पर्यटकों पर आतंकी आक्रमण किया, जिसमें २६ हिन्दू पर्यटकों की मृत्यु हुई । भारत ने इसका मुंहतोड उत्तर दिया । भारत ने पहले ‘सिंधु जल समझौते’ पर रोक लगाई तथा उसके उपरांत ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाकर सैकडों आतंकियों को मौत के घाट उतारा, साथ ही पाकिस्तान के ९ हवाई सैनिकी अड्डे भी ध्वस्त किए । उसके कारण पाकिस्तान अमेरिका एवं भारत की शरण में आया, अन्यथा भयंकर विनाश होने पर पाकिस्तान विश्व के मानचित्र से मिट जाता । भारत ने कुछ ही दिन के अंदर पाकिस्तान पर इजरायल की भांति तथा कदाचित उससे भी बडी कार्रवाई की ।
इतना सब करने पर भी भारत में रहनेवाले कुछ देशविरोधी लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्र सरकार के विरुद्ध विषवमन करना जारी रखा । अनेक बुद्धिजीवी प्राध्यापक, कलाकार, छात्र आदि विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत लोगों ने सामाजिक माध्यमों पर अत्यंत निचले स्तर पर जाकर प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना की । उसमें से एक व्यक्ति ने तो ‘नाऊ नरेंद्र कम सरेंडर’, ऐसी ‘पोस्ट’ (लेखन) की । इस प्रकरण में यह पोस्ट करनेवाले व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण पंजीकृत किया गया । इसमें ‘बी.एन.एस.’ (भारतीय नागरिक कानून) के अंतर्गत सामाजिक एवं राष्ट्रीय शांति भंग करने के उद्देश्य से अपमानजनक बोलना, राष्ट्रीय एकता एवं संप्रभुता के लिए संकट उत्पन्न करना, सार्वजनिक अशांति का कारण बनना जैसी धाराएं लगाई गई हैं ।

हिन्दू छात्रों को नमाज पढने के लिए बाध्य करनेवाले प्राध्यापक के विरुद्ध आपराधिक अभियोग निरस्त करना छत्तीसगढ उच्च न्यायालय ने किया अस्वीकार !
१. १५० छात्रों द्वारा नमाज पढाए जाने के प्रकरण में प्राध्यापकों के विरुद्ध अपराध पंजीकृत‘२६.३.२०२५ से १.४.२०२५ की अवधि में ‘नैशनल सर्विस स्कीम कैंप’ ने छत्तीसगढ में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था । उसमें प्राध्यापकों ने १५० हिन्दू छात्रों को नमाज पढने के लिए बाध्य किया । इन छात्रों में केवल ३ मुसलमान छात्रों का समावेश था । इस कृत्य के विरोध में ३-४ हिन्दू छात्रों ने शिकायत कर प्रशासन को इन प्राध्यापकों के विरुद्ध अपराध पंजीकृत करने के लिए बाध्य किया । इस प्रकरण में संलिप्त प्राध्यापकों एवं प्राध्यापिकाओं के विरुद्ध राष्ट्रविघातक दुष्कृत्य कर देश की एकता एवं अखंडता के लिए संकट उत्पन्न करना, धार्मिक भावनाएं आहत कर अशांति फैलाना, साथ ही ‘छत्तीसगढ फ्रीडम ऑफ रिलीजन १९६८’ के अनुच्छेद ४ का उल्लंघन करने के प्रकरण में अपराध पंजीकृत किया गया । २. प्राध्यापकों के विरुद्ध पंजीकृत अपराध निरस्त करना छत्तीगसढ उच्च न्यायालय ने किया अस्वीकारयह आपराधिक प्रकरण निरस्त करने की मांग करते हुए आरोपी प्राध्यापकों ने छत्तीसगढ उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की । इस याचिका में उन्होंने कहा, ‘‘हमारे विरुद्ध राजनीतिक उद्देश्य से अपराध पंजीकृत किया गया है । इसमें १५० छात्रों ने नमाज पढी; परंतु उनमें से केवल ३ – ४ छात्रों ने ही शिकायत की है; इसलिए कुछ विशिष्ट उद्देश्य से पंजीकृत किया गया यह अपराध निरस्त किया जाए ।’ इस प्रकरण में छत्तीसगढ उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर विरुद्ध महाराष्ट्र्र शासन’, इस निर्णय का आधार लिया तथा अपराध निरस्त करना अस्वीकार किया । उच्च न्यायालय के अनुसार ‘अब इस प्रकरण में आरोपपत्र प्रविष्ट करना शेष है; इसलिए पुलिस को अन्वेषण (जांच) करने देना चाहिए । अन्वेषण में पुलिस को यदि ऐसा लगा कि इसमें आरोपपत्र प्रविष्ट करना आवश्यक नहीं है, तो यह आपराधिक प्रकरण अपनेआप निरस्त हो जाएगा । सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि उच्च न्यायालयों द्वारा पंजीकृत किया गया प्रत्येक अपराध निरस्त ही हो’, ऐसी भूमिका लेना अनुचित है । उससे पूर्व प्रस्तुत किए जानेवाले संभावित प्रमाण तथा पुलिस के अन्वेषण के उपरांत सामने आनेवाले प्रमाण, इन सभी बातों के लिए अन्वेषण विभागों को समय दिया जाना आवश्यक है ।’ श्रीकृष्णार्पणमस्तु । – (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी, मुंबई उच्च न्यायालय (९.६.२०२५) |
२. आपराधिक प्रकरण निरस्त करने की मांग उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय ने निरस्त की

यह आपराधिक प्रकरण निरस्त करने की मांग को लेकर आरोपी ने उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की । आरोपी ने अपने समर्थन में उच्च न्यायालय में ‘यह लेखन भावना के आवेश में आकर प्रसारित किया गया है तथा इसमें कोई अनुचित उद्देश्य नहीं था’ इत्यादि कारण दिए । इस पर उच्च न्यायालय ने सुस्पष्ट भूमिका लेते हुए कहा कि सामाजिक माध्यमों पर संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी करना अथवा कटाक्ष करना, इसकी अनुमति नहीं है । प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध प्रयोग की गई भाषा अत्यंत अश्लील एवं अपमानजनक थी । अतः इसके विरुद्ध अपराध पंजीकृत किया जाना उचित है । उच्च न्यायालय ने कहा, ‘भावनाएं चाहे कितनी भी तीव्र हों, उन्हें विचारपूर्वक ही व्यक्त किया जाना चाहिए । संवैधानिक पद पर कार्यरत व्यक्ति के विरुद्ध अपमानजनक बोलने की अनुमति नहीं है । इसलिए आरोपी को अब आपराधिक अभियोग का सामना करना पडेगा ।’ इससे पूर्व भी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्तियों के विरुद्ध अपमानजनक आलोचना की गई थी, उस समय उनके विरोध में कठोर भूमिका नहीं ली गई । ऐसे आरोपियों को न्यायतंत्र से ऐसी फटकार नहीं मिली, तो ये लोग उन्मत्त हो जाते हैं तथा आलोचना करते समय उन्हें किसी बात का भान नहीं रहता । अतः इसे एक बहुत अच्छा निर्णय मानना पडेगा ।’
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।
– (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी, मुंबई उच्च न्यायालय (९.६.२०२५)

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