दोषी अधिकारियों से राशि की मांग की जाए । – सुराज्य अभियान

पाठ्यपुस्तकों में कॉपियों के पृष्ठ जोडने की प्रक्रिया में १३५ करोड रुपये व्यर्थ गए का प्रकरण

मुंबई – विद्यार्थियों के बस्ते का बोझ कम हो, इस उद्देश्य से महाराष्ट्र शासन के शालेय शिक्षण विभाग ने वर्ष २०२३–२४ से कक्षा दूसरी से आठवीं तक की पाठ्यपुस्तकों में कॉपियों के पृष्ठ जोडने का निर्णय तो लिया, परंतु वास्तव में यह निर्णय असफल रहा और सरकार की संपत्ति पर १३५.६३ करोड रुपये का अतिरिक्त भार पडा, साथ ही केवल दो वर्षों में ही यह निर्णय बदलने का भार शिक्षण विभाग पर आ गया । हिन्दू जनजागृति समिति के समाजकल्याणकारी उपक्रम ‘सुराज्य अभियान’ की ओर से इस संबंध में मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री तथा शालेय शिक्षण विभाग के सचिव को निवेदन देकर इस गलत निर्णय के लिए उत्तरदायी अधिकारियों से धनराशि प्राप्त की जाए, ऐसी मांग ‘सुराज्य अभियान’ के महाराष्ट्र राज्य समन्वयक श्री. अभिषेक मुरुकटे ने निवेदन के माध्यम से की है ।

इस निवेदन में उन्होंने कहा है कि –

१. शालेय शिक्षण विभाग ने ८ मार्च २०२३ को जो शासन निर्णय निकाला, उसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के पास लेखन सामग्री उपलब्ध न होने के कारण पाठ्यपुस्तकों में कुछ पृष्ठ लेखन हेतु जोड़े गए; परंतु वास्तव में ये पृष्ठ अपर्याप्त सिद्ध हुए और विद्यार्थियों को सामान्य रूप से कॉपियाँ लानी ही पड़ीं । परिणामस्वरूप बस्ते का वजन कम होने के स्थान पर बढ गया, तथा कॉपियों के पृष्ठ जोडने के कारण पाठ्यपुस्तकों की मोटाई और मूल्य भी बढ़ गया ।

२. इस कारण इस योजना से न तो कोई शैक्षणिक लाभ मिला, और न ही उद्देश्य की पूर्ति हुई; फिर भी इस बढे हुए बजट की भरपाई राज्य शासन की निधि से की गई ।

शिक्षण विभाग की त्रुटि का परिणाम विद्यार्थियों को बालभारती के संचालक कृष्णकुमार पाटिल द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस निर्णय के कारण शैक्षणिक वर्ष २०२३–२४ में ७२ करोड रुपये और २०२४–२५ में ६३.६३ करोड रुपये, कुल मिलाकर १३५.६३ करोड रुपये का अतिरिक्त व्यय शासन को करना पडा । २८ जनवरी २०२५ को प्रसारित शासन निर्णय में इस योजना की समीक्षा करते हुए यह कहा गया कि “पाठ्यपुस्तकों में जोडे गए कोरे पृष्ठों का विद्यार्थियों द्वारा पढाए गए घटकों की नोटिंग हेतु अपेक्षित उपयोग नहीं हुआ”, ऐसा स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हुए शालेय शिक्षण विभाग ने अपनी त्रुटि का दोष विद्यार्थियों के सिर मढने का प्रयास किया है । यह निर्णय यदि प्रायोगिक स्वरूप में कुछ शालाओं में लागू करके उसकी समीक्षा की जाती, तो शासन को करोडो रुपये की हानि से बचाया जा सकता था । शिक्षा क्षेत्र में निर्णय अध्ययनपूर्वक तथा प्रायोगिक परीक्षण के आधार पर लेना आवश्यक है, यह इस घटना से सिद्ध होता है, ऐसा श्री. मुरुकटे ने कहा । ‘शासन को चाहिए कि संबंधित अधिकारियों से यह १३५ करोड रुपये की अपव्यय की राशि का भुगतान लें । तथा भविष्य में ऐसे निर्णय लेते समय अधिक उत्तरदायित्वपूर्ण और पारदर्शी विचार हो’, ऐसी मांग ‘सुराज्य अभियान’ ने शासन से की है ।