बस्तर तो नक्सलमुक्त हुआ, आगे क्या ?

वर्ष २०२६ तक भारत से नक्सलवाद का निर्मूलन करने के लिए केंद्र सरकार प्रभावी रणनीति अपना रही है । उस पृष्ठभूमि पर कुछ ही दिन पूर्व केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ राज्य के ‘नक्सलग्रस्त’ के रूप में जाने जानेवाले बस्तर जिले को नक्सलमुक्त घोषित किया है । विगत ६ दशकों से नक्सलवाद के विरोध में लडाई चल रही है । बस्तर के माध्यम से नक्सलवाद खोखला बन गया है, जो केंद्र सरकार की बडी सफलता ही है । इससे ‘अब कहीं जाकर नक्सलमुक्त भारत’ निकट आ रहा है’, ऐसा कहा जा सकता है । बस्तर का नक्सलवाद समाप्त करना भी कोई सामान्य बात नहीं थी । उसके लिए बहुत परिश्रम उठाने पडे । वर्ष २०१० में बस्तर में हुई एक घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था । वहां नक्सलियों ने ७६ भारतीय सैनिकों को जिंदा जलाकर उनकी क्रूरतापूर्ण हत्या कर दी थी । नक्सलियों की खोज कर कुछ समय तक एक इमारत में विश्राम कर रहे सैनिकों पर नक्सलियों ने सीधे जलती मशालें फेंकी थी । अपने प्राण बचाने वहां से बाहर निकले सैनिकों पर गोलियां चलाई गईं । जिन सैनिकों को गोलियां नहीं लगी थीं, उन्हें धनुष्यबाण से मार दिया गया । इस प्रकार से सैनिकों का यह जो अमानवीय हत्याकांड हुआ, वह इसी बस्तर में ! नक्सलियों ने सैनिकों के शवों की दुर्गति की थी । लगभग १५ वर्ष पूर्व घटित इस घटना को अब न्याय मिला है । नक्सलवाद के रक्तरंजित संघर्ष के संबंध में बस्तर का नक्सलवाद मुक्त होना, उस घटना पर लगाई गई छोटी सी फूंक ही है ।

बस्तर एक अत्यंत दुर्गम एवं पर्वतीय क्षेत्र होने से नक्सली इस स्थिति का अनुचित लाभ उठाते थे । स्वयं करवसूली करने अथवा फिरौती लेने के माध्यम से आदिवासियों के साथ अन्याय कर वे समानांतर सरकार चलाते थे । सैनिकों एवं पुलिसकर्मियों को मार डालना, बारूद लगाकर विस्फोट कराना जैसी उनकी दहशत का सामना करने के बिना आदिवासियों के सामने अन्य कोई विकल्प नहीं था । उसके कारण इस क्षेत्र को नक्सलवाद मुक्त बनाने का विचार करना भी कठिन था; परंतु अब विगत १५ वर्ष की तुलना में भारतीय सैनिक और अधिक कार्यक्षम, आधुनिक प्रौद्योगिकी से संपन्न एवं सुरक्षित बन गए हैं । इसके कारण अब नक्सलवाद को समाप्त करना पहले की तुलना में सरल है । नक्सलवाद समाप्त करने के लिए सरकार से बडा समर्थन मिला है । सरकार की ओर से विभिन्न प्रकार के अभियान, साथ ही ‘ऑपरेशन्स’ चलाए जा रहे हैं । बार-बार होनेवाली हिंसा, शोषण तथा अन्याय से तंग आकर; साथ ही जंगल की प्रतिकूल स्थिति का सामना करना असंभव हो जाने से कुछ नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया है तथा कुछ नक्सली अभी भी आत्मसमर्पण कर रहे हैं, जो नक्सलवाद विरोधी अभियान का एक आश्वासक कदम ही है ! ऐसा कर रहे नक्सलियों को आर्थिक सहायता दी जा रही है । आत्मसमर्पित विवाहेच्छुक नक्सलियों को विवाह के लिए अनुदान दिया जा रहा है । ऐसे माध्यमों से भी नक्सलवादमुक्ति का उद्देश्य साध्य हो रहा है । इससे पूर्व केवल पुलिस प्रशासन तथा सैनिक ही नक्सलवाद हटाने के लिए काम कर रहे थे; परंतु अब उसमें अनेक घटकों से योगदान मिल रहा है तथा इससे लोकतंत्र सशक्त बन रहा है ।

कार्यकुशल अधिकारियों की आवश्यकता ! 

बस्तर के नक्सलवाद मुक्त होने में वहां के पुलिस महानिदेशक पी. सुंदरराज का भी बहुमूल्य योगदान है; क्योंकि उन्होंने वहां बहुत ही अच्छी सेवाएं दी हैं । उन्होंने नक्सलियों को यह चेतावनी देते हुए कहा, ‘नक्सली आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्य धारा में सम्मिलित हों । उन्होंने ऐसा नहीं किया तो नक्सली मुठभेड में मारे जाएंगे ।’ कुछ दिन पूर्व कट्टर नक्सली बसवराजू को मारा गया । उस पर १० करोड रुपए का पुरस्कार घोषित किया गया था । सुंदरराज ने नक्सलियों को चेतावनी दी कि ‘तुम सभी का बसवराजू से भी भीषण अंत होगा ।’ नक्सलवाद को संपूर्णतया नष्ट करने हेतु सुंदरराज जैसे अधिकारी वहां सदैव कटिबद्ध हैं । उनके नेतृत्व में अब तक १०० से अधिक नक्सली  मारे गया है । उन्होंने नक्सलवाद बढने के कारणों का विस्तृत अध्ययन किया, साथ ही उन्होंने समन्वय किस स्तर पर अल्प पड रहा है, यह भी ढूंढ निकाला । उन्होंने पुलिसकर्मियों को विशेष प्रशिक्षित करने पर बल दिया । उसके परिणामस्वरूप सुरक्षा बल नक्सलियों की किसी भी चतुराई के झांसे में नहीं आए । उनके नेतृत्व में पुलिसकर्मियों ने नक्सलियों से लडते समय अपने शौर्य का परिचय दिया । उसके कारण नक्सलियों की संख्या अल्प हुई, साथ ही उनकी आपूर्ति शृंखला भी दुर्बल हुई । चुनाव के समय में बस्तर में ६० सहस्र की बडी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया था । संक्षेप में कहा जाए, तो नक्सलियों की योजनाओं को तोड डालने के लिए सुंदरराज ने सैनिकों को पूर्णतः तैयार किया । नक्सलवाद मुक्ति का ध्येय पाने हेतु कठोर परिश्रम करना भी आवश्यक है । सुंदरराज जैसे कुशल नेतृत्व करने की क्षमता रखनेवाले, साथ ही नीतिजन्य अधिकारी यदि सर्वत्र होंगे, तो भारत से नक्सलवाद को जड से उखाड फेंकना असंभव नहीं है । अन्य राज्य की पुलिस को भी सुंदरराज का आदर्श सामने रखकर नक्सलवाद विरोधी अभियान का नेतृत्व करना चाहिए ।

शहरी नक्सलवाद कब समाप्त होगा ? 

एक जिला नक्सलमुक्त हुआ; इस पर देश को संतोष मानकर नहीं चलना चाहिए । देश से लोकतंत्र को मिटाने का सपना देखनेवाले नक्सलियों, साथ ही साम्यवादी विचारों की जडों को गहराई तक स्थापित करने का प्रयास करनेवालों का भी निर्मूलन होना आवश्यक है । धर्मनिरपेक्षता, साम्यवाद, नक्सलवाद, खालिस्तानवाद जैसे माध्यमों से साम्यवादी विचारधारा बार-बार अपना सिर उठाते रहती है । इस प्रकार से वैचारिक स्तर पर भी इस विचारधारा का जवाब दिया जाना चाहिए । नक्सलवाद की बुर्के की आड में उनके समर्थकों के क्रियाशील होने की संभावना का अस्वीकार नहीं किया जा सकता । जंगली नक्सलवाद की अपेक्षा शहरी नक्सलवाद अधिक संकटकारी है । उनके ऊपर से दिखाई देनेवाले भोले-भाले कार्य के पीछे छिपा नक्सलियों का क्रूर चेहरा समाज को दिखाई नहीं देता । उसके कारण ही वे समाज को जाति, प्रांत आदि के नाम पर तोडने में सफल होते हैं । महाराष्ट्र की अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति, कबीर कला मंच, देशभक्ति युवा मंच, रिपब्लिकन पैंथर, मूलभूत अधिकार संघर्ष समिति जैसे संगठन भी नक्सलवाद समर्थक संगठन हैं । ‘फेक नैरिटिव’ एवं ‘डीपस्टेट’ के माध्यम से भी इसे बल दिया जाता है । नक्सलवाद अथवा खालिस्तानवाद भले ही नष्ट हो रहा हो; परंतु इन विचारधाराओं से जुडे लोग विदेश में डेरा डाले बैठे हैं । वहां से वे भारत में अपनी नकेल कस रहे हैं । वे भारत में अस्थिरता उत्पन्न कर रहे हैं, समाज को तोड रहे हैं तथा राष्ट्रीयता को दुर्बल बना रहे हैं । ऐसे लोगों पर कैसे नियंत्रण पाया जा सकेगा ?, यह समस्या ही है । जब तक राष्ट्रविरोधी उद्देश्यों को सफल बनानेवाले शहरी नक्सलियों को नियंत्रित नहीं किया जाता, तब तक नक्सलवाद का पूर्णतः निर्मूलन होना असंभव है । केंद्र सरकार इस पर गंभीरता से विचार कर क्रियाशील कदम उठाए, यही देशवासियों की अपेक्षा है !

संपादकीय भूमिका

जब तक जंगली नक्सलवाद से अधिक संकटकारी शहरी नक्सलवाद का नियंत्रण नहीं होता, तब तक नक्सलवाद का पूर्णतः निर्मूलन होना असंभव  !