
पुणे – प्रसिद्ध खगोलशास्त्रज्ञ जयंत नारळीकर जी का आज प्रातःकाल पुणे स्थित उनके निवासस्थान पर नींद में शांतिपूर्वक निधन हो गया । वे ८६ वर्ष के थे । खगोलशास्त्र के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिन्होंने अपनी विद्वत्ता सिद्ध की थी, वे उतनी ही रसपूर्ण हिन्दी में विज्ञानकथाएं लिखनेवाले भी थे । केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे भारत लौटे । पहले उन्होंने टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान में कार्य किया । तत्पश्चात ‘आयुका संस्था’ की स्थापना में उनका विशेष ( सिंह का ) योगदान रहा । वर्ष २०२१ में नाशिक में आयोजित अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के वे अध्यक्ष रहे ।
डॉ. नारळीकरजी का परिचय
जयंत नारळीकर जी का जन्म कोल्हापुर में हुआ था । उनके पिता रैंगलर विष्णु वासुदेव नारळीकर प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं वाराणसी स्थित बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के गणित विभाग के प्रमुख थे, माता सुमति विष्णु नारळीकर संस्कृत विदुषी थीं । शालेय शिक्षा वाराणसी में पूर्ण करने के बाद उन्होंने विज्ञान शाखा से स्नातक उपाधि प्राप्त की । उच्च शिक्षा हेतु इंग्लैण्ड के केम्ब्रिज विश्वविद्यालय जाकर उन्होंने बी.ए., एम.ए. एवं पीएच.डी. की उपाधियां प्राप्त कीं । इसके अतिरिक्त ‘रैंगलर’ की उपाधि, खगोलशास्त्र का ‘टायसन मेडल’, ‘स्मिथ पुरस्कार’ तथा अन्य अनेक सम्मान उन्होंने प्राप्त किए ।
आधुनिक खगोलशास्त्र के प्रवर्तक ।
विश्व के अगण्य अध्येता खगोलशास्त्रज्ञों में गिने जानेवाले फ्रेड हॉईल, जयंत नारळीकर के गुरु थे । आज भारत में खगोलशास्त्र में जो अनुसंधान और प्रगति देखने को मिलती है, उसकी नींव नारळीकर ने रखी । वे आधुनिक खगोलशास्त्र के प्रवर्तक थे । उनके निधन से एक युग का अंत हो गया है, ऐसा वक्तव्य खगोलशास्त्र के अध्येता मयुरेश प्रभुणे ने व्यक्त किया ।
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