
बंगाल विगत अनेक दशकों से अशांत एवं हिंसाग्रस्त रहा है । पहले नक्सलियों का हिंसक आंदोलन, उसके पश्चात मार्क्सवादी कम्युनिस्ट दल के सत्ताकाल में साम्यवादियों की हिंसा तथा पिछले कुछ वर्षाें से तृणमूल कांग्रेस के राज में हिन्दुओं पर हो रहे धर्मांधों के आक्रमरण के कारण यह अशांत बना हुआ है । किन्तु परिदृश्य यह है कि वह इसपर प्रधानता से कोई भी ठोस उपाय करते हुए दिखाई नहीं दे रहा अथवा किसी की वह इच्छाशक्ति ही नहीं है । राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को मुसलमानों का तुष्टीकरण कर पुनः सत्ता में आना है, जबकि भाजपा को तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटाकर स्वयं सत्ता में आना है । वहां के हिन्दुओं से प्रश्न है कि उन्हें क्या चाहिए ? उन्हें उनकी रक्षा चाहिए या हिन्दू भाईयों पर होनेवाले अत्याचार चाहिए ? उन्हें देश की सुरक्षा चाहिए या बंगाल को दूसरा बांग्लादेश चाहिए ?, यह उन्हीं को सुनिश्चित करना है । पूरे बंगाल राज्य में ३० प्रतिशत मुसलमान हैं । वहां के कुछ जिलों में तो हिन्दू अल्पसंख्यक, जबकि मुसलमान बहुसंख्यक हैं । बांग्लादेश की सीमा के पास के जिलों में ऐसी ही स्थिति है । ये जिले बांग्लादेशमय हो गए हैं, ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा । अनेक दंगे कर हिन्दुओं पर आक्रमण किए जा रहे हैं । वर्तमान समय में वक्फ संशोधन के कारण हो रहे दंगे सीमावर्ती मुसलमान बहुल मुर्शिदाबाद जिले में ही हुए हैं । अब तो दक्षिण २४ परगणा जिले में भी हिंसा हुई है । कदाचित इसका फैलाव अन्य जिलों में भी हो सकता है; क्योंकि इस हिंसा के पीछे बांग्लादेशी आतंकवादी संगठनों का हाथ है, ऐसी गुप्तचर विभाग की जानकारी है ।

हिन्दुओं के असंगठित होने के परिणाम !
बंगाल की कानून-व्यवस्था की स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए ठोस उपाय करने आवश्यक हैं, जो तृणमूल कांग्रेस कभी नहीं करेगी; क्योंकि इस हिंसा के पीछे इस दल के कार्यकर्ता तथा बडी संख्या में धर्मांध मुसलमान हैं । सरकार द्वारा उन्हें संरक्षण दिए जाने से यह स्थिति निर्माण हुई है । कहा जाता है कि यदि बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाया गया, तो कुछ स्तर तक इस पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है; परंतु इसमें समस्या यह है कि यदि राष्ट्रपति शासन लगाया गया तथा उसके उपरांत चुनाव हुए, तो जनता की सहानुभूति तृणमूल कांग्रेस को मिल सकती है । उसी प्रकार से राष्ट्रपति शासन लगाने पर बडी हिंसा हो सकती है । केंद्र की सरकार को इसका भय है, इसलिए वह बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने का साहस नहीं दिखाती, ऐसा राजनीतिक क्षेत्र में कहा जाता है । यदि ऐसा है, तो बंगाल के विरोधी दल भाजपा के कार्यकर्ताओं की तथा हिन्दुओं की रक्षा होना भी कठिन है । उनके समक्ष उनका सर्वस्व लुटा देने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है । कुछ ही दिन पूर्व मुर्शिदाबाद के हिन्दुओं ने पडोस के मालदा जिले में पलायन किया है । वहां की स्थिति ऐसी है कि भविष्य में हिन्दुओं को बंगाल से कश्मीर की भांति पलायन करना पडा, तो उसमें आश्चर्य नहीं होगा । देश के विभाजन के समय बंगाल के मुस्लिम लीग सरकार के मुख्यमंत्री सुऱ्हावर्दी के आदेश पर ही जिना के ‘डाइरेक्ट एक्शन’ के अंतर्गत लाखों हिन्दुओं को मार दिया गया तथा हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं हुईं । अब वही स्थिति तृणमूल कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में बंगाल में पुनः आएगी, यही परिदृश्य है । बंगाल में हिन्दुओं की रक्षा करने के लिए, उनका नेतृत्व करनेवाला एक भी प्रखर हिन्दू नेता नहीं है, इसलिए वहां के हिन्दू संगठित नहीं हैं । हिन्दू संगठित न होने से क्या होता है ?, इसे भारत के हिन्दुओं को बंगाल की स्थिति से सीखना चाहिए । इससे पूर्व कश्मीर के प्रकरण से हिन्दू यह बात नहीं सीखे, इसके कारण बंगाल जल रहा है । ‘हिन्दुओं के नरसंहार के लिए तथा उनके पलायन के लिए उन्हीं की भयग्रस्त मानसिकता कारण है’, ऐसा किसी ने कहा, तो उसमें अनुचित क्या है ? मुंबई आक्रमण के सूत्रधार तहव्वूर राणा ने कहा था, ‘हिन्दू मरने के ही पात्र हैं ।’ इसका अर्थ आतंकियों को भी हिन्दुओं की मानसिकता ज्ञात है । वर्तमान में तो बंगाल के हिन्दुओं का कोई रक्षक नहीं है । बांग्लादेश में जो हो रहा था, उस समय बंगाल के हिन्दू शांत थे, तो अब बंगाल में जो कुछ हो रहा है, उसे देखते हुए भी शेष भारत के हिन्दू शांत हैं । भविष्य में उन्हें भी यही भोगना पडेगा, यह उन्हें समझना होगा । जब तक हिन्दुओं के घर-घर में बंगाल एवं कश्मीर जैसी स्थिति निर्माण नहीं होती, तब तक हिन्दू जागृत नहीं होंगे, ऐसा ही लगने लगा है ।
‘इवीएम’ही स्थाई !

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाने से केवल पूरे विश्व में ही नहीं, अपितु अमेरिका में भी असमंजस की स्थिति थी । ४ वर्ष पूर्व ट्रम्प राष्ट्रपतिपद का चुनाव हार गए थे । उस समय बडी हिंसा हुई थी । उन्होंने मतगणना में घोटाले का आरोप लगाया था । इस प्रकरण में न्यायालय में अभियोग भी प्रविष्ट किया गया था । उस समय ट्रम्प ने ‘इसके आगे इवीएम’ अर्थात इलेक्ट्रॉनिक मतदान यंत्र के स्थान पर कागद की मतपत्रिकाओं से मतदान कराने की मांग की थी; परंतु इस चुनाव में वे इसी इलेक्ट्रॉनिक मतदान यंत्र द्वारा किए गए मतदान से ही चुने गए हैं । अब अमेरिका के राष्ट्रीय गुप्तचर विभाग की प्रमुख तुलसी गबार्ड ने ट्रम्प की उपस्थिति में कागद की मतदान पत्रिकाओं से मतदान कराने की मांग की है । इसके कारण अगले चुनाव में यदि ऐसा निर्णय हुआ, तो उससे आश्चर्य नहीं होगा । गबार्ड द्वारा अमेरिका में यह मांग करने के पश्चात भारत में कांग्रेस के नेता ने पुनः यही मांग की है । उसके द्वारा इस संबंध में चुनाव आयोग से पूछे जाने पर चुनाव आयोग ने तकनीकी दृष्टि से अमेरिका एवं भारत में होनेवाले चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक मतदान यंत्र से होनेवाले मतदान का अंतर स्पष्ट कर भारत में होनेवाला मतदान अमेरिका की अपेक्षा अधिक सुरक्षित है, यह दिखा दिया । इससे पहले भी इस संदर्भ में सर्वाेच्च न्यायालय में अनेक याचिकाएं प्रविष्ट की गई थीं । उसके अनुसार चुनाव आयोग कार्रवाई कर रहा है । उसपर न्यायालय ने वीवीपैट की पडताल का आदेश दिया था । उसके अनुसार चुनाव आयोग कार्रवाई कर रहा है; परंतु इसमें कहीं तकनीकी समस्या आने के अतिरिक्त अन्य कोई त्रुटि है अथवा इसमें घोटाला किया जा रहा है, ऐसी घटना कभी भी सामने नहीं आई । आरोप लगानेवाले उसके विरोध में प्रमाण नहीं दे सकते । इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मतदान यंत्र पर जताई जा रही आपत्तियां उचित हैं, ऐसा अभी तक तो स्पष्ट नहीं हुआ है, इसे ध्यान में लेना होगा । इस संदर्भ में अमेरिका में आगे क्या निर्णय लिया जाएगा, यह आनेवाला समय ही बताएगा; परंतु भारत में तो इलेक्ट्रॉनिक मतदान यंत्र के द्वारा ही मतदान होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है; क्योंकि जिन विरोधी दलों से ऐसी मांग की जाती है, वे ही समय-समय पर इसी यंत्र द्वारा कराए गए मतदान से ही सत्ता में बैठे हैं । उस समय उन्होंने इस पर आपत्ति नहीं जताई; परंतु चुनाव हारने पर ही वे इवीएम यंत्र पर आपत्ति जताते हैं, अतः इवीएम यंत्र ही बना रहेगा !
संपादकीय भूमिकाबंगाल के हिन्दुओं का कोई रक्षक न होने से वह दूसरा कश्मीर बनेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है । यह स्थिति हिन्दुओं के लिए लज्जाजनक है ! |
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