‘आधुनिक जीवनशैली के कारण निर्माण होनेवाली शारीरिक समस्याओं पर ‘व्यायाम’ एक प्रभावी उपचार है । प्राचीन ग्रंथों के व्यायाम के तत्त्वज्ञान आज भी उतने ही उपयुक्त हैं तथा हम उनसे प्रेरणा ले सकते हैं । इस लेखमाला के माध्यम से हम ‘व्यायाम का महत्त्व, व्यायाम के संदर्भ में शंका-समाधान, ‘एर्गोनॉमिक्स’ का (ergonomics) तत्त्व एवं रोग के अनुसार उचित व्यायाम’ की जानकारी प्रस्तुत करने जा रहे हैं । पाठक एवं जिज्ञासुओं को व्यायाम के माध्यम से स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की यह यात्रा प्रेरणादायी प्रमाणित होगी । इस लेख में हम ‘५० वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति द्वारा नियमित व्यायाम करने से, उन्हें भी उत्साह एवं उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त हो सकता है’, इस विषय में जानकारी प्राप्त करेंगे ।

१. शारीरिक कष्टों के कारण वृद्धावस्था से भय लगना
‘सभी को वृद्धावस्था से भय लगता है; क्योंकि ‘वृद्धावस्था के कारण जीवन का अंत समीप आने’ का भान होता है । वृद्धावस्था के लोगों को किसी भी बात की निश्चिति नहीं लगती । उनके पैर, पीठ, दांत, पेट अथवा हृदय में पीडा होती रहती है, जिनके कारण मन में भी पीडा होती है । इन सभी में अधिक जोड के रूप में शरीर को पडी हुई झुर्रियां, ढीली पडी चमडी, निर्बल स्नायु, मुडे हुए घुटने, धुंधली दृष्टि, अजीब मुद्रा, अरुचि, साथ में शरीर के अनेक अवयवों की असहनीय पीडा, बहरापन, थकान इत्यादि व्याधियों से पीडा होती है । वृद्धावस्था का यह चित्र अत्यंत जटिल है और यही सच्चाई है ।
२. वृद्ध व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य हेतु शरीर के स्नायु एवं अवयवों के मध्य गति उत्पन्न हो, इतना चलना-फिरना आवश्यक !
अधिकांश सभी वृद्धों को लगता है कि ‘निरामय जीवन जीना है एवं यथासंभव यौनावस्था का स्वास्थ्य प्राप्त हो’; परंतु उसके लिए कुछ तो करना पडेगा, इसकी ओर वे कोई ध्यान नहीं देते । केवल पेट भरकर स्वादिष्ट भोजन करने से हमें उत्साह प्राप्त नहीं होता, न ही अन्यों के उत्तम शरीर की ओर देखकर । जीवन का अर्थ है, चलना-फिरना । हमारी व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार शरीर के स्नायु एवं अवयवों में गति उत्पन्न हो, उतना चलना-फिरना आवश्यक है तथा वैसा करने पर ही हमें उत्साह का अनुभव होगा ।
३. वयस्क लोगों को आलस्य त्यागकर सक्रिय रहना चाहिए !
सामान्यतः ‘वयस्क लोग अधिकांशतः आलस्य-आश्रित होकर शारीरिक श्रम टालते हैं’, ऐसा अनुभव है; परंतु ऐसे लोगों को आलस्य त्यागकर कुछ चलने-फिरने का निश्चय करना चाहिए । जो लोग अधिकांश समय आलस्य में व्यतीत करते हैं, वे परिश्रम नहीं कर सकते । जिन्होंने सादा व्यायाम किया है, उनके लिए वृद्धावस्था में अधिक तनावपूर्ण व्यायाम करना कठिन होता है । तथापि ‘मनुष्य जब मध्यम आयु का होता है (४५ से ६४ वर्ष तक), तब उसे ‘मुझे क्या करना चाहिए ?’, इसका भान होता है; परंतु उसके अनुसार वह आचरण नहीं कर पाता। उसे किसी के द्वारा जागरूक करने की आवश्यकता होती है । उसे शारीरिक दुर्बलता के मोह से बाहर निकालना आवश्यक है; क्योंकि वह जितना अकार्यक्षम रहेगा, उसके आलस्य में उतनी ही वृद्धि होगी ।
४. वृद्ध लोगों को स्वस्थ, उत्साहित, शक्तिशाली एवं दीर्घजीवी होने का निश्चय करना चाहिए !
जिन व्यक्तियों का उत्साह बहुत अल्प हो गया है, उन्हें वृद्धावस्था का बहुत अधिक भय लगता है । जिनके स्नायु काम नहीं करते, उन्हें सदैव इसका भय सताता रहता है कि ‘मेरा हृदय कब बंद हो जाएगा ?’, इसलिए भय को त्यागकर, ‘हमें स्वस्थ, उत्साही, शक्तिशाली एवं दीर्घजीवी बनने’ का निश्चय करना होगा । वर्तमान में ‘मनुष्य की आयु सीमा बढ गई है ।’ जब तक हम स्वयं ही प्रयास कर वास्तविक कार्यक्षमता नहीं प्राप्त कर लेते, तब तक हमें मिला दीर्घायु जीवन, अर्थात वृद्धावस्था अधिक दु:खी ही करेगी !
५. उचित व्यायाम करने से वयस्क लोगों के लिए भी उत्साह, शक्ति, बलशाली स्नायु इत्यादि बातें शीघ्र तथा निश्चयपूर्वक प्राप्त कर पाना संभव !
आयु के पचास अथवा साठ वर्ष पूरे किए हुए लोगों को भी उत्साह, शक्ति, बलवान स्नायु इत्यादि बातें शीघ्र तथा निश्चयपूर्वक प्राप्त करना संभव है । यह बात अनुभव से सिद्ध हो चुकी है । ६० वर्ष से अधिक आयु के लोगों के व्यायाम करने पर उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है । उनके स्नायु बलवान हुए हैं । उनकी कार्यक्षमता और भी बढ गई है । इसका अर्थ ऐसा नहीं है कि वयस्क लोग झट से बहुत परिश्रम करना आरंभ कर दें । यदि आपने कभी भी व्यायाम नहीं किया है, तो अचानक बहुत परिश्रम के व्यायाम करना हानिकारक होगा । आप कितने भी दुर्बल क्यों न हों, तब भी अल्प श्रम के व्यायाम से आरंभ कर धीमे-धीमे व्यायाम की अवधि बढाएं। ऐसा करने से आप अनुभव कर सकते हैं कि ‘आपकी शक्ति बढ रही है एवं आपका उपेक्षित शरीर आकार धारण कर रहा है ।’ आप जो पहले कर रहे थे (व्यायाम), उसे आप पुनः कर सकेंगे, अर्थात शरीर सुधरेगा । ये सभी अनुभवसिद्ध सत्य हैं । वृद्धावस्था भी अधिक मात्रा में मानसिक अवस्था ही है एवं अपने में सुधार करने के इस नए शौक से प्राप्त उत्साह के कारण हमारे कार्य करने के नए अवसर खुल जाएंगे ।
६. स्वस्थ एवं आनंदमय जीवन हेतु समय निकालकर व्यायाम करना आवश्यक !
‘निरामय जीवन’ को एक वरदान के रूप में देखने की अपेक्षा उसे ‘एक अधिकार’ के रूप में देखें । प्रतिदिन १० से १५ मिनट व्यायाम हेतु व्यय करने में हमारी क्या हानि हो सकती है ? आराम से एक-दो सिगरेट फूंकने बैठने में भी आपका इतना समय सहजता से व्यय हो जाता है, साथ ही आपके द्वारा पहले आरंभ किए गए व्यायाम करने में चाहे कितने भी सप्ताह बीत जाएं, तब भी इससे आपके उत्साह एवं कार्यक्षमता में वृद्धि होती ही दिखाई देगी तथा व्यायाम के लिए प्रोत्साहन ही मिलेगा ।
७. सुप्रसिद्ध पहलवान लीडरमन का अनुभवसिद्ध वक्तव्य !
उपरोक्त विचार सुप्रसिद्ध पहलवान लीडरमन के हैं । उनकी आयु ६० वर्ष से अधिक है, तब भी उनका शरीर सुदृढ एवं कार्यक्षम है । वे अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर अधिकारवाणी से कहते हैं, ‘ऊपर जो सुझाव दिए गए हैं, उनपर आचरण करें । इसके लिए मन में संदेह न रखें । मैंने स्वयं व्यायाम के कारण होनेवाले आश्चर्यजनक परिवर्तन देखे हैं । मेरा स्वयं का शरीर ही इसका अनोखा प्रमाण है ।’
– श्री. शं. धों. विद्वांस, संपादक, मासिक ‘व्यायाम’ (साभार : अर्ल लीडरमन का ‘फिजिकल कल्चर’ के विषय में लेख, अगस्त १९४७)