फेक नैरेटिव… युद्ध की आधुनिक पद्धति !

‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म में एक वाक्य बहुत अर्थपूर्ण है, ‘सरकार उनकी है तो क्या हुआ ? सिस्टम तो हमारा ही है !’ अब इस विषय में किसी के भी मन में यह प्रश्न उठेगा कि सर्वशक्तिमान शासनतंत्र हाथ में होते हुए भी उसपर विजय प्राप्त करनेवाले इस ‘सिस्टम’ के पास (प्रशासनिक तंत्र के पास) ऐसी कौनसी शक्ति होती है ?, तो इसका उत्तर जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आए, उस समय देवेंद्र फडणवीस ने दिया । महाराष्ट्र में भाजपा को इतना बडा झटका क्यों लगा ?, यह बताते हुए उन्होंने कहा, ‘‘विरोधियों के ‘फेक नैरेटिव’ का (झूठी कहानी) का उत्तर देनें में हम असक्षम रहे ।’’ वास्तव में देखा जाए, तो विगत १० वर्षाें में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विविध मोर्चाें पर किया गया प्रचंड काम, विश्वपटल पर भारत का बढा हुआ स्थान, इन सभी बातों को ध्यान में लिया जाए, तो यह चुनाव भाजपा के लिए ‘केक वॉक’ (एकतरफा प्रतियोगिता) सिद्ध होगी, यह अपेक्षा थी; परंतु किसी प्रकार की विश्वसनीयता के अभाववाले विरोधी दलों के गठबंधन को केवल ‘फेक नैरेटिव’ के आधार पर बल पहुंचाया गया तथा उससे आए लोकसभा चुनावों के परिणामों को चौंकानेवाले ही कहना पडेगा । ‘नागरिकता संशोधन कानून’ का (‘सीएए’ का) भारतीय मुसलमानों से किसी प्रकार का संबंध न होते हुए भी ‘इस कानून के कारण उनकी नागरिकता जाएगी’, यह उनके मन पर कैसे अंकित किया गया ? किसानों को कस रही हथकडियों से उन्हें मुक्ति दिलानेवाले कानून के विरुद्ध उन्हें कैसे भडकाया गया ? बांग्लादेश की सरकार का देखते-देखते ही कैसे तख्ता पलट दिया गया ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर छिपे हैं ‘नैरेटिव’ के युद्ध में !

तो क्या है यह ? ‘नैरेटिव’ निश्चितरूप से क्या होता है ? सरकारों का तख्तापलट करने तक की शक्ति इस ‘नैरेटिव’ में कहां से आती है ? इस युद्ध में साम्यवादी इतने कुशल कैसे होते हैं ? अब इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास करेंगे ।

१. मूल (क्लासिकल) मार्क्सवाद तथा मार्क्सवादियों द्वारा परिवर्तित नीति

‘समाज को शोषक एवं शोषित इन समूहों में विभाजित करना, उनमें निरंतर संघर्ष की चिंगारी को भडकाते रकना तथा इस संघर्ष से अराजक एवं अराजक से विध्वंस उत्पन्न करना’ साम्यवादी विचारधारा का सारगर्भ है । मार्क्स द्वारा बताए गए मूल (क्लासिकल) मार्क्सवाद में यह संघर्ष पूंजिपतियों तथा श्रमिकों के मध्य में होगा, ऐसा माना गया था अर्थात ही इस संघर्ष का आधार आर्थिक था । मार्क्स ने यह भविष्यवाणी की थी कि जहां सबसे अधिक औद्योगीकरण हुआ था, उस इंग्लैंड-जर्मनी जैसे पाश्चात्य देशों के श्रमिक अपने-अपने देश की सीमाएं लांघकर एक हो जाएंगे तथा बंदूक की नली से आनेवाले रक्तरंजित क्रांति कर पूंजीशाही नष्ट करेंगे ।’; परंतु इसमें से कुछ भी नहीं हुआ । पाश्चात्त्य जगत् में तीव्रगति से आनेवाली समृद्धि का लाभ श्रमिकों का भी मिला तथा वे इस ‘कम्युनिस्ट’ (साम्यवादी) क्रांति में सम्मिलित होंगे’, यह संभावना पूर्णरूप से झूठी सिद्ध हुई । दूसरी ओर रूस में वर्ष १९१८ में हुई साम्यवादी क्रांति के केवल ३ वर्ष उपरांत ही वहां की अर्थव्यवस्था इतने रसातल तक पहुंची कि भूखमरी से होनेवाले मृत्यु टालने के लिए अमेरिका के नागरिकों को चंदा इकट्ठा कर ‘हूवर कमिशन’के माध्यम से रूस के नागरिकों के खाने-पीने का प्रबंध करना पडा । अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप में ‘मूल (क्लासिकल) मार्क्सवाद’ स्थापित होना असंभव है, इसे पहचान कर मार्क्सवादियों ने अपनी नीति में परिवर्तन किया ।

२. ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’ के रूप में  समाज में नए संघर्षबिंदु तैयार करना

किसी भी देश अथवा समाज की शक्ति के ४ स्रोत होते हैं – आर्थिक शक्ति, सैन्य शक्ति, ज्ञान की शक्ति एवं भाषा ! साहित्य, संगीत एवं फैशन से आनेवाली ‘सॉफ्ट पॉवर’ ! इन चारों विषयों में हम पाश्चात्त्य देशों की कभी भी बराबरी नहीं कर पाएंगे, इससे अवगत साम्यवादियों ने एक विकृत; परंतु प्रभावशाली योजना बनाई, जिसे ‘सांस्कृतिक मार्क्सवाद’के नाम से जाना जाता है ।

शक्ति के उक्त स्रोतों का एक आधार होता है, वह है स्वयंबोध अथवा ‘सेंस ऑफ सेल्प’ अर्थात ही उस देश की/समाज की स्टोरी’ ! पाश्चात्य जगत की ‘स्टोरी’ थी आधुनिकता, विज्ञान एवं खुली अर्थव्यवस्था की सहायता से एक समृद्ध, संपन्न, सभी को समान अवसर तथा न्याय उपलब्ध करा देनेवाली लोकतांत्रिक एवं ‘लिबरल’ (उदारमतवादी) समाज की निर्मिति ! इस स्वयंबोध का मूल होता है उस समाज की संस्कृति में ! पाश्चात्य समाज की स्टोरी को उनसे निकाल लेकर उनमें टूटेपन की तथा निराशा की (Alienation and Hopelessness) भावना उत्पन्न करने के लिए उन्होंने पाश्चात्य संस्कृति के विध्वंस की योजना बनाई । समाज संघर्ष उत्पन्न करने का आधार अब आर्थिक नहीं, अपितु सांस्कृतिक बन गया तथा ‘गरीब विरुद्ध धनवान’, इस एक संघर्षबिंदु के स्थान पर ‘श्वेत विरुद्ध काले’ ‘स्त्री विरुद्ध पुरुष’, ‘बहुसंख्यक विरुद्ध अल्पसंख्यक’, ‘नागरिक विरुद्ध शरणार्थी’ जैसे अनेक नए संघर्षबिंदु तैयार किए गए ।

३. देश के प्रमुख वैचारिक प्रवाह पर तथा संस्कृति पर सीधा आक्रमण

इसी समय ‘पूरे विश्व पर हमारी सत्ता एवं वर्चस्व होना चाहिए’, इस आसुरी महत्त्वाकांक्षा रखनेवाले एक शक्ति अस्तित्व में थी तथा वह थी अतिधनवान तथा महाशक्तिशाली ‘डीप स्टेट’ ! ‘विश्व के सभी राष्ट्र अपने हित की नीतियां अपनाने का आग्रह न रखकर अमेरिका के सामने झुकें’, यह इस ‘डीप स्टेट’ का आग्रह होता है । इसमें न फंसनेवाले राष्ट्रों में अराजक फैलाकर वहां की सरकारों को अपदस्थ करने हेतु वे सांस्कृतिक मार्क्सवादियों को अपने साथ लेते हैं; क्योंकि मार्क्सवादियों द्वारा धनिकों का विरोध छोडे जाने के कारण उनके साथ गठबंधन करना ‘डीप स्टेट’को कठिन नहीं लगता तथा आधुनिक युद्ध में उपयोग किए जानेवाले एक प्रभावी तंत्र पर साम्यवादियों का राज होता है ।

आर्थिक शक्ति, सैन्य शक्ति, ज्ञान की शक्ति एवं ‘सॉफ्ट पॉवर’ इसमें हम लोकतांत्रिक/पूंजीवादी राष्ट्रों की बराबरी नहीं कर सकते, यह ध्यान में आए साम्यवादियों ने शक्ति का एक नया स्रोत खोज निकाला तथा वह था ‘पॉवर ऑफ नैरेटिव !’ (झूठी कहानी की शक्ति) इसापूर्व ५ वीं शताब्दी में चीनी विचारक त्सुन त्जु ने कहा था, ‘युद्धकला मुख्यरूप से शत्रु के साथ धोखाधडी करनेवाली कूटनीति पर निर्भर होती है । युद्धभूमि पर प्रत्यक्ष लडना युद्ध की बहुत ही प्राथमिक पद्धति है । शत्रु के देश में जो मूल्यवान होता है, उसका तथा उसके लोगों के हाथों ही विध्वंस कराने की स्थिति उत्पन्न कर बिना लडे ही शत्रु को समाप्त करने से श्रेष्ठ अन्य कोई कला नहीं है । हमारे लक्षित देश के लोगों में वैचारिक भ्रम उत्पन्न करने से उन्हें स्वयंविध्वंस की ओर ढकेल देना बहुत सहजता से संभव होता है । देश की पहचान बननेवाले, जिनके लिए देश के नागरिक आवश्यकता पडने पर प्राण देने में भी संकोच नहीं करेंगे, ऐसे मूल्य, सिद्धांत, आस्था… अर्थात उस देश की संस्कृति को नष्ट करना आवश्यक है ।’

‘महिषासुर जयंती मनाईए, रावण को नायक मानिए, राम को ‘पुरुषसत्तावादी (पैट्रियार्कल)’ प्रमाणित कर उसकी पूजा करना अस्वीकार कीजिए, दीपावली एवं होली के त्योहारों में कुछ न कुछ दोष निकालकर उनके विरुद्ध प्रचार कीजिए…’, ऐसी बातें न कितने योजनाबद्ध पद्धति से मन पर अंकित की जा रही हैं, यह हम देख रहे हैं । यह तो सीधा संस्कृति पर किया जा रहा आक्रमण है । इसके लिए देश के प्रमुख वैचारिक प्रवाह पर (‘मेनस्ट्रीम नैरेटिव’ पर) नियंत्रण रखना पडता है ।

श्री. अभिजीत जोग

४. ‘नैरेटिव’ की व्याख्या तथा ‘नैरेटिव’ के माध्यम से प्रभुत्व स्थापित करने की विशिष्ट कार्यपद्धति

‘नैरेटिव’की व्याख्या : representation of a particular situation or process in such a way as to reflect or conform to an overarching set of aims or values. (कोई भी परिस्थिति अथवा प्रक्रिया, उसे कुछ व्यापक उद्देश्यों अथवा मूल्यों से सुसंगत पद्धति से प्रस्तुत करना) ऐसी की जा सकती है । हम चाहते हैं वह ‘नैरेटिव’ फैलाने के लिए, किसी भी वास्तविकता का आकलन, लोग हमारी पद्धति से करेंगे; इस प्रकार का वैचारिक वातावरण तथा संदर्भ निर्माण करने पडते हैं । इसके लिए लोगों के मन पर प्रभाव डालनेवाले शिक्षा, माध्यम तथा मनोरंजन जैसे क्षेत्रों पर नियंत्रण प्राप्त करना पडता है । पाश्चात्य जगत में हों अथवा भारत में हो; विश्वविद्यालयों पर विशेषकर इतिहास एवं राज्यशास्त्र जैसे ‘ह्युमैनिटीज’ से संबंधित (मानवता से संबंधित) विषयों पर साम्यवादियों का संपूर्ण नियंत्रण होता है । पश्चिम के ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’, ‘द वॉशिंग्टन पोस्ट’, ‘बीबीसी’, साथ ही भारत के माध्यम क्षेत्रों में साम्यवादियों का ही वर्चस्व होता है । हॉलीवुड, बॉलीवुड, साथ ही ‘ओटीटी प्लैटफॉर्म्स’ पर साम्यवादी ‘एजेंडा’ ही (कार्यसूची) आगे बढाया जाता है । वर्षाें के योजनाबद्ध प्रयासों से उन्होंने इसे साध्य किया है; उसके कारण ही ‘नैरेटिव सेटिंग’ पर उनका प्रभुत्व है ।

इन संस्थाओं पर स्वयं का प्रभुत्व स्थापित करने की उनकी एक विशिष्ट कार्यपद्धति है –

 अ. किसी भी प्रकार से एक-एक संस्था पर नियंत्रण स्थापित कीजिए ।

आ. उस संस्था में नई नियुक्तियां करते समय ‘मेरिट’ की अपेक्षा (गुणवत्ता की अपेक्षा) ‘आइडियोलॉजी’ को (विचारधारा को) प्रधानता दीजिए ।

 इ. प्रत्येक व्यक्ति को इस विचारधारा से संपूर्णरूप से प्रतिबद्ध रहना चाहिए, इसके लिए आग्रही रहिए ।

 ई. प्रतिबद्धता माननेवालों को वेतनवृद्धि, पदोन्नति जैसे पुरस्कार दीजिए । इससे थोडासा भी हटकर भिन्न विचार करनेवालों को काम करना असंभव बनाकर उन्हें अपने मार्ग से हटाईए, अर्थात ही ‘कैंसल कल्चर’ का उपयोग कीजिए ।

५. साम्यवादियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में फैलाई हुई वैचारिक दहशत

आज भी विश्वविद्यालयों के इतिहास विभाग में काम करनेवालों को साम्यवादी इतिहासकारों द्वारा बनाए गए मार्ग पर ही चलना पडता है, अन्यथा ‘डॉक्टरेट’ के लिए (विद्यावाचस्पति) ‘गाइड’ (मार्गदर्शक) मिलना तथा प्रबंध पूर्ण होना असंभव होता है । इस व्यवस्था से बाहर निकलनेवाले लोग भी साम्यवादी नैरेटिव को ही आगे बढाते हैं । कार्पाेरेट क्षेत्र में भी सांस्कृतिक मार्क्सवादियों ने ‘इ.एस.जी.’ (एनवार्यनमेंट (पर्यावरण), सोशल (सामाजिक), गवर्नेंस (शासन)) तथा ‘डी.इ.आई.’ (डाइवर्सिटी (विविधता), इक्विटी (समानता), इंक्लुजन (समावेशी), परीक्षण (ऑडिट) जैसी पद्धति आरंभ कर उनके द्वारा तैयार की गई चौखट के बाहर कदम रखने का कोई विचार भी नहीं कर पाएगा, इस प्रकार की वैचारिक दहशत स्थापित की है; क्योंकि कंपनियों को मिलनेवाले ठेकों तथा ‘टेंडर्स’ (निविदा) के लिए इस परीक्षण में दिखनेवाला काम विचार में लिया जाता है । ‘ब्लैकरॉक’ विश्व की सबसे बडी ‘सेट मैनेजमेंट कंपनी’ (आधुनिक व्यवस्थापन करनेवाला प्रतिष्ठान) विभिन्न औद्योगिक परियोजनाओं में ट्रिलियंस डॉलर्स का निवेश करता है । उसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी लैरी फिंक ‘जिन्हें यह निवेश चाहिए, उन कंपनियों को ‘इ.एस.जी.’ एवं ‘डी.इ.आई.’ परीक्षण करवाकर वोक विचारों का स्वीकार करना ही होगा’, यह आग्रह रखकर विभिन्न प्रकार से दशहत स्थापित कर अपने एक ही ‘नैरेटिव’ को स्थापित करने में साम्यवादियों ने सफलता प्राप्त की है ।

६. किस प्रकार देश की सरकारों का तख्तापलट किया जाता है ? तथा उसका षड्यंत्र

महत्त्वपूर्ण बात यह कि साम्यवादी एवं ‘डीप स्टेट’, ये दो निरंकुशतावादी शक्तियां आकर्षक मुखौटों के पीछे काम करती हैं । उसके कारण अनेक बार उनका वास्तविक उद्देश्य पहचानना तथा उनका विरोध करना कठिन हो जाता है । सांस्कृतिक मार्क्सवादियों के मुखौटे होते हैं, जिनमें ‘सामाजिक न्याय, स्त्रियों के अधिकार, पर्यावरण की रक्षा, सर्वसमावेशिता इत्यादि’, जबकि ‘डीप स्टेट’ का मुखौटा होता है लोकतंत्र का प्रसार ! जो देश उनका लक्ष्य होता है, वहां यदि पहले से ही लोकतंत्र स्थापित है, तो उसके संकट में होने की बात कही जाती है । सद्गुणों के इन मुखौटों का विरोध करना असंभव ही होता है । उसके पीछे का विध्वंसक चेहरा हमारे ध्यान में आने तक बहुत देर हो चुकी होती है । अमेरिका के लिए समस्याएं बननेवाली नीति बनानेवाले देशों की सरकारों का तख्तापलट करने का काम पहले ‘सी.आई.ए.’ के द्वारा (अमेरिका के गुप्तचर संगठन के द्वारा) किया जाता था; परंतु उसमें की जानेवाली गुप्त गतिविधियां तथा रक्तपात के कारण उनके ‘लिबरल डेमॉक्रसी’ के (उदारमतवादी लोकतंत्र के) रक्षणकर्ता, इस अमेरिका की प्रतिमा को हानि पहुंचती थी । उसपर उन्होंने एक चतुराई खोज निकाली, वह थी उस देश के कुछ विफल तथा द्रोही लोगों को साथ लेकर वहां ‘लोकतंत्र लाने हेतु’ अथवा वहां के ‘दुर्बल बने लोकतंत्र को बचाने हेतु’ ‘आंदोलन खडे करना, उन्हें आर्थिक एवं अन्य सहयोग देकर उनमें असंतोष की ज्वाला भडकाना, साथ ही अराजक उत्पन्न कर वहां की सरकार का तख्ता पलट देना ! यह काम करने के लिए अमेरिका में ‘नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमॉक्रसी’ नामक संस्था बनाई गई । उसके द्वारा, साथ ही ‘युनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ (यू.एस.ए.आई.डी. – अंतरराष्ट्रीय विकास हेतु कार्य करनेवाली अमेरिकी संस्था) के द्वारा प्रचंड आर्थिक सहायता दी जाती है तथा अन्य योजनाएं चलाई जाती हैं । उन्हें ‘स्थानिक जनता के उत्स्फूर्त विद्रोह’ का स्वरूप दिया जाता है । इसके लिए ‘इस देश में लोकतंत्र मिटाया जा रहा है ।’ तथा ‘यहां का संविधान संकट में है’…’ का ‘फेक नैरेटिव’ खडा किया जाता है । यह कार्य उस देश में कार्यरत साम्यवादी शक्तियों की तथा उनके ‘ग्लोबल इकोसिस्टम’ की (वैश्विक व्यवस्था की) सहायता से साध्य किया जाता है । सामाजिक माध्यमों के उदय के पश्चात यह काम अधिक प्रभावीरूप से करना संभव हो रहा है । वर्ष २०११ में घटित ‘अरब स्प्रिंग’ आंदोलन से लेकर उसके उपरांत हुए प्रत्येक आंदोलनों में सामाजिक माध्यमों का बहुत ही प्रभावी उपयोग कर लिया गया है ।

इसके लिए कौनसा व्यक्ति सामाजिक माध्यमों पर किस प्रकार का लेखन करता है, पढता है अथवा ‘लाईक’ करता है (पसंद करता है)/‘शेयर’ (प्रसारित) करता है, इसके आधार पर उसकी रुचि-अरुचि/ झुकाव/विचारधारा सुनिश्चित की जाती है । इसमें समानतावाले लोगों के समूह बनाए जाते हैं । इस समूह में सम्मिलित लोगों को किस प्रकार से संदेश दिए जाने से उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया किस प्रकार होगी, इसका मानसशास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन किया जाता है तथा उसके अनुसार संदेशों की भरमार कर इच्छित प्रत्युत्तर प्राप्त किया जाता है । किसे क्या देखना है तथा कैसे विचार करना है ?, इसे ‘मैन्युपिलेट) (कुशलता से नियंत्रित करना) किया जाता है । यहां हमें ‘हम अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहे वह देख रहे हैं/पढ रहे हैं’, ऐसा लगता है; परंतु वास्तव में ‘बिग टेक’ प्लैटफॉर्म्स (बडे सूचना प्रौद्योगिकी प्रतिष्ठान) तथा उनके पीछे कार्यरत शक्तियां इन्हें निर्धारित करती रहती हैं । इस तंत्र का प्रभावी उपयोग कर अपने लिए असुविधाजनक सरकारों का तख्ता पलटनेवाले ‘रेजिम चेंज एक्सपर्ट्स’ (सरकार का तख्तापलट करनेवाले विशेषज्ञ) अब तैयार हो चुके हैं । इन लोगों ने किस प्रकार बांग्लादेश की सरकार का तख्तापलट किया, यह हमने कुछ ही दिन पूर्व देखा ।

७. भारत की सरकारों का तख्तापलट करनेवालों के पीछे कार्यरत अदृश्य हाथ !

भारत की मोदी सरकार ‘भारत सर्वप्रथम’ इस सिद्धांत पर आधारित जनता के हित की नीतियां चलाती है । रूस-यूक्रेन युद्ध आरंभ होने के उपरांत अमेरिका के नेतृत्व में पाश्चात्य राष्ट्रों ने रूस पर कडे आर्थिक प्रतिबंध लगाने का निश्चय किया; परंतु इसमें भारत ने किसी भी दबाव में न आकर रूस से प्राकृतिक गैस तथा तेल खरीदकर देश का हित संजोने को प्रधानता दी । इन नीतियों के कारण भारत सरकार ‘डीप स्टेट’ की आंखों में बहुत चुभ रही है । (‘डीप स्टेट’ का अर्थ है विश्व को अपनी मुट्ठी में रखने हेतु कार्यरत प्रभावशाली लोगों का समूह) ‘डीप स्टेट’ एवं ‘मार्क्सिस्ट जिहादी’ के गठबंधन ने अब भारत पर अपना ध्यान केंद्रित किया है । ‘नागरिकता संशोधन कानून’ शाहीन बाग, किसान आंदोलन, हिंडेनबर्ग ब्योरा, ये कोई भिन्न-भिन्न घटनाएं नहीं हैं, अपितु उन्हें जोडनेवाला ‘फेक नैरेटिव’ का तंत्र एक ही है । वर्ष २०२४ में भारत में संपन्न हुए लोकसभा चुनावाें में भारत में सत्तापरिवर्तन हो; इसके लिए जी जान से प्रयास किए गए । इस विषय में यूरोप के ‘डिसइंफो लैब’ ने ‘द इंजिविबल हैंड्स’ के शीर्षकतले ८५ पृष्ठोंवाला एक ब्योरा तैयार किया है । उसमें वे कहते हैं, ‘अमेरिका का ‘हेंरी ल्यूस फाऊंडेशन एवं जॉर्ज सोरोस के’ ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ तथा ‘फ्रेंच इंडोलॉजिस्ट ख्रिस्टॉफ जेफरलॉट’ का प्रमुख सहभाग था । भारत के विरोधी दलों ने विशेषकर राहुल गांधी ने जेफरलॉट द्वारा भारत में सांप्रदायिक संघर्ष भडकाकर जातिगत जनगणना करने की संकल्पना को कैसे उठा लिया, यह हमने देखा । राहुल गांधी उनकी विदेश यात्राओं में इन भारतविरोधी शक्तियों से मिलते हैं तथा उसके उपरांत ही उनके विभिन्न सूत्र घोषित होते हैं, यह संयोग तो निश्चित ही नहीं है ।

८. भारतीयों को ‘फेक नैरेटिव’ तथा उसका कार्य समझ लेना महत्त्वपूर्ण !

जॉर्ज सोरोस ने सार्वजनिक रूप से कहा था, ‘भारत की राष्ट्रवादी सरकार का तख्तापलट करने के लिए हम १ बिलियन डॉलर्स के (एक के आगे १२ शून्य) फंड का प्रावधान कर रहे हैं । यह तो सीधे-सीधे भारत के विरुद्ध घोषित युद्ध है । दिवंगत जनरल बिपिन रावत ने कहा था, ‘भारत को ढाई मोर्चाें पर लडना पडता है । एक मोर्चा है पाकिस्तान का मोर्चा, दूसरा है चीन का मोर्चा तथा ढाईवाला है, देश के अंदर से खोखला कर दुर्बल बनाने का प्रयास करनेवाले देश के आंतरिक शत्रुओं का मोर्चा !’ तथा उनके विदेशी हस्तकों का प्रमुख हथियार है ‘फेक नैरेटिव !’ यह हथियार कैसे काम करता है ?, किस प्रकार वह हमारी मानसिकता पर नियंत्रण स्थापित करता है ?, उसके पीछे किसके हाथ कार्यरत हैं ? तथा उनका उद्देश्य क्या है… ? इसे यदि भारतीय नागरिकों ने समझ लिया, तभी वह असलफ सिद्ध होगा। हमें समझ लेना होगा कि ‘जो दिखता है, वह सब सत्य नहीं होता, उसके पीछे बहुत कुछ घटित हो रहा होता है ।’

– श्री. अभिजीत जोग, प्रसिद्ध लेखक, पुणे, महाराष्ट्र.

संपादकीय भूमिका 

सभी रोगों के लिए एक ही औषधि नहीं होती; परंतु राष्ट्र एवं धर्मसंबंधी सभी समस्याओं का एक ही उत्तर है – हिन्दू राष्ट्र-स्थापना !