लव जिहादविरोधी कानून से आप डरते क्यों हैं ? – विरोध करनेवालों से अधिवक्ता इचलकरंजीकर का प्रश्न

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कुछ दिन पूर्व राज्य में ‘लव जिहादविरोधी कानून’ बनाने की घोषणा की है । उसके लिए विशेष समिति का गठन भी किया है । सरकार द्वारा कानून बनाने की बात की जाने से ही आधुनिकतावादी गिरोह सरकार की आलोचना करने में लग गया । इस कानून के विरोध में ‘इसके लिए अलग कानून की क्या आवश्यकता है ?, कानून बनाया जाए, इतनी घटनाएं कहां होती है ?’, इस प्रकार से प्रश्नों की मार पड रही है । लव जिहाद की वास्तविकता क्या है, इसकी यह संक्षिप्त समीक्षा !

१. कानूनों का परिणाम दिखने में कुछ वर्ष लगते हैं !

इसमें ‘लवरोधी कानून की क्या आवश्यकता है ?’, यह प्रश्न पूछा जाता है । यहां यह बात ध्यान में लेनी चाहिए कि वर्तमान में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात एवं हरियाणा में लव जिहादविरोधी कानून है । इस कानून की वहां क्या उपयुक्तता है, यह प्रश्न पूछने से पूर्व यह बात ध्यान में लेनी चाहिए कि आज कानून का कार्यान्वयन आरंभ किया तथा तुरंत ही उसके परिणाम मिले, ऐसे कानून भिन्न होते हैं । हमारे यहां अभियोग दीर्घकालीन चलते हैं, यह हमें ज्ञात है । पहले अपराध होते हैं, उसके पश्चात शिकायतें प्रविष्ट होती हैं, उसका अन्वेषण होता है तथा अंततः निर्णय आता है । निर्णय आने पर पहले उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के उपरांत यह प्रक्रिया पूरी होती है, अतः ऐसे कानूनों का परिणाम अगले २५ वर्षाें में दिख सकता है ।

चाहे कुछ भी हो, तब भी कानून के होने से उसकी धाक रहती है । इस कानून के कारण अपराध तो पंजीकृत हो रहे हैं । उत्तर प्रदेश में तो एक प्रकरण में आरोपी को दंड भी मिला है । इसलिए यह कानून संपूर्णरूप से निरुपयोगी नहीं है । लव जिहादविरोधी कानून का विरोध करनेवालों से यह प्रश्न पूछने की इच्छा होती है, ‘आप कहते हैं कि लव जिहाद का कोई अस्तित्व नहीं है, तो आप कानून बनाए जाने से क्यों डरते हैं ?’

२. परिस्थिति के अनुसार कानूनों में संशोधन करने पडते हैं !

‘बलपूर्वक धर्मांतरण करने से वर्तमान प्रस्थापित कानूनों के अंतर्गत कार्यवाही तो होती ही है, तो उसके लिए नया कानून किसलिए ?’, यह एक आवाज उठ रही है । इसलिए क्या वर्तमान कानून लव जिहाद के प्रकरणों में न्याय दिलाने में पर्याप्त हैं ? इस पर विचार करते समय ऐसा दिखाई देता है कि जैसे-जैसे परिस्थिति में परिवर्तन आता है, वैसे कानूनों में भी परिवर्तन करने पडते हैं । समाज एक सजीव घटक है । समाजप्रवाह के अनुसार कानूनों को स्वीकार करने की प्रक्रिया होती है । उदाहरण लेना हो, तो गैरकानूनी गतिविधियां चलानेवाले संगठन पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है । यह कानून वर्ष १९६७ में बनाया गया । अब सूचना प्रौद्योगिकी आई है, इंटरनेट आया है, भिन्न भिन्न ‘एप्स’ आए हैं, तो क्या इस स्थिति में ‘वर्ष १९६७ का कानून पर्याप्त है ?’, इसका उत्तर है ‘नहीं’ । वर्ष २००८ में तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने ही उस कानून में संशोधन किया । यह एक प्रक्रिया है । उसके कारण यदि ‘ऑर्गनाइज्ड’ (सुसंगठित) लव जिहाद हो, तो उसके लिए अलग से कानून बनाने ही पडेंगे ।

अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर

कानून बनाने से क्या लाभ हुआ, यह आनेवाले १० वर्ष में समझ में आएगा । इसलिए ‘लव जिहाद के प्रकरण चलाने हेतु नए कानून की आवश्यकता नहीं है, अपितु पुराने कानून उसके लिए पर्याप्त हैं’, ऐसा हम नहीं कह सकते ।

३. राष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज तारा सहदेव का प्रकरण है इसका उदाहरण !

राष्ट्र स्तरीय निशानेबाज तारा सहदेव भी लव जिहाद में फंस गई थीं । तारा सहदेव का यह अपवाद कहना पडेगा कि उन्होंने अपना कैरियर तथा समाज में उनके स्थान को एक ओर रखकर लव जिहाद की वास्तविकता सभी के समक्ष सार्वजनिकरूप से उजागर की । उनके साथ धोखाधडी करनेवाले रकिबुल हसन को नाम बदलकर धोखाधडी करने के प्रकरण में वर्ष २०२३ में दंड भी मिला है । इसलिए नाम बदलकर हिन्दू युवतियों के साथ धोखाधडी किए जाने का एक बडा प्रकरण तो समाज के सामने है ।

४. हिन्दू युवतियों के साथ धोखाधडी न हो, यह उद्देश्य !

राज्य सरकार के गृहविभाग का अंतरधर्मीय विवाहों के संरक्षण देने का आदेश है । दिसंबर २०२४ में जारी किया गया यह आदेश क्या लव जिहादविरोधी कानून में बाधा बनेगा ?, यह प्रश्न उठ रहा है । धर्मांतरण के लिए हमारा विरोध नहीं है; परंतु गैरकानूनी धर्मांतरण के लिए है । विवाह का लालच देकर धर्मांतरण करने के लिए हमारा विरोध है । संविधान के अनुसार हम सभी को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है । हम अपनी इच्छा से कभी भी धर्मपरिवर्तन कर सकते हैं । इसमें डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने ही एक प्रावधान किया है, उसे ध्यान में लेना महत्त्वपूर्ण है । कोई बात यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य को बाधा उत्पन्न करती हो, तो उसपर कार्यवाही की जा सकती है । कोई हिन्दू लडकी स्वेच्छा से मुसलमान के साथ विवाह करना चाहती है अथवा कोई हिन्दू लडका स्वेच्छा से यदि मुसलमान युवती से विवाह करना चाहता है, तो वे ऐसा अवश्य कर सकते हैं; परंतु धोखाधडी करने पर आपत्ति है । इसमें हिन्दू युवति का शोषण एवं उत्पीडन न हो, केवल इतनी ही बात है ।

५. विदेशों में बैठे विरोधियों पर लगाम लगेगी !

इंटरनेट पर ‘भारत और लव जिहाद’, ऐसा खोजा जाए, तो अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों से भी ‘भारत में लव जिहाद नहीं है, तो उसके लिए क्यों प्रयास किए जाते हैं ?’ जैसे प्रश्न उठाए गए हैं । वास्तव में देखा जाए, तो यही लव जिहाद ब्रिटेन में ‘रोमियो जिहाद’ के रूप में जाना जाता है । यूरोप में आए सीरियन शरणार्थियों ने वहां भी इस प्रकार से युवतियों के साथ धोखाधडी करना आरंभ किया है; परंतु ऐसा होते भी भारत की आलोचना की जा रही है । इसका अर्थ यह है कि उसके लिए आर्थिक सहायता की जा रही है । महाराष्ट्र सरकार की अगुआई से यदि यह कानून बना, तो उससे लव जिहाद के लिए इतने प्रयास क्यों किए जा रहे हैं ?, इसका ‘डेटाबेस’ (आंकडे) तैयार होगा । उसमें कितनी शिकायतें की गईं ? कितने अपराध पंजीकृत हुए ?’ इससे विदेशों में भारत के विषय में किए जा रहे दुष्प्रचार का प्रतिवाद किया जा सकता है ।

– अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर, राष्ट्रीय अध्यक्ष, हिन्दू विधिज्ञ परिषद.

लव जिहाद के विरुद्ध विभिन्न स्तरों पर लडाई लडिए !

लव जिहाद की घटनाएं जितनी सामने आएंगी, उतना ही हिन्दुओं पर होनेवाले आघातों से उन्हें बचाया जा सकेगा । सरकार को पत्र लिखना, स्थानीय विधायकों और सांसदों के साथ लव जिहाद के विरुद्ध आवाज उठाने की मांग करना तथा हिन्दुओं द्वारा लव जिहाद के प्रकरणों के विरुद्ध व्यक्तिगत याचिका करना आदि माध्यमों से हिन्दू निश्चित ही यह संघर्ष कर जीत सकते हैं ।

– अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर

क्या इस्लामी संस्थाएं तथा इस्लामी प्रवक्ता इसका दायित्व लेंगे ?

किसी हिन्दू लडकी ने मुसलमान लडके के साथ विवाह किया, तो उसका किसी प्रकार का उत्पीडन नहीं होगा तथा उसपर जबरदस्ती नहीं की जाएगी, इसका दायित्व इस्लामी संस्थाओं को तथा इस्लामी प्रवक्ताओं को लेना चाहिए; परंतु ऐसा क्यों नहीं होता ? सेक्यूलर (धर्मनिरपेक्ष) होने का प्रमाण प्रस्तुत करने का कर्तव्य केवल हिन्दुओं पर ही क्यों थोपा जाता है ? न्याय तो सभी के लिए एकस मान होना चाहिए ।

– अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर