महिलाओ, धर्मशास्त्र समझ लो !

खरा सौंदर्य ?

स्त्री शब्द का स्मरण होते ही एक सुंदर स्त्री हमारे आंखों के सामने आती है । प्रत्येक स्त्री बाह्यदृष्टि से सुंदर ही हो, ऐसा आवश्यक नहीं; परंतु यदि वह धर्माचरणी तथा धार्मिक वृत्ति की हो, तो वह अंतर्बाह्य सुंदर दिखती है, इसमें कोई संदेह नहीं है । उक्त चित्र में अध्ययन करें कि ‘खरी सुंदरता किसमें है ?’ तथा अपने मन पर धर्माचरण का महत्त्व अंकित करें !

केश खुले न छोडें, अपितु सात्त्विक केशरचना करें !

केश खुले छोडने का अर्थ है अनिष्ट शक्तियों के लिए प्रवेशद्वार खोलना ! खुले केश के घर्षण से उत्पन्न गरम ऊर्जा ब्रह्मांड में कार्यरत कष्टदायक प्रवाह को आकर्षित कर लेती है; इसलिए सायंकाल अथवा रात में केश खुले छोडकर घूमना वर्जित माना जाता है । केश में विद्यमान कष्टदायक तरंगों का प्रवाह खंडित करने हेतु चोटी अथवा जूडा बनाएं । उससे चेहरा सत्त्वगुणी दिखाई देता है । सात्त्विक केशरचना कर धर्माचरण करें !

गोलाकार कुमकुम या असात्त्विक बिंदी

हिन्दू धर्मशास्त्र में बताए अनुसार कुछ स्त्रियां कुमकुम लगाती हैं तथा कुछ बिंदी लगाती हैं । बाजार में अनेक प्रकार की बिंदियां बिक्री के लिए रहती हैं । ये
बिंदियां विभिन्न कलाकारी से युक्त, सर्पाकार अथवा अंडाकार होती हैं । ऐसी बिंदियां लगाना वर्तमान में फैशन समझा जाता है; परंतु उससे क्या लाभ मिलता है ? उक्त चित्र में बिंदी तथा कुमकुम, इनमें से किसकी ओर देखकर अच्छा लगता है, इसका अध्ययन करें तथा धर्माचरणी बनें !

शर्ट-पैंट नहीं, अपितु साडी पहनकर सात्त्विक स्पंदन ग्रहण करें !

युवतियो एवं महिलाओ, शर्ट-पैंट अथवा साडी में से साडी पहनने से अधिक लाभ होता है । शर्ट-पैंट पाश्चात्यों की वेशभूषा है । इसलिए उसे पहनने से स्वयं में आसुरी वृत्ति उत्पन्न होती है । साडी में विद्यमान निर्मलता तथा शालीनता अन्य कपडों में नहीं है ।

स्त्रियों को अंतिम संस्कार क्यों नहीं करना चाहिए?

किसी पुत्रहीन व्यक्ति की मृत्यु हुई हो, तो उसके कुल का कोई भी पुरुष उसका अंतिम संस्कार कर सकता है । स्त्रियों को अंतिम संस्कार का अधिकार प्राप्त नहीं है; परंतु उसके भी कुछ अपवाद हैं, उदा. प्राकृतिक आपदा अथवा युद्ध के कारण किसी का पूरा कुल ही नष्ट हुआ हो अथवा कुल का व्यक्ति दूर देश में रहता हो, तो उसकी पत्नी आदि को शास्त्र ने अंतिम संस्कार का अधिकार प्रदान किया है । धर्मशास्त्र के अनुसार स्त्रियों को मंत्रोच्चारण का अधिकार नहीं है । स्त्रियों की जननेंद्रिय पेट के निचले भाग में होने के कारण, मंत्रोच्चारण से उनकी प्रजननक्षमता प्रभावित होती है; इसलिए उन्हें मंत्रोच्चारण न करने के लिए कहा गया है । प्राचीन काल में मैत्रेयी, गार्गी जैसी स्त्रियां वेदपाठ करती थीं; परंतु ऋत्विज के किसी पद का निर्वहन नहीं करती थीं, यह भी ध्यान में रखना होगा । अंतिम संस्कार के समय मंत्राग्नि देते समय, साथ ही उसके आगे के कार्य में भी मंत्रोच्चारण का समावेश होने से, उससे स्त्री को कोई कष्ट न पहुंचे; इसलिए स्त्री मंत्राग्नि न दे ।’

(संदर्भ : दैनिक ‘सनातन प्रभात’)        

पति के निधन के उपरांत मंगलसूत्र धारण न करने का अध्यात्मशास्त्र !

जैसे मूर्ति के भंग होने के उपरांत उसमें विद्यमान चैतन्य नष्ट होता है, वैसे ही पति के निधन के उपरांत उनमें समाहित एकत्व नष्ट होने से मंगलसूत्र के उद्देश्य के प्रतीक कटोरियों का महत्त्व शेष नहीं रहता । मंगलसूत्र विवाह का प्रतीक है, इसलिए विवाहित वर वधू के पिता से कहता है, ‘धर्म एवं प्रजा की प्राप्ति हेतु मैं इस कन्या का स्वीकार करता हूं ।’ तथा वही विवाह का प्रमुख उद्देश्य है । अतः पति के निधन के उपरांत पत्नी का यह उद्देश्य ही शेष नहीं रहता ।

‘मंगलसूत्र पति की सहमति से तथा उसके हाथों से स्त्री के गले में पहनाया जाता है । इसलिए मंगलसूत्र में पति की इच्छा से संबंधित तरंगें आकर्षित होती हैं । पति के निधन के उपरांत भी यदि स्त्री ने फैशन के रूप में अथवा उसके मृतक पति के प्रति सम्मान के रूप में मंगलसूत्र धारण किया, तो इन स्पंदनों के कारण उसके पति की लिंगदेह पुनः भूमंडल में फंस सकती है । मंगलसूत्र को देखने से पति का स्मरण रहने से, पति को पुनः भूलोक में आना पडता है । उसके कारण पति की लिंगदेह को आगे की गति मिलने में बाधा उत्पन्न होती है । आजकल की बुद्धिजीवी महिलाएं पति के निधन के उपरांत भी ‘पति चला गया, तो क्या हुआ ?’, इस आवेश में मंगलसूत्र धारण करती हैं । इस कृति के कारण उनके मृतक पति की तथा उनकी भी आध्यात्मिक स्तर पर हानि होती है; इसलिए ‘हिन्दू धर्म द्वारा निर्देशित विधिवत शास्त्रोक्त संस्कारों के पालन में ही हमारा कल्याण है’, इसे समझकर धर्म के आगे अपनी बुद्धि का समर्पण कर, धर्मपालन की ओर गंभीरता से ध्यान दें ।

(सनातन का ग्रंथ : स्त्रियों के आभूषणों से संबंधित )                     

स्त्रियों का धर्माचरण छोड देना विनाश को आमंत्रण देने समान है !

वर्तमान में स्त्रियां धर्माचरण नहीं करती हैं । कुछ चुनिंदा स्त्रियों को छोड दें, तो शेष महिलाएं सहजता से पाश्चात्यों का अंधानुकरण करती हुई दिखाई देती हैं । उदा. कुमकुम अथवा बिंदी न लगाना, मंगलसूत्र धारण न करना, केश खुले छोडना, बाहें खुली दिखाई दें; इस प्रकार बिना बाहों के (स्लीव्स के) कपडे पहनना, तंग कपडे पहनना, शरीर ढकनेवाली नहीं, अपितु शरीर का प्रदर्शन करनेवाली साडी पहनना आदि । इन महिलाओं ने मान लिया है कि ‘ऐसा करना फैशन है ।’
इसलिए ‘हमें धर्माचरण करना ही नहीं है’, इस मत पर वे दृढ हैं; परंतु इसके परिणामस्वरूप आज के समय में बलात्कार, यौन शोषण, हत्या आदि घटनाएं हो रही हैं । इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है । यदि स्त्री धर्माचरण करे, तो उसपर होनेवाले अत्याचार अपनेआप ही रुक जाएंगे ।

– श्रीमती नम्रता दिवेकर, पनवेल, महाराष्ट्र.

स्त्रियों का धीरज !

हमारे भारत में  स्त्रियों के संबंध में उनका विधवा बनना बडा आघात माना जाता है । अनेक विधवा स्त्रियों ने पुरुष भी लज्जित हो जाएं, ऐसा पराक्रम, शासन तथा समाजसेवा कर त्रिकालबाधित आदर्श स्थापित किए हैं । छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई, पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर तथा वीरांगना झांसी की रानी को वैधव्य प्राप्त हुआ था; परंतु इससे वे हतोत्साहित नहीं हुईं, अपितु उन्होंने राजनीति तथा समाजकारण में अनेक आदर्श स्थापित किए । स्त्रियों में परिस्थिति का सामना करने की निसर्गदत्त क्षमता पाई जाती है । भारत में सहस्रों किसानों ने परिस्थिति के सामने झुककर आत्महत्याएं कीं; परंतु उनकी पत्नियों ने कभी ऐसा अविचार नहीं किया । ये  स्त्रियां स्थिति का सामना करने के लिए निश्चयपूर्वक खडी रहीं । समाज में आज भी ऐसी अनेक माताएं हैं, जिन्होंने पति के निधन से निराश न होकर अपनी गृहस्थी समर्थरूप से संभाली तथा अपने बच्चों को शिक्षा देकर बडा किया । मातृत्व की महिमा ऐसी ही नहीं गाई जाती ! समाज की ओर से मातृत्व को ऐसे ही सम्मानित नहीं किया जाता !

– श्री. शंकर पांडे, पुसद, जिला यवतमाळ, महाराष्ट्र.

(साभार : ‘एकता’, मई २०१३)