पुरुष का स्त्री की ओर ‘आदिशक्ति के रूप’ में न देख पाने के कारण, उसका स्त्री के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार न करना
स्त्रीजन्म के अनेक लाभ हैं । अतः स्त्रीजन्म को बिना दोष दिए, उसके प्रति गर्व अनुभव करना होगा । वर्तमान में पुरुष स्त्री की ओर ‘आदिशक्ति का रूप’, इस भाव से नहीं देखते । उसके कारण वे उसके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार नहीं करते; क्योंकि स्त्रियों से सम्मानपूर्वक व्यवहार करने में तथा बोलने में उन्हें हीनता प्रतीत होती है । पुरुषों द्वारा पौरुषेय अहं को जागृत रखकर व्यवहार किए जाने को ‘पुरुषार्थ के साथ जीवन जीना’, ऐसा माने जाने के कारण, वर्तमान में कुछ धर्माचरणी पुरुषों को छोड दें, तो सर्वत्र ही पुरुषों के द्वारा समाज में तथा परिवार में स्त्रियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता । उनके साथ अश्लील बातें कर, कृति से तथा उनको प्रताडित कर खुश होता है तथा इसी में अपना पुरुषार्थ मानकर आज का पुरुष, चाहे वह युवा हो अथवा वयोवृद्ध; स्वयं को धन्य मानता है ।
स्त्री-पुरुषों को एक-दूसरे का सम्मान कर एक-दूसरे को आनंद देना, ईश्वरभक्ति ही है !
वास्तव में देखा जाए, तो ‘मैं पुरुष अथवा स्त्री हूं’, यह विचार कर अहं को संजोना अनुचित है । विश्व की निर्मिति हेतु तथा विश्व को संचालित करने हेतु ईश्वर ने स्त्री तथा पुरुष की निर्मिति की; परंतु दोनों में एक ही ईश्वरीय तत्त्व है । वे एक-दूसरे से देह से भले ही भिन्न हों; परंतु उनकी आत्मा एक ही ईश्वर से बनी है । अतः स्त्री-पुरुषों द्वारा एक-दूसरे का सम्मान करना तथा एक-दूसरे को आनंद देना ईश्वरभक्ति की ही एक पद्धति है । एक-दूसरे में विद्यमान ईश्वर द्वारा प्रदत्त आत्मा का सम्मान करने से साधना होती है और उससे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है ।
प्रत्येक स्त्री-पुरुष ने अध्यात्मशास्त्र समझ लिया, तो उनका जीवन आनंदमय होकर सार्थक होगा !
स्त्री-पुरुषों द्वारा एक-दूसरे का सम्मान करना अर्थात एक-दूसरे के विचारों तथा मतों का सम्मान करना ! एक-दूसरे की आलोचना कर तथा हीन मानकर कोई भी आध्यात्मिक कार्य नहीं होगा, अपितु एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना हो, तो एक-दूसरे में विद्यमान आत्मा के रूप में आनंदस्वरूप ईश्वर के दर्शन होंगे । अतः प्रत्येक स्त्री-पुरुष अध्यात्मशास्त्र समझ ले, तो उनका जीवन आनंदमय बनकर दोनों का जन्म सार्थक होगा ।
– एक साधिका