
‘जैसे जैसे आईटी इंडस्ट्री’ (सूचना-प्रौद्योगिकी का क्षेत्र) बढती जाएगी, वैसे वैसे स्वास्थ्य के संदर्भ में आयुर्वेद एवं अध्यात्म की नींव सुदृढ होती जाएगी । रोगियों के प्रतिदिन के अनुभवों से यह समझ में आता है कि
१. ‘आईटी’ क्षेत्र में कार्यरत लोग वैश्विक शोधकार्य अथवा कुल मिलाकर स्वास्थ्य की स्थिति के संदर्भ में अच्छी मात्रा में जागृत रहते हैं । ‘लाक्षणिक स्वास्थ्यलाभ’ तथा ‘बीमारीमुक्त होना’, इनमें अंतर उन्हें समझ में आता है ।
२. पथ्यपालन (परहेज) के विषय में वे अधिक सजग, अचूक एवं आग्रही होते हैं ।
३. उन्हें आयुर्वेद की मूलभूत संकल्पनाओं को समझने में रुचि होती है ।
ये सभी निरीक्षण तुलनात्मक हैं, ये कोई नियम नहीं हैं । इसका अर्थ अन्य क्षेत्रों के लोग इसकी उपेक्षा कर रहे हैं, ऐसा नहीं है; परंतु अन्य क्षेत्रों की तुलना में ‘आईटी’ में यह स्तर ध्यान आकर्षित करनेवाला है, इतना ही है ! बडा वेतन अर्जित कर भी मानसिक शांति खरीदी नहीं जा सकती, यह समझ में आने से विशेष रूप से इस क्षेत्र के लोगों का अध्यात्म एवं धार्मिकता की ओर भी झुकाव बढ रहा है । आनेवाले समय में शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों के होनेवाले विस्फोट को ध्यान में लिया जाए, तो यह बहुत ही सकारात्मक परिवर्तन है !
– वैद्य परीक्षित शेवडे, आयुर्वेद वाचस्पति, डोंबिवली
(१०.२.२०२४)
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