
पर्वकाल का मुख्य उद्देश्य है गंगा में स्नान करना और देवताओं द्वारा हमारे लिए किए गए उपकारों के लिए आभार व्यक्त करना; परंतु क्या यह उद्देश्य साध्य होता है ? जब लाखों लोग एक निश्चित दिन पर गंगा में स्नान करने आते हैं, तो क्या गंगा का पानी प्रदूषित नहीं होता ? हम इसके बारे में कब सोचेंगे ? गंगा में स्नान करना सदैव शुभ होता है, तो फिर इसे निश्चित दिनों पर ही क्यों करें ? जब लाखों का समुदाय इन नदियों के किनारे जाता है, तो स्वच्छता बनाए रखना कठिन हो जाता है । सरकारी तंत्र तैयार है । स्नानघर, शौचालय अस्थायी रूप से बनाए जाते हैं; परंतु साफ-सफाई नहीं रखी जाती, इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? अपने आसपास के वातावरण को साफ-सुथरा रखना हर किसी का कर्तव्य है । यह क्षेत्र लोकवरदायिनी गंगा का क्षेत्र है ! इसे साफ रखना चाहिए ! हमारी पवित्र नदियों, मंदिरों और उनके आस-पास सफाई रखना एक भक्त होने की निशानी है । यदि आप कोई भी खाद्य पदार्थ खाते हैं, तो उसे नगर निगम द्वारा उपलब्ध कराए गए कूडेदान में ही फेंकें । देह धर्म केवल कुछ निश्चित स्थानों पर ही किया जाना चाहिए । क्या पूरे शहर को जहां कुंभ मेला लगता है, तहस-नहस कर देना आपकी आंतरिक श्रद्धा और आस्था के अनुरूप है ? आइए, हम अपने इस दायित्व को एक पल के लिए अलग रखें और फिर से सोचें । यदि आपके घर में कूडा-कचरा हो और उस समय कोई घर में आ जाए, तो क्या आपको गंदा नहीं लगेगा ? या फिर सोचिए यदि हम किसी के घर जाएं और वह जगह गंदगी और कूडे-कचरे से भरी हो, तो क्या हम वहां रहना पसंद करेंगे ? तो जब पूरे क्षेत्र में दुर्गंध और अव्यवस्था हो, तो हम देवताओं के आने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं ?
गंगा में जो अमृत की बूंदें गिरी हैं, वे निरंतर विद्यमान रहती हैं और जब भी हम पवित्र भावना, स्पष्ट मन और हृदय से गंगा में स्नान करते हैं, तो वे अमृत कण हमारे शरीर को स्पर्श करते हैं ! भक्तों को सदैव यह चेतना बनाए रखनी चाहिए कि वे केवल किसी विशिष्ट समय या अवधि में ही अस्तित्व में नहीं हैं, बल्कि उन अमृत कणों ने अपने शाश्वत अस्तित्व से मूल रूप से पतितपावन गंगा में और अधिक प्रकाश डाला है । हमारे वैदिक धर्म ने हमें बचाने के लिए अनेक वैज्ञानिक बातें बताई हैं । हमें सामूहिक मानसिकता के बारे में ठीक से सोचने की आवश्यकता है, जहां मूल मंशा को किनारे रख दिया जाता है और केवल कर्मकांड को महत्त्व दिया जाता है । हमें इस आगामी कुंभ मेले के समय समझदारी से काम लेना चाहिए । हमें वास्तविक गंगा स्नान के समय होनेवाली भीड से बचने के बारे में सावधानी से सोचना चाहिए । इस बात का ध्यान रखना होगा कि भीड में आवारागर्दी और भगदड न हो । मैं गंगा में डुबकी लगाना चाहता हूं; तो क्या शारीरिक बल के योग से दूसरों को किनारे करना पुण्य है ? इसके बारे में आप खुद सोचिए । अब इस कुंभ मेले के समय कई संस्थाएं मदद के लिए काम करती हैं । ‘उनका यह कार्य गंगा-स्नान से भी अधिक पुण्य का है,’ ऐसा प्रतीत होता है । यदि जो लोग सक्षम हैं, वे ऐसे संगठनों के काम में सम्मिलित हों और मदद करें, तो यह निश्चित रूप से फायदेमंद होगा । यदि यह संभव नहीं है, तो कम से कम हमें ऐसे संगठनों के साथ सहयोग करने के बारे में सोचना चाहिए ! आइए, ध्यान रखें कि स्नान के समय कोई व्यवधान न आए । आइए विश्व को दिखाएं कि हम भारतीय लोग कितने सहिष्णु हैं, लाखों लोगों के समुदाय में भी हम एक आचारसंहिता का पालन करते हैं ! आइए हम इस आगामी कुंभ मेले को पहले से भी अधिक सफल बनाएं और विश्व के सामने एक उदाहरण स्थापित करें !
– योगतज्ञ दादाजी वैशंपायन
– (सौजन्य : ‘आध्यात्मिक ओम चैतन्य’ गुरुपूर्णिमा विशेषांक २०१५)

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