१. सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान
साधना आरंभ करने पर ‘ध्यान से उत्तर मिल सकते हैं’, यह ज्ञात होने पर मैं मेरी अधिकतर शंकाओं के उत्तर ध्यान से प्राप्त करता था । उसके कारण सूक्ष्म स्तर का वह ज्ञान पृथ्वी पर उपलब्ध किसी भी ग्रंथ में नहीं है । अब ईश्वर की कृपा से सनातन के कुछ साधकों को भी इस प्रकार ज्ञान मिलने लगा है । सनातन के ग्रंथों में इस अलौकिक ज्ञान का अधिक मात्रा में समावेश है ।
२. अन्य ग्रंथों से प्राप्त ज्ञान
सूक्ष्म से मिलनेवाला ज्ञान सर्वसामान्य लोगों की समझ में आने के लिए कठिन होता है । उन्हें मानसिक स्तर पर अध्यात्म सिखाना आवश्यक है, इसे ध्यान में लेकर मैं अन्य लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकें पढकर उनमें समाहित अच्छा लेखन संग्रहित करने लगा ।
३. मन में आनेवाला विचार
साधना में ‘काल के अनुसार साधना’ का पहलू महत्त्वपूर्ण होता है । उसके कारण काल के अनुसार समष्टि की (समाज की) साधना होने हेतु विश्वमन एवं विश्वबुद्धि की ओर से मिलनेवाले विचारों को मैं समय-समय पर लिखकर रखने लगा । वह संबंधित काल में सनातन के नियतकालिकों के माध्यम से समाज तक पहुंचता था । ये विचार साधना करनेवालों हेतु सदैव ही मार्गदर्शक होने के कारण संबंधित ग्रंथों में उन्हें भी अंतर्भूत किया गया है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

सात्त्विकता एवं संगठन ही राष्ट्र के उत्कर्ष की चाबी – जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी
(और इनकी सुनिए…) ‘कुंकुम इस्लामी देशों से आता है, तो क्या फिर हिन्दु तिलक लगाना बंद कर देंगे ?’ – Priyank Kharge
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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संपादकीय : नागरिक शास्त्र केवल पुस्तक में ?