कोई भी बडा समारोह सुरक्षित संपन्न होने में पुलिस की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है । ऐसे समारोह में पुलिस द्वारा भक्तों से उद्दंड व्यवहार, अशोभनीय भाषा, भक्तों के साथ मारपीट, कुछ प्रसंगों में लाठी चलाना, ऐसे अनुचित प्रकरण होते हुए हम सभी ने कभी न कभी तो अनुभव किए ही होंगे । इसका अपवाद प्रमाणित हुआ २२ जनवरी को संपन्न अयोध्याजी का ऐतिहासिक रामोत्सव ! रामोत्सव अर्थात श्रीरामलला की (श्रीरामजी के बाल रूप) प्राणप्रतिष्ठा समारोह ! इस समारोह में आरंभ से ही उत्तर प्रदेश पुलिसकर्मियों का भक्तों से अत्यंत अच्छा व्यवहार था । यह देखकर स्वयं की आंखों पर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था !

१. सुरक्षातंत्र के सामने समारोह निर्विघ्नरूप से संपन्न होने की बडी चुनौती !
हिन्दुओं के किसी भी समारोह के लिए कट्टरपंथियों द्वारा संकट रहता ही है । उसी में यह समारोह अयोध्याजी में श्रीराममंदिर का था । इस कारण इस समारोह को भी जिहादी आतंकियों का सबसे बडा संकट था । इस समारोह के कुछ दिन पूर्व अयोध्याजी में ३ लोगों को धोखे से कुछ अनुचित किए जाने के षड्यंत्र में बंदी भी बनाया गया था । इस पृष्ठभूमि पर एवं कुल मिलाकर पूरे विश्व के भक्तों की भारी भीड को ध्यान में रखकर राज्य एवं केंद्र स्तरों पर सभी प्रकार के सुरक्षातंत्रों को बुलाया गया था । इन लोगों के सामने अयोध्याजी का यह ऐतिहासिक समारोह निर्विघ्नता से संपन्न होने की बहुत बडी चुनौती थी ।
२. संयम से कर्तव्य निभाना !
अयोध्याजी में पधारनेवाले भक्त भिन्न भिन्न प्रकृति के थे । लगभग सभी भक्त सदा की भांति पुलिस को सहायता करने की मनःस्थिति में थे, परंतु उनमें भी कुछ अपवाद थे । कुछ भक्त पुलिस से विवाद करते दिखाई दे रहे थे, कुछ लोग पुलिस से बहुत ही कडवा बोल रहे थे; तब भी पुलिस उनसे अत्यंत संयम रखकर बोल रही थी । इतनी भीड में भी यथासंभव वे सभी को समझाकर कहे रहे थे । पुलिसकर्मियों का यह संयम अविश्वसनीय था ।

३. तनाव के प्रसंगों में वातावरण हलका रखने का सफल प्रयास !
इस समारोह की सुरक्षाव्यवस्था ही मानो अत्यंत भिन्न पद्धति की कार्यशैली से कार्यान्वित की गई थी । अन्यथा भक्तों द्वारा किया विवाद, उसको पुलिस द्वारा दिया गया प्रत्युत्तर, भीड का दबाव आदि कारणों से वातावरण अत्यंत तणावपूर्ण हो जाता है । तनाव के ऐसे प्रसंग अयोध्याजी में प्रत्येक कदम पर हो रहे थे; परंतु ऐसे प्रसंगों में अन्यथा उद्दंडता से बोलनेवाले पुलिसकर्मी अयोध्याजी की भीड-भाड में घटनेवाले ऐसे प्रसंगों में कुछ-कुछ विनोदात्मक बोलकर वातावरण हलका रखने का प्रयास कर रहे थे । भक्तों का गुस्सा और न बढे, पुलिसकर्मी इसकी पर्याप्त चिंता कर रहे थे । इस कारण भक्त भी तुरंत सहृदयता से पेश आकर पुलिसकर्मियों की सहायता करते थे । पुलिसकर्मियों के पास समयसूचकता साध्य करनेवाली उत्तम विनोदबुद्धि भी होती है, यह देखकर मुझे आश्चर्यमिश्रित हर्ष हुआ ! अर्थात कुछ गिने-चुने स्थानों पर पुलिस एवं भक्तों में विवाद होकर तनाव निर्माण हुआ; परंतु कहीं भी पुलिसकर्मियों का संयम नहीं टूटा । कुछ स्थानों पर ‘पुलिस डंडा’ दिखाना भी आवश्यक होता है । तथापि कहीं भी परिस्थिति बिगड गई हो, ऐसी एक भी प्रविष्टि नहीं है । इस कारण किसी भी संघर्ष के बिना संपन्न हुआ, कदाचित यह एकमेवाद्वितीय एवं अवर्णनीय समारोह होगा ।
४. उत्तम कर्तव्यदक्षता !
यदि पुलिसकर्मी ऐसे विनोद कर रहे थे अथवा वातावरण हलका रखते थे, तब भी वे अपने कर्तव्य का कडाई से पालन कर रहे थे । भक्त चाहे कितनी भी विनती करें, किसी राजनीतिज्ञ को भ्रमणभाष करें, अथवा अतिशय हठाग्रह से बोलें, तब भी उनके सामने पुलिसकर्मी नहीं झुकते थे । ‘अमुक कोई एक स्थान से किसी को भी नहीं छोडना है, तो नहीं छोडना है’, इस आदेश का उन्होंने पूरे समारोह में अक्षरश: पालन किया ।
५. उत्तर प्रदेश पुलिसकर्मियों की कार्यशैली की पंचसूत्री !
अयोध्याजी की सुरक्षा का दायित्व किनारे लगाना, यह बिल्कुल सहज काम न था । कभी भी कुछ भी हो सकता था । ऐसे वातावरण में पुलिस कर्मियों ने निम्नांकित पंचसूत्री का उपयोग किया –
अ. दिमाग ठंडा रखना
आ. सौजन्य दिखाना
इ. संघर्ष निर्माण न होने देना
ई. प्रसंग हो तो आवश्यक इतना ‘पुलिस डंडा’ दिखाना
उ. मीठा बोलकर स्वयं का स्वार्थ साध्य करना
इस पंचसूत्री के आधार पर पुलिसकर्मियों ने इस समारोह की सुरक्षा का दायित्व सफलतापूर्वक संपन्न किया, ऐसा ध्यान में आया ।
६. सुरक्षाव्यवस्था का ‘उत्तर प्रदेश पैटर्न’ सर्वत्र कार्यान्वित करें !
बहुत बडे समारोह में नागरिक एवं पुलिस के मध्य संघर्ष के कारण वातावरण बिगडता है, उससे कुछ भी साध्य नहीं होता, इसके विपरीत पुलिस के प्रति जनता के मन में और एक पूर्वाग्रह का निर्माण होता है । इस कारण अयोध्याजी की सुरक्षाव्यवस्था देखने पर ऐसा प्रश्न उठता है कि ऐसा मार्ग सर्वत्र की पुलिस क्यों नहीं अपनाती ? यदि ऐसा करते हैं, तो पुलिस ही का तनाव हलका होगा; साथ ही ‘पुलिस से मित्रता एवं शत्रुता भी बुरी’, ऐसा जो कहा जाता है, उसका उत्तर अपनी कृति से ही मिलेगा । इस कारण सुरक्षाव्यवस्था का यह ‘उत्तर प्रदेश पैटर्न’ सिद्ध होकर उसे पूरे देश में लागू किया जाए । कुल देखा जाए, तो इस पूरे समारोह में अपने राज्य का नाम सार्थक करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस ने कहीं प्रश्न ही निर्माण नहीं होने दिया । उनके पास था, केवल ‘उत्तर !’
– श्री. नीलेश कुलकर्णी, विशेष प्रतिनिधि, दैनिक ‘सनातन प्रभात’
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