‘रामजन्मभूमि की लडाई कितने काल से चलती आ रही है ?’, इसका उत्तर अधिकतर लोगों को ज्ञात नहीं होता है । सामान्य अवधारणा के विपरीत यह लडाई कुछ दशकों की नहीं, अपितु कुछ शताब्दियों से चली आ रही है ! कुल इतिहास को देखते हुए यह लडाई ईसापूर्व काल से चल रही है, ऐसा दिखाई देता है ।
१. तेजस्वी बलिदान
रामजन्मभूमि मुक्ति हेतु कुल ७६ लडाईयां हुईं, यह इतिहास है । ईसापूर्व १५० में सर्वप्रथम ग्रीक राजा मिनंडर (मिलिंद) ने आक्रमण कर अयोध्या स्थित श्रीरामपुत्र कुश द्वारा निर्मित मंदिर ध्वस्त किया । आगे जाकर शुंगकाल में मिनंडर की पराजय होने पर रामजन्मभूमि मुक्त हुई; किंतु अयोध्या को उसका गतवैभव कुछ मात्रा में पुनः प्राप्त हुआ ईसापूर्व १०० के आसपास ! वहां राजा विक्रमादित्याने मंदिर का पुनर्निर्माण किया । इसके आगे के काल में हिन्दुस्थान पर इस्लामी आक्रमण होने आरंभ हुए; परंतु वहां दाहीर जैसे पराक्रमी पुरुषों के कारण इन आक्रमणों को संपूर्णतया सफलता प्राप्त नहीं हुई ।
वर्ष १०३० के आसपास गजनी का मोहम्मद हिन्द़ुस्थान में घुस गया तथा तब से यहां के रक्तरंजित इतिहास का आरंभ हुआ । सोरटी सोमनाथजी का भंजन हुआ इसी काल में ! उसमें सम्मिलित गाजी मसूद सालार ने आगे जाकर अपना मोर्चा अयोध्या की ओर मोडा । श्रीवस्ती के राजा सुहेलदेव तथा विभिन्न आखाडों के साधु-संन्यासियों ने मिलकर सालार का तीव्र प्रतिकार कर अंततः बहराईच में उसकी सेना की बहुत बडी हार हुई । इसके आगे लगभग १२५ वर्षतक हिन्दुस्थान को इस्लामी आक्रमण का दंश झेलना नहीं पडा; परंतु उसके उपरांत अल्लाउद्दिन खिल्जी के रूप में पुनः एक बार अमानवीय हिंसा का नंगानाच आरंभ हुआ । उसके सामने बलशाली देवगिरी साम्राज्य का भी पतन हुआ । रानी पद्मिनी के स्वाभिमानपूर्ण बलिदान के विषय में हम सभी अवगत हैं ही ! इसके उपरांत अगले २ शताब्दियों के उपरांत बाबर नामक और एक हिंसक आक्रमणकारी हिन्दुस्थान की ओर बढा । उसके विषय में विस्तृत जानकारी इस लेख में आगे आई ही है ।

२. बाबर कौन था ?
अत्याचारी तुर्की शासक तैमूरलंग के ५ वें उत्तराधिकारी उमरशेख मिर्जा तथा उतना ही अत्याचारी चेंगीजखान के वंश की १४ वीं उत्तराधिकारी कुतलुग निगार खानम का लडका अर्थात जहिर उद-दिन मोहम्मद बाबर ! पिता की मृत्यु के उपरांत आयु के १२ वें वर्ष में उसे अधिकारपद प्राप्त हुआ । बेगा बेगम, आयेशा सुल्तान बेगम, जैनाब सुल्तान बेगम, मौसमा सुल्तान बेगम, महम बेगम, गुलरुख बेगम, दिलदार बेगम, मुबारका युरुफजई, गुलनार अघाचा, नाज्गुल अघाचा इस प्रकार उसके बेगमों की (पत्नियों की) ज्ञात सूची है । देहली के बादशहा इब्राहिम लोदी के विरुद्ध युद्ध घोषित कर बाबर का हिन्दुस्थान की राजनीति में प्रवेश हुआ । ‘पानिपत के पहले युद्ध’ के नाम से विख्यात लडाई में बाबर की सेना ने लोदी सेना को पराजित किया । उसके उपरांत बाबर हिन्दुस्थान में कुछ लूटमार कर निकल जाएगा, यह अपेक्षा थी; परंतु उसके मन में देहली के सिंहासन पर अधिकार स्थापित करने का विचार प्रबल हो चुका था । हिन्दुस्थान के उसके संभावित विस्तार में प्रमुख बाधा थे मेवाड नरेश महाराणा संग्राम सिंग अर्थात ही राणा संगा का ! राणा संगा तथा बाबर के मध्य बयाना एवं खानवा ये दो लडाईयां हुईं । दूसरी लडाई में बाबर के तोपखाने के सामने टिकने की क्षमता न होने से पराक्रम की पराकाष्ठा कर भी राजपूत सेना हार गई तथा बाबर की सत्तास्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ । इस लडाई के उपरांत बाबर ने मारे गए राजपूत सैनिकों के मस्तकों का ढेर (मिनार) तैयार कर स्वयं को ‘गाजी’ की उपाधि लगवा ली । जिहाद में सम्मिलित होकर गैरमुसलमानों को मार डालनेवाले व्यक्ति को ‘गाजी’ कहते हैं ।
२ अ. बाबर का चरित्र : बाबर के विषय में मराठी साधनों में जानकारी लेने पर पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती, अपितु केवल उसकी प्रशंसा की गाथा पढने को मिलती है । बाबर की मोहिनी से स्वयं रियासतकार देसाई भी अछूते नहीं रह पाए हैं; परंतु अन्य समकालीन साधनों का अध्ययन करने पर हमें बाबर का विकृत चरित्र देखने को मिलता है । आदिग्रंथ अथवा गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा किए गए वर्णनों को बाजू में भी रखा, तब भी बाबर ने ‘तुजुक-ए-बाबरी’ के नाम से स्वयं की आत्मकथा लिखी है । मूलतः चग्ताई भाषा के इस ग्रंथ का बाबर के पोते अकबर ने फारसी भाषा में अनुवाद करवा लिया, जो ‘बाबरनामा’ नाम से विख्यात है । इस ग्रंथ से भी वह अत्यंत नशाखोर, मदिराधीन एवं क्रूरकर्मी था, यह स्पष्टता से दिखाई देता है ।

२ आ. बाबर से लेकर अकबरतक रामजन्मभूमि के विषय में हुआ संघर्ष : ख्वाजा अब्बास एवं मुसा आशिकन आमी जलालशहा इन २ फकिरों ने बाबर को राणा संग के विरुद्ध जीतने का आशीर्वाद दिया था तथा उसके बदले में उन्होंने अयोध्या में मस्जिद निर्माण करने की मांग की थी । वास्तव में ये दोनों फकीर अयोध्या में श्यामानंदजी के शिष्य के रूप में रहे थे; परंतु अंततः उन्होंने अपने रंग दिखा ही दिए । राणा संग की पराजय के उपरांत अपना वचन पूर्ण करने हेतु बाबर ने उसके सेनापति मीर बाकी को अयोध्या स्थित राममंदिर को गिराकर वहां मस्जिद बनाने का आदेश दिया । उसे भी बडी सहजता से मस्जिद का निर्माण पूर्ण करने में सफलता मिली, ऐसा नहीं है । महताब सिंग, पंडित देवीदीन पांडे, राणा रणविजय एवं रानी जयराजकुमारीसहित अयोध्या के साधुओं एवं नागाओं, निर्मोही, निर्वाणी गोरक्ष इत्यादि अखाडों के महंतो ने समय-समय पर मीर बाकी का तीव्र प्रतिकार किया; परंतु अंततः ये सारे नायक पराजित हुए तथा अयोध्या में बाबरी का निर्मार्ण हुआ । जसवंत नाम एक ‘अवधी’ भाषा के कवी ने लगभग ७० कविताओं के माध्यम से यह संपूर्ण वर्णन कर रखा है । कवी जसवंत के रानी जयराजकुमारी के समकालीन होने का ‘अवधी’ भाषी अध्येताओं का मत है । बाबर के पुत्र हुमायूं तथा उसके उपरांत उसके पोते अकबर के सत्ता पर आनेतक भी रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए संघर्ष चल ही रहा था । अकबर ने इस संघर्ष का चतुराई से तोड निकाला । उसने एक विवादित स्थान पर एक चबुतरे का निर्माण कर ‘हिन्दू वहां पूजापाठ करें तथा कोई भी उसमें व्यवधान उत्पन्न न करें’, ऐसा शाही आदेश जारी किया । इसके कारण कुछ समय के लिए ही क्यों न सही; परंतु संघर्ष रुक गए । आगे जाकर यह ‘राम चबुतरा’ के रूप में जाना जाने लगा । इस काल में भी यहां संपूर्ण देश से ‘रामनवमी उत्सव’ के लिए लोग इकट्ठा होते थे, ऐसे समकालीन संदर्भ मिलते हैं । जहांगीर एवं शहाजहां ने भी आगे जाकर अकबर का ही मार्ग अपना लिया ।
३. धर्मांध औरंगजेब ने स्वयं ही ‘राम चबुतरा’ किया ध्वस्त !
उपरांत इन सभी पर हावी धर्मांध औरंगजेब देहली के सिंहासन पर बैठा तथा उससे यह चित्र ही बदल गया । औरंगजेब की क्रूरता का इतिहास तथा उसके द्वारा काशी एवं मथुरा इन हिन्दू तीर्थस्थलों को पहुंचाई हानि के संबंध में अनेक समकालीन कागदपत्र उपलब्ध हैं । इस औरंगजेब ने ‘राम चबुतरा’ ध्वस्त किया । बाबा वैष्णवदास के अनुरोध पर सर्वप्रथम यह कार्य करने चले सय्यद हसन अली की सेना को रोकने हेतु चले आए दशम गुरु गोविंदसिंहजी महाराज ने नाक में दम किया तथा उससे औरंगजेब का स्वप्न अधुरा रह गया; परंतु ऐसा ३ बार होने से अस्वस्थ औरंगजेब स्वयं अयोध्या पर आक्रमण करने आया तथा उसने ‘राम चबुतरा’ ध्वस्त किया । उसने ‘सीता की रसोई’ एवं ‘स्वर्गद़्वारम’ इन दो पवित्र स्थानों पर मस्जिदों का निर्माण किया । औरंगजेब के उपरांत बादशाही का महत्त्व उत्तरोत्तर अल्प होता चला गया ।
४. राघोबादादा पेशवा एवं सफदरजंग के मध्य का अनुबंध तथा नवाब वाजीद अली शाह के द्वारा अपनाई गई नीति
आगे जाकर १८ वीं शताब्द़ी में अयोध्या में नवाबों की सत्ता आई । नवाब सआदत अली खान से लेकर नवाब वाजीद अली शाहतक के कार्यकाल में भी अयोध्या को मुक्त करने के प्रयास जारी ही थे । अयोध्या के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला ने अफगाणी आक्रमण के विरुद्ध मराठों से सहायता मांगी । उस समय रघुनाथपंत उपाख्य राघोबादादा पेशवा एवं सफदरजंग के मध्य ‘अयोध्येसहित हिन्दुओं के ३ महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल हिन्दुओं को सौंपे जाएं’, इस आशय का अनुबंध हुआ । कागदपत्र पर हुआ यह अनुबंध वास्तव में नहीं उतरा । नवाब वाजीद अली शाह ने अबतक के शासकों की तुलना में भिन्न नीती अपनाई । उसने राममंदिर के प्रति हिन्दुओं की आस्था का सामंजस्य से विचार करना आरंभ किया; परंतु इसी काल में गुलाम हुसैन नामक एक सुन्नी फकीर ने मुसलमानों को ‘यह जिहाद ही है’, ऐसा कहकर उकसाना आरंभ किया । इससे यह प्रकरण और आगे बढा । इसी काल में रामजन्मभूमि हेतु और एक लडाई हुई ।
५. ब्रिटिशों के काल में रामजन्मभूमि हेतु हुआ संघर्ष
वर्ष १८५७ आरंभ हुआ । इस समय अयोध्या के हिन्द़ू-मुसलमान परस्पर मतभेदों को भूलाकर ब्रिटिशों के विरुद्ध कंधे से कंधा मिलाकर लडे; परंतु ब्रिटिशों ने यह लडाई तोड डाली तथा उसमें संलिप्त लोगों को दंड देते हुए रामजन्मभूमि हेतु प्रयासरत बाबा रामचरणदास तथा उनका विरोध करनेवाले अमीर अली इन दोनों को भी फांसी पर लटका दिया । यहां से आगे ब्रिटिशों ने अयोध्या प्रकरण की गुत्थी सुलझ ही पाए; इसकी ओर संपूर्ण ध्यान दिया । अनेक न्यायिक प्रक्रियाओं को देखकर हमें यह बडी सहजता से ध्यान में आता है ।
६. स्वतंत्रतापूर्व तथा स्वतंत्रता के उपरांत की न्यायालयीन लडाई
‘रामजन्मभूमि मुक्तिसंग्राम’ केवल रणभूमि में हुआ है, ऐसा नहीं है, अपितु वह न्यायप्रविष्ट लडाई भी है । २५ मई १८८५ में महंत रघुवरदास ने फैजाबाद के जिला न्यायालय में राममंदिर के लिए पहला अभियोग प्रविष्ट किया । ‘वर्षों से चली आ रहे पूजास्थल पर राममंदिर के निर्माण की अनुमति दी जाए’, यह उनकी मांग थी; परंतु ब्रिटिश सरकार ने यह मांग ठुकराते हुए यथास्थिति जारी रखने के लिए कहा । स्वतंत्रता के उपरांत तो यह चित्र कहां बदला ? वास्तव में देखा जाएए तो वर्ष १९३४ के उपरांत बाबरी मस्जिद में नमाज नहीं पढी जाती थी; परंतु वर्ष १९४९ में अकस्मात ही ‘वहां नमाज पढने की अनुमति मिले तथा हिन्दू इस स्थान पर पूजापाठ बंद करें’, यह मांग होने लगी । इस समय मुसलमानों एवं हिन्दुओं इन दोनों को वहां धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति दी गई ।‘२२ एवं २३ दिसंबर १९४९ की रात को विवादित वास्तु से प्रकाश आया तथा उस दैवीय प्रकाश में एक तेजस्वी बालक का चेहरा दिखाई दिया’, ऐसा वास्तु के रक्षाकर्मी अब्दुल बरकत ने न्यायालय के सामने शपथपूर्वक बताया । इसी प्रसंग के उपरांत वहां रामलला का विग्रह प्रकट हुआ, जिसे आगे जाकर ‘रामलला विराजमान’ कहा जाने लगा । २९ दिसंबर १९४९ को न्यायाधीश के.के. नायर ने उस स्थान को ‘विवादित स्थान’ घोषित कर अनुच्छेद १४५ के अनुसार उसका नियंत्रण अपने पास (न्यायालय के पास) लिया । १६ जनवरी १९५० को ठाकुर गोपालसिंह विशारद ने अभियोग प्रविष्ट किया । उसमें ‘अनुमति होते हुए भी कोई मुसलमान बाबरी में नमाज पढने के लिए नहीं आता, तथापि उसके विपरीत हम हिन्दू विगत १६ वर्षों से निरंतर पूजा-अर्चना कर रहे हैं; इसलिए यह भूमि हमें मिले । प्रतिवादी मूर्ति को नहीं हिला सकते’, यह आदेश देने की मांग भी उसमें की गई । उसे मान्यता मिली । ५ द़िसंबर १९५० को महंत रामचंद्र परमहंस ने और एक दावा प्रविष्ट किया । उसमें ‘विवादित स्थान हिन्दू धर्मस्थान होने का स्वीकार कर उसे हिन्दुओं को सौंपा जाए’, यह मांग की गई । इस अभियोग को ठाकुर गोपालसिंह विशारद के अभियोग से जोडा गया ।
उसके १२ वर्ष की लंबी अवधि के उपरांत १८ दिसंबर १९६१ को सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित स्थान पर अपना दावा करनेवाला अभियोग प्रविष्ट किया । वास्तव में देखा जाए, तो ‘भारतीय समयसीमा अधिनियम’ (इंडियन लिमिटेशन एक्ट) के अनुसार ‘इतनी लंबी अवधि के पश्चात दावा करना गैरकानूनी था’; परंतु तब भी यह अभियोग आरंभ हुआ । वास्तव में इस भूमि के संबंध में सुन्नी वक्फ बोर्ड की कुछ भूमिका होने का कोई संबंध ही नहीं था; क्योंकि वर्ष १९४६ में वक्फ बोर्ड द्वारा गठित समिति ने ‘प्रस्तुत वास्तु शिया वास्तु है’, ऐसा बताया था; परंतु अयोध्या के विषय में प्रविष्ट किए गए इस अभियोग की कार्यवाही ही आगे जारी रही तथा अंततः वर्ष २०१० में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस अभियोग के विषय में स्वयं निर्णय देकर रामजन्मभूमि के एक तिहाई विभाजन का निर्णय दिया । इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई तथा माननीय मुख्य न्यायाधीश की घोषणा के अनुसार जनवरी २०१९ से इस अभियोग की सुनवाई का कार्य आरंभ हुआ ।
७. बाबरी ढांचा को गिराने हेतु की गई कारसेवा तथा उसकी पृष्ठभूमि
‘कारसेवा’ शब्द मूलतः संस्कृत शब्द ‘करसेवा’ अर्थात ही ‘स्वयं के हाथों से की गई सेवा’ शब्द का अपभ्रंश है । १९ फरवरी १९८१ को तमिलनाडू के मीनाक्षीपूरम् में सैंकडों हिन्दुओं का बलपूर्वक धर्मांतरण कर उन्हें मुसलमान बना दिया गया । संपूर्ण देश में इस घटना की क्षोभजनक प्रतिक्रियाएं व्यक्त हुईं । वर्ष १९६४ में स्थापित विश्व हिन्दू परिषद में इस उपलक्ष्य में संपूर्ण देश में धर्मांतरण के विरुद्ध जनजागरण करने हेतु ‘विशाल हिन्दू सम्मेलन’ आयोजित करना आरंभ किया । ६ मार्च १९८३ को आयोजित ऐसे ही एक विराट हिन्दू सम्मेलन में कांग्रेस के नेता दाऊ दयाल खन्ना ने काशी, मथुरा एवं अयोध्या इन धर्मस्थलों की मुक्ति का प्रस्ताव रखा । उन्होंने इस संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर सूचित किया । स्वाभाविक ही इस पत्र की अनदेखी की गई । सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करनेवाले लोहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल, के.एम. मुंशी, डॉ. राजेंद्रप्रसाद के पदचिन्हों पर चलना कांग्रेस ने कब का बंद कर दिया था । कांग्रेस में ‘गांधी’ उपनाम के एकाधिकार का काल आरंभ हो चुका था । इसमें विशेष बात यह थी कि शियाा नेता डॉ. हुजूर नवाब ने खन्ना की इस मांग का खुला समर्थन किया ।
७ अ. ‘रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’ की स्थापना : वर्ष १९८४ में प्रथम ‘धर्मसंसद’ संपन्न हुई तथा उसी समय ‘रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’की स्थापना की गई । गोरक्ष पीठाधीश महंत अवैद्यनाथ को समिति का अध्यक्ष चुना गया । इस समयतक अयोध्या के मंदिर में केवल पुजारियों तथा उनके सहयोगियों को ही केवल पूजा के लिए जाने की अनुमति थी । अन्य समय पर वहां ताला लगाया जाता था । सितंबर १९८४ में ‘श्रीराम-जानकी यात्रा’ तथा तत्पश्चात ‘ताला-खोलो आंदोलन’ चलाया गया । मार्च १९८५ में कांग्रेस के तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को यह चेतावनी दी गई, ‘अगले एक वर्ष में सरकार यदि ताला न खोलेगी, तो ताला तोडा जाएगा’ विशेष बात यह कि इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात सत्ता में आए राजीव के कार्यकाल में न्यायिक सूत्र में हलचल हुई तथा १ फरवरी १९८६ को ताला खोलने का आदेश दिया गया । अर्थात यह भी श्रद्धा अतवा सत्य के भान से उत्पन्न परिवर्तन नहीं था, अपितु शहाबानो प्रकरण के उपरांत हिन्दुओं को प्रसन्न रखने हेतु राजीव गांधी द्वारा खेली गई कूटनीति थी । सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस निर्णय के विरुद्ध भी तत्काल न्यायालय का द्वार खटखटाया; परंतु उसका कोई उपयोग नहीं हुआ ।
७ आ. मुसलमान नेताओं द्वारा भडकाऊ भाषण देते हुए ‘जिहाद’ के नारे लगाए जाना : वर्ष १९८७ में विश्व हिन्दू परिषद ने हिन्दू-सीख एकता हेतु सद़्भावना यात्रा आरंभ की, तो दूसरी ओर शहाबानो प्रकरण के उपरांत मुसलमान कट्टरपंथीय विषवमन करने लगे थे । ३० मार्च १९८७ को देहली के बोट क्लब पर सभा की गई । इस सभा में शाही इमामसहित (मस्जिद में प्रार्थना करा लेनेवाले प्रमुखोंसहित) अन्य अनेक मुसलमान नेताओं ने अत्यंत भडकाऊ भाषण देकर ‘जिहाद’ का नारा लगाया । अगली कुछ अवधि में ही इसके दुष्परिणाम दिखाई दिए । मेरठसहित अनेक क्षेत्रों में दंगे भडके । इसमें ध्यान में लेनेयोग्य सूत्र यह है कि भडकाऊ भाषण देनेवालों पर कोई कार्यवाही नहीं की गई । क्या तब के तथा आज की स्थिति में बहुत अंतर है ?
७ इ. रामजन्मभूमि के स्थान पर शिलान्यास का कार्यक्रम संपन्न होना : इस वातावरण में जनवरी १९८९ मध्ये प्रयागराज में आयोजित तृतीय धर्मसंसद में ‘३० सितंबर १९८९ को सभी गांवों में ‘श्रीराम शीलापूजन’ का कार्यक्रम होगा तथा ९ नवंबर १९८९ को अयोध्या में शिलान्यास का कार्यक्रम संपन्न होगा’, यह घोषणा की गई । इस अवधि में शिया मुसलमानों द्वारा ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड ने पुनः विवादित भूमि को हिन्दुओं को सौंपने का आवाहन किया । अब राममंदिर का सूत्र भारतीय जनता पार्टी की कार्यक्रमपत्रिका पर आ गया । शिलान्यास के कार्यक्रम में बाधा उत्पन्न करने के सरकारी प्रयास आरंभ हुए । इन सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त करते हुए ९ नवंबर १९८९ को शिलान्यास का कार्यक्रम संपन्न हुआ । शिलान्यास तो हुआ; परंतु मंदिर निर्माण का क्या ? प्रशासन की ओर से ‘न्यायालय का आद़ेश न मिलने से ऐसा कोई भी कदम न उठाया जाए’, ऐसा बताया जा रहा था । तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के भी सूर बदले-बदले से दिखाई दे रहे थे ।
७ ई. समाजवादी दल के मुलायमसिंह यादव ने दिखाई क्रूरता : इसी अवधि में भाजपा नेता लालकृष्ण अडवानी ने सोमनाथ से अयोध्यातक रथयात्रा निकाली । अडवानी को गिरफ्तार किया गया । अगले संपूर्ण वर्ष में अनेक घटनाएं हुईं तथा अंततः ‘अक्टूबर १९९० में कारसेवक अयोध्या में पुनः इकट्ठा होंगे’, ऐसा सुनिश्चित हुआ । इस समय मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव ने ‘अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता ।’(पक्षी भी उड नहीं सकेगा), ऐसा कहा; परंतु तब भी ३० अक्टूबर १९९० को पुलिस प्रशासन को चकमा देकर कारसेवक अयोध्या में एकत्रित हो ही गए । उस समय कोठारी भाईयों ने बाबरी पर भगवा फहराया । इन सभी घटनाओं के उपरांत पुलिस को कारसेवकों पर आक्रमण करने के आदेश दिए गए । आंसू गैस एवं गोलीबारी आरंभ हुई । उससे कारसेवक के रक्त से शरयु नदी का पानी लाल बन गया । मुलायमसिंह सरकार ने निहत्थे रामभक्त कारसेवकों पर गोलियां चलाने की शूरता दिखाई । यह सब करते समय कारसेवकों की आयु का भी ध्यान नहीं रखा गया । कोठारी भाईयों को ऐन युवावस्था में ही मार डाला गया । ‘बीबीसी’ द्वारा प्रसारित समाचार के अनुसार लगभग ५०० से अधिक कारसेवकों को मारा गया । संपूर्ण देश से इस हत्याकांड के प्रति अप्रसन्नता के सूर प्रकट हुए । अनेक स्थानों पर पूर्व सेना के अधिकारियों की पत्नीयों ने भी इस हत्याकांड के विरुद्ध फेरियां निकाली ।
७ उ. अंततः बाबरी का ढांचा जमीदोंज ! : इस संपूर्ण घटना के उपरांत रामजन्मभूमि आंदोलन और अधिक तीव्र बना । अप्रैल १९९१ की धर्मसंसद तथा उसके उपरांत बोट हाऊस पर की गई सभा से रामजन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण का संकल्प पुनः एक बार दोहराया गया । तबतक केंद्र में कांग्रेस के पी.वी. नरसिंह राव, जबकि उत्तर प्रदेश में भाजपा की कल्याणसिंह की सरकार सत्ता में आई थी । सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में कोई भी अप्रिय घटना न हो, इसके लिए निर्देश दिए थे । राममंदिर के संबंध में किसी भी प्रकार की सक्रियता नहीं दिखाई दे रही थी । ऐसे में ही ५ वीं एवं ६ ठी धर्मसंसद संपन्न होकर वर्ष १९९२ आ गया ।
राव सरकार को पुनः अयोध्या के विषय में पूछे जाने पर प्रशासन के नैतिक उत्तरदायित्व आदी के कारण आगे किए गए । कुल मिलाकर प्रशासन के रूख को ध्यान में लेते हुए विश्व हिन्द़ू परिषद की ओर से पुनः एक बार ६ दिसंबर १९९२ को ‘कारसेवा’ की घोषणा की गई तथा इसी दिन विवादित ढांचे के तीनों गुंबज जमींदोज किए गए ।
८. ‘राम दीपावली’ को महत्तम अर्थ प्राप्त होने हेतु
विवादित वास्तु समतल हुई; परंतु वैसा होने से विवादित भूमि के प्रश्न का समाधान निकालनेवाला नहीं था । उसका समाधान होनेवाला था न्यायालय में ! दिवानी न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालयतक की यात्रा पूर्ण कर रामलला ने स्वयं का अधिकार का स्थान प्राप्त किया है । इस अविरत संघर्ष की पूर्णता हमें देखने को मिलना, इसके जैसा आनंददायक क्षण हिन्द़ुओं के लिए और कौनसा होगा ? परंतु मंदिर निर्माण का आनंद मनाते समय रामकार्य के लिए बलिदान दिए प्रत्येक हुतात्मा को वंदन करना तथा उसके लिए मूलरूप से ही यह संघर्ष ज्ञात होना प्रत्येक हिन्दू को कर्तव्य है, तभी जाकर जनवरी में मंदिर के उद्घाटन के उपलक्ष्यम में मनाई जानेवाली ‘राम दीपावली’ को महत्तम अर्थ प्राप्त होगा ।
– डॉ. सच्चिदानंद शेवडे, हिन्दुत्वनिष्ठ व्याख्याता तथा वैद्य परीक्षित शेवडे, आयुर्वेद वाचस्पति, डोंबिवली, मुंबई (१८.११.२०२३)
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