
चित्रदुर्ग (कर्नाटक) – श्री गणपति की स्तुति करना अंधश्रद्धा है । बसवण्णा (लिंगायत समाज के संस्थापक) का वचन प्रस्तुत करना ही खरी प्रार्थना है । (लिंगायत पंथ हिन्दू धर्म का ही एक अंश है; परंतु शिवाचार्य जैसे कथित स्वामी हिन्दुओं की देवताओं को अंधश्रद्धा कहकर लिंगायत पंथियों को हिन्दू धर्म से दूर ले जाने का प्रयत्न कर रहे हैं ! – संपादक) कार्यक्रम के आरंभ में उनके वचन गा सकते है, ऐसा वक्तव्य पंडिताराध्य शिवाचार्य स्वामी ने यहां पर राष्ट्रीय नाट्यमहोत्सव के उदघाटन समारोह में ध्वजारोहण के पश्चात दिया ।
स्वामीजी ने कहा कि श्री गणपति एक काल्पनिक देवता हैं । स्वतंत्रता आंदोलन के निमित्त से इस देवता का जन्म हुआ है । बाह्य वस्तुओं से निर्मित देवता, देवता नहीं हैं । घर में अथवा किसी भी समारोह में प्रथम श्री गणपति पूजन, स्तोत्र और श्लोक पठन करना, ऐसी अनेक लोगों की श्रद्धा है । इसके स्थान पर बसवण्णा के वचनों का प्रार्थना के रूप में पठन करना चाहिए । (प्रत्येक व्यक्ति अपनी श्रद्धानुसार देवता के प्रति भाव रखता है । उसे अनुमति न देने की अपेक्षा ‘मैं’ जो बताऊंगा, वही करने का आग्रह करना अहंकार ही है ! – संपादक) स्वसामर्थ्य, उत्तम प्रथाएं, आचरण से युक्त ही खरे देवता होते हैं । स्वयं पर अपना विश्वास होना चाहिए ।
संपादकीय भूमिकासस्ती लोकप्रियता के लिए ऐसे वक्तव्य तथाकथित स्वामी करते रहते हैं, इसीका यह एक उदाहरण ! ऐसे लोगों पर अपराध प्रविष्ट कर उनपर कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए ! |
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