
स्वतंत्रता मिलने से पूर्व भारत में चल रही ब्रिटिशों की सत्ता के कारण देश के संविधान पर उनका प्रभाव है । भले ही ऐसा हो; परंतु तब भी भारत ने लोकतंत्र को स्वीकार किया है । मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन ने कुछ दिन पूर्व ही एक निजी कार्यक्रम में बोलते हुए ‘जिस समय भारत का संविधान अस्तित्व में आया, उस समय जनसंख्या के मूल ढांचे में परिवर्तन हुआ, तो संविधान का अस्तित्व नष्ट हो जाएगा’, ऐसा वक्तव्य देकर ‘संविधान बनाते समय जनसंख्या का जो मूल ढांचा अथवा स्वरूप अस्तित्व में था, उसमें परिवर्तन नहीं चलेगा’, ऐसा कहा । इस अवसर पर उन्होंने ‘मैं न्यायाधीश हूं; इसलिए मैं इस विषय पर अधिक कुछ नहीं बोल सकता’, इस प्रकार अपनी मर्यादा भी व्यक्त की । न्यायतंत्र में काम कर रहे अनेक लोगों को न्यायाधीश स्वामीनाथन के इस वक्तव्य का अनुभव नियमित रूप से आता होगा; परंतु उसे स्वीकारने का साहस कुछ मात्रा में ही क्यों न हो; उन्होंने इसे दिखाया, जो सरल नहीं है ! न्यायाधीश स्वामीनाथन ने जो कुछ भी बोला, वह अनदेखी करने योग्य नहीं है । उन्होंने जो काला कोट पहना है, उसके कारण उनके बोलने पर मर्यादाएं अवश्य होंगी; परंतु ‘संविधान अस्तित्व में रहा, तभी जाकर उनका काला कोट सुरक्षित रह सकेगा’, इस बात को हमें समझना होगा । भले ही ऐसा हो; परंतु उन्होंने संविधान के अस्तित्व का जो विषय छेडा है; उस पर गंभीरता से चर्चा करनी ही पडेगी ।

प्रत्येक देश की संस्कृति एवं परंपराओं के प्रतिबिंब उस देश के कानून, व्यवस्था तथा संविधान पर भी पडते हैं । भारत में विवाहबाह्य संबंधों को अनैतिक माना जाता है; क्योंकि भारतीय संस्कृति में स्त्री के शील का महत्त्व है । कोई पतिव्रता स्त्री मृत्यु स्वीकार कर लेगी; परंतु अपना शील भ्रष्ट नहीं होने देगी; परंतु पाश्चात्य देशों में ऐसी घटनाएं ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर चलती रहती हैं तथा उसे सीधे राजमान्यता भी दे दी जाती है । यह है वहां की व्यवस्था पर राष्ट्र की संस्कृति का प्रभाव ! उसके कारण ब्रिटेन एवं भारत इन दोनों ही देशों में लोकतंत्र है; परंतु उसकी संकल्पनाएं वहां की संस्कृति के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं । यहां हम इतना ही समझेंगे कि संस्कृति में परिवर्तन आने पर वहां की व्यवस्था में भी परिवर्तन आता है । इसका अर्थ स्पष्ट है कि भारतीय परंपराएं एवं संस्कृति माननेवाले नागरिकों की जनसंख्या अल्प हुई, अथवा उसे न माननेवाले शासनकर्ता यदि सत्ता में आए, तो उससे संविधान प्रभावित हो सकता है । ‘भारत की संस्कृति एवं परंपराओं को माननेवाले अन्य कोई नहीं, अपितु हिन्दू हैं’, यह वास्तविकता है । यहां किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की बात नहीं है, अपितु रामायण एवं महाभारत के काल से लेकर जो संस्कृति चली आ रही है, वह हिन्दुओं की ही संस्कृति है, यह सत्य है । न्यायाधीश स्वामीनाथन के कंधों पर तथाकथित ‘सेक्युलर’वाद का दायित्व होने के कारण ‘हिन्दू’ शब्द का उच्चारण करते ही वे कट्टरतावादी प्रमाणित कर दिए जाएंगे; किंतु हिन्दुओं को उनकी बातों में निहित अर्थ समझना होगा ।
जनसंख्या का ढांचा परिणाम करता ही है !

भारत के प्रतिष्ठानों को इस्लामी राष्ट्रों में वस्तुओं का निर्यात करते समय हलाल प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य है । देश से विदेशों में निर्यात करने के लिए भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत ‘अन्न सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण’ (FSSAI), साथ ही महाराष्ट्र राज्य में ‘अन्न एवं औषधीय प्रशासन’ (FDA) की मान्यता आवश्यक होते हुए भी मुसलमानों ने उनकी स्वतंत्र अर्थव्यवस्था आरंभ की । भारत में अभी हलाल प्रमाणपत्र की अनिवार्यता लागू नहीं है; क्योंकि देश का संविधान उसे मान्यता नहीं देता; परंतु कानून की चौखट में बद्ध न हो; इस पद्धति से मुसलमानों ने भारत में हलाल प्रमाणपत्र व्यवस्था आरंभ की । आप विचार कीजिए कि यदि भारत की जनसंख्या के ढांचे में परिवर्तन हुआ, तो इस देश में हलाल प्रमाणपत्र अनिवार्य होने में समय नहीं लगेगा । हलाल प्रमाणपत्र केवल उसका एक उदाहरण है । भारत की जनसंख्या के ढांचे में परिवर्तन हुआ, तो उससे देश की सभी व्यवस्थाओं में इस्लामीकरण का संकट उत्पन्न होगा । न्यायाधीश स्वामीनाथन को निश्चित रूप से देश को इसी संकट से अवगत कराना है । इससे पूर्व कुछ मुसलमान संगठनों ने केरल में शरिया कानून के अनुसार बैंकिंग सेवा आरंभ करने की अनुमति मांगी थी । ‘इस्लाम में ‘ब्याज देना’ ‘हराम’ माना जाता है । रिजर्व बैंक एवं केंद्र शासन के द्वारा इसकी अनुमति न देने के कारण इस्लामी बैंक आरंभ नहीं हो सकता; परंतु कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इस्लामी बैंक सेवा आरंभ करने पर विचार चल रहा था । इसके कारण भविष्य में इस्लामी बैंक अथवा हलाल प्रमाणपत्र व्यवस्था का प्रचालन न होना, तभी संभव है; जब यहां की जनसंख्या का एक बडा वर्ग भारतीय संस्कृति को माननेवाला हो ।
…तो क्या भारत धर्मनिरपेक्ष बना रह पाएगा ?

न्यायाधीश स्वामीनाथन को ‘भारत मुसलमान बहुल होने से यहां धर्मनिरपेक्ष प्रणाली का अस्तित्व नहीं रहेगा’, यह बताना है; परंतु उनकी मर्यादाओं के कारण वे इसे खुलेआम बोल नहीं सकते । जिन-जिन लोगों ने अपने शरीर पर धर्मनिरपेक्ष प्रणाली के वस्त्र पहन रखे हैं, उनके द्वारा वैसे बोलना संविधान की मर्यादा का उल्लंघन माना जाता है; परंतु सर्वप्रथम ‘संविधान ही राष्ट्र का अस्तित्व टिकाए रखने के लिए है’, इसे समझना होगा । ‘बहुसंख्यक होने पर भी मुसलमान धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को स्वीकार करेंगे’, ऐसा जिन्हें लगता है, वे लोग ‘इस्लामी बैंकिंग’ एवं ‘हलाल प्रमाणपत्र’ के उदाहरण अपने सामने लाएं । इसका अर्थ स्पष्ट है कि भारत में मुसलमानों के बहुसंख्यक होने से ‘भारत इस्लामी राष्ट्र होगा’, यह बताने के लिए किसी ज्योतिष की आवश्यकता नहीं है । इसलिए ‘भारत इस्लामी, ईसाई, बौद्ध अथवा हिन्दू राष्ट्र बने’, ऐसा बोलना ‘संविधान का अनादर है’, ऐसा कुछ लोगों को लगता है; परंतु तथाकथित बुद्धिजीवी यह समझ लें कि जब ‘सेक्युलर’ (धर्मनिरपेक्षता) नाम का जन्म भी नहीं हुआ था, तब से भारत में संपूर्ण पृथ्वी के कल्याण के लिए ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की संकल्पना का पालन किया जा रहा है !
| भारत मुसलमानबहुल हुआ, तो क्या वह ‘सेक्युलर’ रह पाएगा ?, इस पर तथाकथित ‘सेक्युलर’वादी विचार करें ! |
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