भारत एवं पाकिस्तान के मध्य सितंबर १९६० में ‘सिंधु जल समझौता’ हुआ । इस समझौते के अनुसार भारत एवं पाकिस्तान के मध्य सिंधु नदी एवं उसकी उपनदियों के जल की आपूर्ति का बंटवारा नियंत्रित किया जाता है । विगत ६२ वर्षाें के इतिहास में पहली बार ही भारत ने पाकिस्तान को सिंधु जल समझौते में सुधार करने के लिए नोटिस भेजा है । इस पृष्ठभूमि पर सिंधु नदी जल बंटवारा समझौते की पृष्ठभूमि तथा भारत ने पाकिस्तान को नोटिस क्यों भेजा ?, इस विषय में एक गहन एवं विश्लेषणात्मक लेख दे रहे हैं ।

१. भारत द्वारा विश्व बैंक को नोटिस की प्रति भेजने का कारण
भारत ने पाकिस्तान को जल बंटवारे के विषय में भेजे गए नोटिस की एक प्रति इस समझौते के तीसरे पक्ष विश्व बैंक को भी भेजी है । ऐसा करने का कारण यह है कि विश्व में एक देश से दूसरे देश में बहनेवाली लगभग २०० नदियां हैं । इन नदियों के जल के बंटवारे के संबंध में विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न समझौते हुए हैं तथा उस संबंध में अनेक संघर्ष एवं विवाद के भी विषय हैं । उदाहरण ही लेना हो, तो कुछ नदियों का उद्गम चीन में है तथा वे बहती हुई भारत आती हैं । चीन अधिकांश बार इन नदियों का जल तथा बाढ के संदर्भ में भारत को जानकारी नहीं देता । इसके विपरीत ‘ब्रह्मपुत्र’ चीन की सबसे बडी नदी है, जो भारत में प्रवेश करती है । इसी स्थान पर चीन ने एक विशाल बांध का निर्माण आरंभ कर दिया है, तो चीन कुछ नदियों के प्रवाह बदलने का प्रयास कर रहा है । एक ओर जहां चीन भारत के साथ इस प्रकार व्यवहार कर रहा है, तो दूसरी ओर हम पाकिस्तान के साथ अत्यंत संयम के साथ व्यवहार कर रहे हैं ।
२. सिंधु नदी के जल बंटवारे की पृष्ठभूमि
सितंबर १९६० में भारत एवं पाकिस्तान के मध्य ‘सिंधु नदी जल बंटवारा समझौता’ हुआ । यह समझौता ६ नदियों के संदर्भ में है । इनमें से ३ नदियां जम्मू-कश्मीर से, जबकि शेष ३ नदियां पंजाब से पाकिस्तान जाती हैं । इन नदियों का विभाजन पूर्व एवं पश्चिम वाहिनी, इन २ पद्धतियों से किया गया है । यह समझौता प्रमुखता से विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ है । इन बैंकों के अधिकारियों ने भारत यात्रा के उपरांत इस संदर्भ में शोध करके कुछ लेख लिखे थे । उससे एक वातावरण तैयार होकर यह समझौता हुआ । भारत एवं पाकिस्तान की स्वतंत्रता के उपरांत इस मांग ने जोर पकड लिया । वर्ष १९४७ में पाकिस्तान ने जब भारत पर आक्रमण किया, उस समय हमने इन नदियों का जल रोकने का प्रयास किया था, जिससे एक बडा विवाद भी सामने आया था । उसके कारण वर्ष १९४८ में दोनों देशों में एक समझौता हुआ । इस समझौते में ‘भारत से पाकिस्तान में बहनेवाली नदियों के जल का उपयोग करने के लिए भारत प्रतिवर्ष एक विशिष्ट शुल्क लेगा’, ऐसा प्रावधान किया गया । इसका अर्थ यही है कि यह जल पाकिस्तान को निःशुल्क नहीं मिलेगा’, ऐसा स्पष्टता से सुनिश्चित किया गया, तथापि वर्ष १९६० में किए गए समझौते में शुल्क लगाने का कोई प्रावधान नहीं है तथा इस समझौते पर भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब खान के हस्ताक्षर हैं । उसके कारण ‘यह समझौता पाकिस्तान के लिए अनुकूल एवं भारत के उदार अंतःकरण का दर्शन करानेवाला है’, ऐसा कहा गया । विशेष बात यह कि उसमें इस समझौते को तोडने का कोई प्रावधान नहीं है । साथ ही उसमें यह भी प्रावधान है कि पानी रोकने के लिए भारत इन नदियों पर बडी परियोजनाएं नहीं बनाएगा ! पाकिस्तान द्वारा भारत के साथ ३ बार युद्ध करने पर भी अभी तक भारत ने यह समझौता अक्षुण्ण रखा है ।
३. पाकिस्तान में बहनेवाली नदियों के प्रति भारत का उदार दृष्टिकोण
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए, तो ये नदियां भारत से पाकिस्तान जाती हैं । भारत ऊपर की ओर अर्थात ‘अपर रिपारियन’ (नदी तट के ऊपरी क्षेत्र में) तथा पाकिस्तान लोअर (निचले) रिपारियन में है । ऊपर की ओर स्थित देश को सदैव अधिक अधिकार होते हैं । उदाहरण लिया जाए, तो ब्रह्मपुत्र नदी के संदर्भ में चीन ऊपरी, ततथा भारत निचली ओर है । ब्रह्मपुत्र चीन से बहते हुए भारत आती है । चीन ने भारत से बिना पूछे ब्रह्मपुत्र नदी पर अनेक बांध बनाए हैं तथा चीन उस जल का प्रचुर मात्रा में उपयोग कर रहा है । उसकी तुलना में इन नदियों पर भारत का बहुत बडे स्तर पर अधिकार होते हुए भी उसने उदार दृष्टिकोण अपनाकर पाकिस्तान को जल देने का निर्णय लिया । इस समझौते में अंतर्भूत पश्चिम वाहिनी नदियों का ८० प्रतिशत जल का उपयोग करने का अधिकार पाकिस्तान को प्रदान किया गया है, जबकि भारत २० प्रतिशत जल का उपयोग कर सकता है; परंतु पूर्ववाहिनी नदियों पर भारत को जल के उपयोग के अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं । महत्त्वपूर्ण बात यह कि भारत पश्चिम वाहिनी नदियों से उसके पाले में मिलनेवाले २० प्रतिशत जल का भी संपूर्ण उपयोग नहीं करता । इन नदियों पर छोटे बांध न बनाए जाने के कारण आज के समय में इस २० प्रतिशत जल में से भारत केवल ५ प्रतिशत जल का ही उपयोग कर रहा है । इसका अर्थ यही है कि पाकिस्तान ९५ प्रतिशत जल का उपयोग कर रहा है । सिंधु नदी जल बंटवारे जैसा समझौता विश्व के किसी भी देश में हुआ हो, ऐसा दिखाई नहीं देता ।
४. भारत ने पाकिस्तान को नोटिस क्यों भेजा ?
सिंधु नदी जल बंटवारा समझौते के अनुसार भारत को कुछ शर्तों पर पश्चिम में स्थित नदियों पर ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजना के द्वारा जल ऊर्जा निर्मिति के अधिकार दिए गए हैं । किशनगंगा (नीलम) एवं रातले जल-ऊर्जा परियोजनाएं भारत के जम्मू एवं कश्मीर की पश्चिमी नदियों पर हैं; परंतु पाकिस्तान ने इसका विरोध किया है । वर्ष २०१५ में पाकिस्तान ने इस परियोजना के संदर्भ में तांत्रिक आपत्तियों की जांच करने के लिए तटस्थ विशेषज्ञों की नियुक्ति करने का अनुरोध किया था; परंतु वर्ष २०१६ में उसने यह अनुरोध एकतरफा वापस लेकर न्यायालय से इसका निर्णय मिलने की मांग की । पाकिस्तान द्वारा की गई यह एकतरफा कार्यवाही सिंधु जल समझौते की धाराओं का उल्लंघन करनेवाली है । उसके कारण ही भारत ने इस सूत्र को तटस्थ विशेषज्ञों को भेजने का अनुरोध किया । भारत में भले ही बातचीत के माध्यम से बार-बार समाधान निकालने के प्रयास किए गए हों; परंतु वर्ष २०१७ से २०२२ की अवधि में सिंधु कमिशन की ५ बैठकों में पाकिस्तान ने बातचीत करना अस्वीकार कर दिया । इस प्रकार पाकिस्तान की ओर से सिंधु जल समझौते में समाहित प्रावधानों का निरंतर उल्लंघन करने के कारण भारत को सिंधु जल समझौते में सुधार करने के लिए नोटिस देने पर बाध्य होना पडा ।
इसका एक अन्य कारण यह है कि वर्ष २०१३ से भारत ८५० मेगावाट बिजली निर्माण परियोजना बनाने की प्रक्रिया में है । भारत ने वर्ष २०२१ से इस परियोजना के लिए लगभग ५ सहस्र करोड रुपए की राशि का प्रावधान कर इस परियोजना के कार्य को गति प्रदान की । पाकिस्तान के द्वारा आयोग की मांग करने के पीछे ‘यह परियोजना लंबित रहे’, यही उद्देश्य है । जब इस परियोजना का प्रस्ताव पारित हुआ, उस समय के व्यय की तुलना की जाए, तो परियोजना का काम आरंभ होने से पूर्व ही यह व्यय १० सहस्र करोड रुपए से बढ गया है । उसमें भी अब पुनः आयोग की प्रक्रिया के कारण काम रोका जाता है, तो उससे व्यय अधिक बढकर भारत की हानि ही होनेवाली है । इसे ध्यान में लेकर भारत ने पाकिस्तान को सिंधु जल बंटवारा समझौते में सुधार करने का प्रस्ताव दिया है । इन सुधारों में इस प्रकार का संघर्षशील अथवा विवादित सूत्र उठा, तो उसके समाधान की प्रक्रिया सामान्य एवं सरल हो, ऐसी मांग की गई है; क्योंकि भारत की स्थिति यह है कि निष्पक्ष विशेषज्ञों का अध्ययन-विश्लेषण एवं आयोग की नियुक्ति, ये दोनों बातें एक ही साथ नहीं होंगी !
५. भारत के पास पाकिस्तान को झटका देने का एक अच्छा अवसर !
आज के समय में नदियों के जल बंटवारे के संदर्भ में जिन समस्याओं का सामना करना पड रहा है, वे ६० वर्ष पूर्व उत्पन्न नहीं हुई थीं । आज प्रौद्योगिकी में परिवर्तन आया है । उसके कारण एक प्रकार से अब यह समझौता कालबाह्य हो चुका है; परंतु पाकिस्तान के साथ इतना संघर्ष तथा पाकिस्तान के द्वारा भारत पर इतने आतंकी आक्रमण करने पर भी भारत ने इस समझौते के साथ अपनी प्रतिबद्धता नहीं छोडी है । भारत की सौजन्यशील भूमिका के कारण ही यह समझौता अभी तक टिका हुआ है । इस समझौते के संबंध में पाकिस्तान को कोई आपत्ति हो, तो उन्हें सामने रखने का अवसर दिया गया है । आज तक अपनी जनता के हित की चिंता किए बिना उदार दृष्टिकोण रखकर समझदारी दिखाकर यह जल पाकिस्तान को देकर एक प्रकार से हम उन पर उपकार ही करते आए हैं; परंतु उद्दंड पाकिस्तान को इसका बिल्कुल भी भान नहीं है । इसके विपरीत पाकिस्तान इस समझौते के संबंध में भारत की आलोचना ही कर रहा है । पाकिस्तान यदि इसी प्रकार की अडियल नीति अपनाता रहेगा, तो उससे उसे ही हानि पहुंचनेवाली है । आज पाकिस्तान की २५ प्रतिशत कृषि भारत से बहनेवाली नदियों के जल पर ही निर्भर है । पाकिस्तान के राजनेताओं का गढ माने जानेवाले पंजाब प्रांत के राजनेताओं की खेती भी इसमें अंतर्भूत है । उसके कारण इस उपलक्ष्य में भारत को पाकिस्तान को झटका देने का एक अच्छा अवसर मिला है । आज के समय में पाकिस्तान में बिजली की समस्या भी भीषण है । ऐसी स्थिति में यदि भारत ने अपने अधिकार के २० प्रतिशत जल का संपूर्ण उपयोग करने का मन बनाया तथा उसके लिए आवश्यक बांध की परियोजनाएं पूर्ण कीं, तो पाकिस्तान को उसका बहुत बडा मूल्य चुकाना पडेगा । आज के समय में इस जल का संपूर्ण रूप से उपयोग न करने के कारण जम्मू-कश्मीर की खेती, सिंचाई एवं उद्योगों के लिए जल अल्प पड रहा है । यह समस्या दूर हो सकती है, साथ ही इस अतिरिक्त जल का उपयोग कर बिजली के उत्पादन को गति मिल सकती है ।
– डॉ. शैलेंद्र देवळाणकर, विदेश नीति विश्लेषक (८.२.२०२३)
(साभार : डॉ. देवळाणकर का फेसबुक पेज)
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