
‘साधना में मन के स्तर पर होनेवाली अनुचित विचार-प्रक्रिया अधिक बाधक होती है । अंतर्मुखता के अभाव के कारण साधक को अपनी चूकें समझ में नहीं आतीं तथा वे चूकें मन के स्तर की चूकें होने के कारण अन्यों के ध्यान में भी नहीं आतीं । यह विचार प्रक्रिया अनुचित कृत्य के माध्यम से व्यक्त होती रहती है । इसलिए संबंधित साधक को ऐसे अनुचित कृत्य का भान कराते रहने से उसे अपनी अनुचित विचार प्रक्रिया का भान होने में सहायता मिलती है । उदा. के लिए एक साधक के मन में किसी अन्य साधक के प्रति पूर्वाग्रह अन्यों के ध्यान में नहीं आएगा; परंतु किसी प्रसंग में ‘किसी साधक को संभव होते हुए भी उसने दूसरे साधक की सहायता नहीं की’, यद्यपि वह कर सकता था, यदि उस साधक को इस अनुचित कृत्य का भान कराया गया, तो उसे समझ में आ सकता है कि ‘मैंने पूर्वाग्रह के कारण उस साधक की सहायता नहीं की ।’ उसके कारण साधना में स्थूल स्तर पर होनेवाली चूकें संबंधित साधक को बताना उसकी साधना के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है ।’
– (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले (३०.१२.२०२१)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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