
कश्मीरी शिविरों में स्थित विस्थापितों की दयनीय स्थिति के विषय में जम्मू स्थित ‘द शैडो’ दैनिक के वरिष्ठ पत्रकार किंग्ज सी भारती कहते हैं,
१. वर्ष १९९० में जिहादी आतंकियों ने सुसंस्कृत कश्मीरी हिन्दू समाज को कश्मीर से बाहर निकाल देने के लिए अमानवीय हत्याकांड आरंभ किए । उसके कारण उन्हें अपनी संपत्ति पर पानी फेरना पडा ।
२. एक समय में करोडों की संपत्ति रखनेवाले इन परिवारों पर अब विस्थापितों के शिविरों में जीवन व्यतीत करने की स्थिति आ गई है । लगभग ३.५ लाख कश्मीरी पंडित देहली और जम्मू के शिविरों में आज भी सड रहे हैं ।
३. प्रत्येक को १ शयनकक्ष और रसोईघर और ४ परिवारों के लिए १ शौचालय और स्नानगृह, इस प्रकार से इन शिविरों की रचना है ।
४. यहां की अपर्याप्त भूमि के कारण पारंपरिक एकत्रित परिवारपद्धति कब की नामशेष हो चुकी है । घर के किसी भी सदस्य को एकांत न मिलने के कारण इन परिवारों में तनाव और विवाहविच्छेद की घटनाएं बढ रही हैं ।
५. इन शिविरों में जन्मदर घट रही हैं; परंतु मृत्यदर बढ रही है ।
६. इन लोगों को अपने ही देश में अपने माथे पर विस्थापित की मुद्रा अंकित कर जीवन व्यतीत करना पड रहा है ।
विस्थापित हिन्दुओं को क्या भुगतना पड रहा है, यह इससे समझ में आता है । कल हम पर ऐसी स्थिति न आए, ऐसा लगता हो; तो इस विषय में समाज में जागृति लाना आवश्यक है ।
(संदर्भ : दैनिक ‘सनातन प्रभात’)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !