
मुंबई – नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु को ७७ वर्ष हो गए हैं; लेकिन जापान से उनकी अस्थियों को भारत लाना संभव नहीं हुआ । नेताजी सुभाषचंद्र बोस की लडकी के नाते मुझे नेताजी की अस्थियों को भारत में देखना है । मेरे पिता ने अपने देश पर जीवन से अधिक प्रेम किया । देश को स्वतंत्र देखना उनका स्वप्न था; लेकिन वे यह नहीं देख पाए । उनकी मृत्यु के बाद तो उनकी अस्थियों को उनके प्राणप्रिय देश में लाना चाहिए, ऐसी भावना नेताजी सुभाषचंद्र बोस की इकलौती लडकी अनीता बोस ने एक साक्षात्कार में व्यक्त की । २३ जनवरी के दिन नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती है ।
अनिता बोस ने आगे कहा कि, नेताजी सुभाषचंद्र बोस की स्वतंत्रता की लडाई में किए योगदान की ओर जानबूझकर अनदेखी की गई । काँग्रेस ने राजनीतिक दांवपेंच के रुप में देश की स्वतंत्रता का संपूर्ण श्रेय अहिंसात्मक आंदोलन को दिया; लेकिन आजाद हिन्द सेना के कारण ब्रिटिश सरकार डर गई थी । इस कारण आगे भारत पर शासन करना असंभव होगा इसका एहसास ब्रिटिश सरकार को हो गया था । इस दावे की पुष्टि करने वाले असंख्य कागजात उपलब्ध हैं ।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु का विवाद बंद होना चाहिए !
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु का विवाद अब बंद होना चाहिए । नेताजी की मृत्यु की अपेक्षा उनका जीवनकार्य, देशप्रेम का विचार कितना ही बडा है । उसकी याद रखने की आवश्यकता होने के विषय में अनिता बोस ने कहा ।
म. गांधी धूर्त राजनेता थे और वे उनके विचारों से सहमत न होने वालों को सबक सिखाते थे !

नेताजी सुभाषचंद्र बोस और म. गांधी के मतभेद जगजाहिर थे; तो भी नेताजी के मन में गांधीजी के प्रति सम्मान की भावना थी । फिर भी गांधीजी एक धूर्त राजनेता थे । उनके विचारों से सहमत न होने वालों को वे सबक सिखाते थे । इसके विपरीत नेताजी सरलमार्गी और स्पष्ट वक्ता थे । नेहरू की अपेक्षा नेताजी का योगदान बडा था ,इसका एहसास देशवासियों को है, ऐसा स्पष्ट अभिमत अनीता बोस जी ने व्यक्त किया ।
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