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मंदिरों से बिहार सरकार अब ४ प्रतिशत ‘कर’ वसूल करनेवाली है, यह संपूर्ण देश के हिन्दुओं के लिए लज्जाजनक है । हिन्दुओं के इतिहास में अभी तक ऐसा कभी नहीं हुआ था । इससे पूर्व भी देश के ४ लाख से अधिक मंदिरों का सरकारीकरण कर उनकी संपत्ति का व्यय अन्य कार्याें के लिए किया जा रहा है । अब यह दूसरा बडा आघात हिन्दुओं के मंदिरों पर हो रहा है । इसके विरोध में हिन्दुत्वनिष्ठ संगठन आंदोलन भी करेंगे; परंतु इसमें कितनी सफलता मिलेगी ? यह कह नहीं सकते । क्योंकि उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने चारधाम और गंगोत्री सहित ५१ मंदिरों का सरकारीकरण कर वहां ‘देवस्थानम बोर्ड’ स्थापित किया । इसका हिन्दुओं तथा मंदिरों के पुरोहितों ने प्रचंड विरोध किया । भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने सरकारीकरण न करने का आश्वासन भी दिया था; परंतु वह पूर्ण न करने के कारण उन्हें पदच्युत होना पडा । इसलिए राज्यकर्ता, सत्ताधारी कितने भी आश्वासन दें, तब भी हिन्दुओं के मंदिरों पर इस प्रकार के आक्रमण रुकने की संभावना अल्प ही है । महाराष्ट्र में तो मंदिर सरकारीकरण के पश्चात मंदिरों की संपत्ति में असंख्य घोटालें सामने आए हैं । पश्चिम महाराष्ट्र देवस्थान समिति के अंतर्गत आनेवाले मंदिरों की भूमि पर अतिक्रमण हुआ है । इसके पश्चात शासकों ने मंदिरों के पुरोहितों को हटाकर वहां ‘सरकारी’ पुरोहितों को नियुक्त किया । न्यायालय से हिन्दुओं को न्याय नहीं मिला । बिहार के मंदिरों के प्रकरण में भी हिन्दुओं को कितना न्याय मिलेगा ? राजकीय लाभ के लिए मंदिरों को पर्यटनस्थल बनानेवाले कांग्रेस के राहुल गांधी इस संबंध में कुछ बोलेंगे, इसकी संभावना अल्प ही है ।

चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारा, बुद्ध विहार आदि पर कर नहीं !
उत्तराखंड में विहिंप ने सरकारीकरण का विरोध किया है । इसलिए ऐसे संगठनों द्वारा बिहार सरकार को यह निर्णय निरस्त करने हेतु बाध्य करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए । अन्य छोटे-बडे हिन्दुत्वनिष्ठ संगठन, हिन्दुत्वनिष्ठ अधिवक्ता आदि को कानूनी रूप से न्यायालय में विरोध करना चाहिए । सत्ताधारी संयुक्त जनता दल और भाजपा ने राज्य के चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारा अथवा बुद्ध विहार आदि पर कर नहीं लगाया है, यह विशेषतः ध्यान देने योग्य है । उनका वैसा साहस ही नहीं हुआ है । बिहार में वर्तमान में चुनाव नहीं हैं, इसलिए सरकार ने हिन्दुओं के संबंध में ऐसा निर्णय लेने का साहस किया है । ऐसा निर्णय कल देश के अन्य राज्य भी लेंगे, इसमें संदेह नहीं है । धर्मशास्त्र में कहा गया है कि यदि देवधन राजकोष अर्थात सरकारी तिजोरी में जाए, तो सरकारी तिजोरी रिक्त हो जाती है । वर्तमान में भारत और अनेक राज्यों की आर्थिक स्थिति कोरोना के कारण डूबने के कगार पर है । देश और राज्यों के पास धन नहीं है । केंद्र सरकार अनेक सरकारी प्रतिष्ठानों का विक्रय कर रही है । ‘यह देवधन राजकोष में जाने का परिणाम है’, ऐसा हिन्दुओं को लगे, तो अनुचित नहीं कह सकते । प्राचीन राजा मंदिरों को धन अर्पण करते थे, मंदिरों का जीर्णाेद्धार करते थे, इसलिए तिजोरी सदैव भरी होती थी । वर्तमान स्थिति ठीक इसके विपरीत हो गई है ।
बिहार का पडोसी राज्य उत्तरप्रदेश वहां के मंदिरों के संबंध में ऐसी भूमिका लेगा, ऐसी संभावना नहीं है । वहां भी भाजपा की सरकार है; परंतु वहां के मुख्यमंत्री महत्वपूर्ण मंदिर गोरखनाथ के महंत हैं । उन्हें मंदिरों का महत्त्व और शास्त्र ज्ञात है । उनके नेतृत्व में अयोध्या के श्रीराम मंदिर का कार्य हो रहा है । मंदिरों के ५ कि.मी. परिसर में मांस, मद्य आदि पर प्रतिबंध लगाया गया है । मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने के लिए प्रयास हो रहे हैं । इससे ध्यान में आता है कि, यदि शासक धर्माचरणी हों, तो धर्म का राज्य होता है तथा यदि वे वैसे नहीं होंगे, तो राज्य अनुचित दिशा में मार्गक्रमण कर रहा है । मंदिरों की रक्षा करने तथा धर्मशास्त्रानुसार मंदिरों का संचालन होने के लिए शासक धर्माचरणी होना आवश्यक है तथा मंदिर भक्तों के नियंत्रण में होना भी आवश्यक है । वर्तमान व्यवस्था में ऐसी संभावना दुर्लभ है । संपूर्ण देश में ऐसी आदर्श स्थिति निर्माण करनी हो, तो उसके लिए हिन्दू राष्ट्र ही स्थापित करना पडेगा, यह वास्तविकता है । इसलिए श्रद्धालु, भक्त, धर्माचरणी, धर्मनिष्ठ हिन्दुओं को इसके लिए अब तन, मन और धन अर्पण कर आगे आना चाहिए । शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के आवाहन के अनुसार हिन्दुओं को हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए समय और धन देना चाहिए तथा मंदिरों की रक्षा के लिए ‘मंदिर राष्ट्र की आधारशिला होते हैं’, यह कथन सिद्ध करनेवाला हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने के लिए अथक प्रयास करने होंगे !
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