‘कैरियर’ करने की अपेक्षा महिलाओं को अपने परिवार के भले के लिए त्याग करना चाहिए । आज संस्कार एवं संस्कृति मृतप्राय: हो गई है । घर में सभी सुविधाएं होते हुए भी वहां संतुष्टि नहीं है । घर की स्त्री द्वारा धर्माचरण न करने से ऐसी घटनाएं हो रही हैं । माता तो निरंतर प्रज्वलित (जलानेवाली नहीं) रहनेवाली ज्योति है । वह स्वयं प्रज्वलित रहकर अन्यों को प्रकाश देती है । स्त्री की वास्तविक स्वतंत्रता अपने धर्माचरण द्वारा घर के लोगों को आनंद देने में होती है । भारतीय संस्कृति पुरुषप्रधान है; इसलिए माता को अपनी लडकी को मर्यादापूर्ण आचरण करना सिखाना चाहिए । मेरी मां ने मुझे जो संस्कार दिए, उसका मुझे लाभ हुआ और उस कारण मेरी गृहस्थी सुखभरी रही । आज के समय संस्कारों का विलोप होने के कारण माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजा जा रहा है । महिलाएं सुधर गईं, तो समाज भी सुधर जाएगा । समाज निर्माण का महत्त्वपूर्ण दायित्व महिलाओं का है । महिलाओं को पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम नहीं करना चाहिए; अपितु पुरुषों की क्षमता के समान काम करना चाहिए । हमें हमारे धर्म की परंपराओं का कठोरता से पालन करना चाहिए ।’
– (स्व.) अधिवक्ता अपर्णा रामतीर्थकर
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?