सर्वत्र बढ रहे ‘कोरोना’ संक्रमण से भयभीत हुए बिना निम्‍न स्‍वसूचना देकर आत्‍मबल बढाएं !

पाठक, हितचिंतक एवं धर्मप्रेमियों से विनती !

कोरोनारूपी आपतकाल में मार्गदर्शक स्‍तंभ !

(श्रीसत्‌शक्‍ति) श्रीमती बिंदा सिंगबाळ

      ‘वर्तमान में भारत सहित कुछ अन्‍य राष्‍ट्रों में ‘कोरोना’ संक्रामक विषाणु का फैलाव हुआ है । इसलिए जनजीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त होकर सर्वसामान्‍य नागरिकों में भय का वातावरण निर्माण हुआ है । ऐसी स्‍थिति में ‘छोटे-मोटे कारणों से मन विचलित होना, चिंता होना, साथ ही भय के कारण अस्‍वस्‍थ होना’, इस प्रकार स्‍वभावदोषों का प्रकटीकरण होने की संभावना है । उस प्रसंग में उचित स्‍वसूचना देने पर उस स्‍थिति से बाहर निकलने में सहायता होती है । इस दृष्‍टि से मनोबल बढाकर स्‍थिर रहने के लिए ‘अंतर्मन को कौन सी स्‍वसूचना दे सकते हैं ?’, यह आगे दिया है ।

१. प्रसंग : ‘मुझे कोरोना विषाणुओं का संक्रमण होगा’, इस विचार से भय प्रतीत होना

१ अ. स्‍वसूचना : जिस समय मेरे मन को ‘मुझे कोरोना विषाणुओं का संक्रमण होगा’, इस विचार से भय प्रतीत होगा, उस समय, ‘मैं आवश्‍यक सावधानी बरत रहा हूं’, इसका स्‍वयं को स्‍मरण दिलाऊंगा और दिनभर अधिकाधिक समय नामजप और प्रार्थना कर सत् में रहूंगा ।

२. प्रसंग : ‘मुझे कोरोना का संक्रमण हो गया, तो मेरी मृत्‍यु हो जाएगी’, यह भय लगना

२ अ. स्‍वसूचना : जिस समय मेरे मन में, ‘मुझे कोरोना विषाणु का संक्रमण होनेपर मेरी मृत्‍यु होगी’, ऐसा विचार आएगा, तब ‘इस विषाणु से प्रभावित ८० प्रतिशत रोगियों में रोग का स्‍वरूप सौम्‍य होता है’, इसका मुझे बोध होकर मैं सकारात्‍मक रहूंगा और परिजन, शुभचिंतक तथा सरकारी तंत्र द्वारा दी गई सूचनाआें का पालन कर स्‍वास्‍थ्‍य का ध्‍यान रखूंगा ।

३. प्रसंग : औषधोपचार करके भी बेटी का सर्दी / बुखार अल्‍प न होने से उसकी चिंता होना

३ अ. स्‍वसूचना : जब कई दिनों से चली आ रही बेटी की सर्दी/बुखार की मुझे चिंता होगी, तब मुझे भान होगा कि ‘सर्दी/बुखार केवल कोरोना के कारण ही नहीं होता’, इसलिए मैं ईश्‍वर पर श्रद्धा रखकर डॉक्‍टर द्वारा बताए अनुसार उसे औषधियां दूंगी और उसकी स्‍थिति के संदर्भ में उन्‍हें समय-समय पर सूचित करूंगी ।

४. प्रसंग : ‘कोरोना विषाणु की महामारी में मेरे परिजन मुझसे मिलने के लिए यात्रा नहीं कर सकते’, इसकी चिंता होना

४ अ. स्‍वसूचना : जब ‘मेरे परिजन मुझसे मिलने के लिए यात्रा नहीं कर सकते’, इस विचार से मुझे चिंता होगी, तब ‘महामारी के इस संक्रामक रोग के काल में सभी की सुरक्षा की दृष्‍टि से यात्रा न करना ही उचित है । यह तत्‍कालीन स्‍थिति है’, इसका मुझे बोध होगा और मैं ‘मुझे और परिजनों को कोरोना विषाणु का संक्रमण न हो’, इसलिए सरकारी तंत्र द्वारा सुरक्षा की दृष्‍टि से दी गई सूचनाआें का पालन कर स्‍वास्‍थ्‍य का ध्‍यान रखूंगी ।

५. प्रसंग : संचार बंदी के कारण ‘मुझे जीवनावश्‍यक वस्‍तुएं (दूध, अनाज, औषधियां आदि) उपलब्‍ध होंगी न ?’, इसकी चिंता होना ।

५ अ. स्‍वसूचना : जब मुझे चिंता होगी कि ‘आजकल जीवनावश्‍यक वस्‍तुओं का अभाव होने से क्‍या वे मुझे मिलेंगी ?’, तब भान होगा कि ‘भारत सरकार ने सभी नागरिकों के लिए इन वस्‍तुआें का घर-घर वितरण करने की व्‍यवस्‍था की है ।’ इसलिए मैं निश्‍चिंत होकर नामजप करूंगी ।

६. स्‍वसूचना देने की पद्धति

    मन में उपरोक्‍त में से जो भी अनुचित विचारों का तनाव अथवा चिंता हो, उन विचारों पर १५ दिन अथवा विचार न्‍यून होने तक संबंधित स्‍वसूचना दें । इन स्‍वसूचनाआें के दिनभर में ५ सत्र करें । एक सत्र के समय ५ बार एक स्‍वसूचना अंतर्मन को दें ।

७. मन एकाग्र कर स्‍वसूचना सत्र करें और अल्‍पावधि में मन के अनुचित विचार न्‍यून होना अनुभव करें !

    मन एकाग्र कर स्‍वसूचना के सत्र करने पर सूचनाआें का अंतर्मन पर संस्‍कार होकर ‘मन का तनाव अथवा चिंता के विचार अल्‍पावधि में न्‍यून होते हैं’, ऐसा अनेकों ने अनुभव किया है । इसलिए मन एकाग्र कर स्‍वसूचना सत्र करें । मन में आनेवाले निरर्थक विचारों के कारण सत्र एकाग्रता से न होता हो तो थोडी बडी आवाज में (बुदबुदाते हुए) स्‍वसूचना सत्र कर सकते हैं अथवा कागज पर लिखी स्‍वसूचना पढ सकते हैं । इससे विचारों की ओर ध्‍यान न जाकर अपनेआप वह न्‍यून होंगे और स्‍वसूचना के सत्र परिणामकारक होंगे । बडी आवाज में सत्र करते हुए ‘अन्‍यों को अडचन न हो’, इसका ध्‍यान रखें ।

    उपरोक्‍त अनुसार किसी विचार के कारण तनाव, चिंता, आदि निर्माण हो तो उसके लिए भी स्‍वसूचना दे सकते हैं ।

   (मन की समस्‍या दूर करने के लिए ‘मन को उचित स्‍वसूचना देना’ स्‍वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया का एक भाग है । संपूर्ण स्‍वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया के संदर्भ में जानकारी सनातन की ग्रंथमाला ‘स्‍वभावदोष एवं अहं निर्मूलन (५ खंड)’ में दी है ।)

   ‘वर्तमान प्रतिकूल स्‍थिति में भगवान ही हमारी रक्षा करेंगे’, ऐसी श्रद्धा रखकर साधना बढाएं !’

– (श्रीसत्‌शक्‍ति) श्रीमती बिंदा सिंगबाळ, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२७.३.२०२०)