ऐसा घमंडी उत्तर देना असंवेदनशीलता की सीमा दर्शाता है । कर्नाटक में सत्तारूढ भाजपा सरकार से मंत्री के विरुद्ध कडी कार्रवाई की अपेक्षा है !
बैंगलुरु (कर्नाटक) – कर्नाटक के खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री उमेश कट्टी से एक किसान ने पूछा कि, “हम सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्न की निःशुल्क आपूर्ति में विलंब होने के कारण कैसे जीवित रह सकते हैं ?” मंत्री जी से यह पूछे जाने के उपरांत उन्होंने असभ्यता पूर्ण शब्दों में कहा, “जाओ और मरो’’ ।
१. उत्तर कन्नड जिले के एक किसान ने उमेश कट्टी से शिकायत की कि, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्नों की निःशुल्क आपूर्ति पर्याप्त नहीं है । उन्होंने किसान को बताया कि, सरकार ने प्रत्येक परिवार को ५ किलोग्राम अनाज प्रदान करने का आदेश दिया है ; जब किसानों ने मंत्री को याद दिलाया कि आदेश को लागू करने में देरी हो रही है और पूछा, “जब तक खाद्यान्न की आपूर्ति बहाल नहीं हो जाती, हम कैसे जीवित रह सकते हैं ?” मंत्री ने उत्तर दिया, “जाओ और मरो ।”
२. उमेश कट्टी के ऐसे उत्तर से जब समाज में बहुत आलोचना हुई, तब उन्होंने अपनी अयोग्य कृति का समर्थन किया । उन्होंने कहा, “किसान ने मुझसे चुभनेवाले अंदाज में प्रश्न पूछा ; इसलिए मैंने उसे उसी भाषा में उत्तर दिया ।” (लोकतंत्र में मंत्री जनता के सेवक होते हैं । इसलिए अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसी घटनाओं को शांति और विनम्रता से संभालेंगे ! – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात) इस पर एक पत्रकार ने सुझाया कि, “आपको कहना चाहिए था कि, सरकार सहायता करने का प्रयास कर रही है, मृत्यु के बारे में विचार करना छोड दो ।” किंतु, कट्टी अपने शब्दों पर बने रहे ।
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